Shesh Bharat: डीके शिवकुमार के चक्रव्यूह में फंसे येदियुरप्पा के बेटे, क्या जाएगी विजयेंद्र की कुर्सी?

कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग के बाद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र चौतरफा घिर गए हैं. उन पर कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार के साथ 'एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स' के आरोप लग रहे हैं.

BY Vijayendra
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रूपक प्रियदर्शी

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कर्नाटक में बीजेपी के अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र की हालत आजकल कुछ वैसी ही है, जैसी बाकी राज्यों में बीजेपी के सामने विपक्ष के नेताओं की होती है. एक तो वह चुनाव जीत नहीं पा रहे, दूसरा यह कि अपनी पार्टी भी नहीं संभाल पा रहे हैं. तभी तो बीजेपी जैसी अनुशासित पार्टी में भी क्रॉस वोटिंग हो गई. सीएम डीके शिवकुमार के राजनीतिक प्रभाव से कर्नाटक में बीवाई विजयेंद्र का सांस लेना मुश्किल हो गया है. अब वह ऐसे आरोपों में घिर गए हैं कि जगह-जगह सफाई देते फिर रहे हैं और मंदिर जाकर कसमें खा रहे हैं, लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं है. कर्नाटक में बीजेपी के मजबूत स्तंभ बीएस येदियुरप्पा भी इस समय अपने बेटे को बचा नहीं पा रहे हैं. यह स्थिति तो काफी समय से खराब थी, लेकिन विधान परिषद (MLC) चुनाव में बीजेपी के अंदर हुई क्रॉस वोटिंग ने हालातों को और ज्यादा बिगाड़ दिया है.

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डीके शिवकुमार का चक्रव्यूह और विजयेंद्र

क्या कर्नाटक बीजेपी के सबसे पावरफुल चेहरे बीवाई विजयेंद्र का राजनीतिक करियर दांव पर लग गया है? क्या कांग्रेस के 'संकटमोचक' और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के चक्रव्यूह में विजयेंद्र इस कदर फंस चुके हैं कि उनकी अपनी ही पार्टी में साख खतरे में है? विधान परिषद चुनाव में हुई शर्मनाक क्रॉस वोटिंग के बाद से विजयेंद्र चौतरफा दबाव में हैं. अपनों की बगावत, दिल्ली की नाराजगी और डीके शिवकुमार की रणनीतियों ने विजयेंद्र की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

क्रॉस वोटिंग और 'एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स' के आरोप

कर्नाटक की राजनीति में इस समय जो खेल चल रहा है, उसके केंद्र में कांग्रेस के 'चाणक्य' डीके शिवकुमार हैं. MLC चुनावों में डीके शिवकुमार ने पर्दे के पीछे से ऐसी बिसात बिछाई कि बीजेपी के पैरों तले जमीन खिसक गई. बीजेपी और जेडीएस गठबंधन के पास पर्याप्त विधायक होने के बावजूद, कांग्रेस ने 7 में से 5 सीटें झटक लीं. बीजेपी के कम से कम 3 और जेडीएस के कई विधायकों ने सरेआम क्रॉस वोटिंग कर दी. इस हार के बाद से ही बीजेपी के भीतर यह नैरेटिव तेजी से फैल गया कि प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र, डीके शिवकुमार के साथ 'एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स' खेल रहे हैं. यानी रह रहे हैं बीजेपी में, लेकिन काम कर रहे हैं डीके शिवकुमार का. विजयेंद्र के विरोधियों ने आरोप लगा दिया कि दोनों नेताओं के बीच अंदरूनी और व्यावसायिक साठगांठ है, जिसके कारण विजयेंद्र अपनी ही पार्टी के विधायकों को टूटने से नहीं बचा पाए.

येदियुरप्पा का दबदबा और बढ़ती फजीहत

कर्नाटक बीजेपी में फादर फिगर बीएस येदियुरप्पा ने अपने दबदबे से बेटे बीवाई विजयेंद्र को प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष तो बनवा दिया, लेकिन उनका एक भी दिन चैन से नहीं गुजरा. छोटे-बड़े हर चुनाव में हार और पार्टी के अंदरूनी विरोध के बाद अब उन पर डीके शिवकुमार से ही मिलीभगत के आरोप लग गए हैं. डीके शिवकुमार से मिली इस करारी शिकस्त और 'एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स' के आरोपों से विजयेंद्र इस कदर दबाव में आ गए कि उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए एक ऐसा कदम उठाया, जिसने उनकी फजीहत और बढ़ा दी.

मंजुनाथेश्वर मंदिर का 'ट्रुथ टेस्ट' विवाद

बढ़ते दबाव को कम करने और गद्दार विधायकों को बेनकाब करने के लिए विजयेंद्र ने एक अजीब दांव खेला. विजयेंद्र ने पार्टी अध्यक्ष होने के नाते, बिना हाईकमान से पूछे फैसला कर लिया कि बीजेपी के सभी 62 विधायक प्रसिद्ध धर्मस्थल मंजुनाथेश्वर मंदिर जाकर भगवान के सामने सच्चाई की कसम खाएंगे कि उन्होंने क्रॉस वोटिंग नहीं की है. इस 'ट्रुथ टेस्ट' के आइडिया से पार्टी में आग और भड़क गई. आर अशोक, सदानंद गौड़ा और प्रहलाद जोशी जैसे सीनियर नेताओं ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि राजनीति को मंदिर नहीं ले जाना चाहिए. भारी फजीहत के बाद बीजेपी के राज्य प्रभारी नितिन नबीन ने मामले को हाथ में लिया और विजयेंद्र को दिल्ली तलब किया.

विजयेंद्र की सफाई और व्यक्तिगत संबंधों से इनकार

चौतरफा दबाव के बाद विजयेंद्र को यह कार्यक्रम रद्द करना पड़ा और वह अकेले ही मंदिर चले गए. जब वह मंदिर से बाहर निकले, तो मीडिया के सवाल उनका इंतजार कर रहे थे कि क्या डीके शिवकुमार से मिलीभगत के कारण ही क्रॉस वोटिंग हुई है? विजयेंद्र ने कहा कि यह सब सच नहीं है. उन्होंने सफाई दी, "मेरा डीके शिवकुमार के साथ कोई व्यक्तिगत या व्यावसायिक संबंध नहीं है. वे सीएम हैं, इसलिए उनके साथ सिर्फ एक औपचारिक रिश्ता है." उन्होंने इसे अपनी छवि खराब करने की साजिश करार दिया, लेकिन इस हाई-ड्रॉमे ने साफ कर दिया कि विजयेंद्र इस वक्त भारी मानसिक और राजनीतिक तनाव से गुजर रहे हैं.

हाईकमान की फटकार और फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी

विजयेंद्र के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द डीके शिवकुमार से ज्यादा उनकी अपनी ही पार्टी के सीनियर नेता बन चुके हैं. केएस ईश्वरप्पा और बसनगौड़ा पाटिल यत्नाल जैसे नेता एक जूनियर को अपना बॉस मानने को तैयार नहीं हैं और लगातार उनके खिलाफ दिल्ली में लॉबिंग कर रहे हैं. इस क्रॉस वोटिंग के बाद दिल्ली हाईकमान का पारा भी सातवें आसमान पर पहुंच गया है. प्रभारी नितिन नबीन ने विजयेंद्र को दिल्ली तलब कर कड़ी फटकार लगाई. दिल्ली ने सीनियर नेता सीटी रवि की अगुवाई में एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बना दी है. यानी अब विजयेंद्र की किस्मत इस कमेटी की रिपोर्ट पर टिकी है, जो क्रॉस वोटिंग करने वालों की जांच कर रही है.

कर्नाटक बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी

इस पूरे घमासान की असली जड़ पार्टी के भीतर चल रही भीषण गुटबाजी है, जिसने संगठन को दो धड़ों में बांट दिया है. एक तरफ बीएस येदियुरप्पा और उनके बेटे बीवाई विजयेंद्र का गुट है, जिसके पास राज्य के सबसे बड़े वोटबैंक यानी 'लिंगायत समुदाय' का मजबूत जनाधार और जमीनी पकड़ है. वहीं दूसरी तरफ, राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) समर्थित गुट है, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति पर येदियुरप्पा परिवार के एकाधिकार और 'परिवारवाद' को खत्म करना चाहता है. बसनगौड़ा पाटिल यत्नाल और सीटी रवि जैसे कद्दावर नेता इसी दूसरे गुट के मोहरे माने जाते हैं, जो विजयेंद्र को अध्यक्ष पद से हटाने के लिए लगातार दिल्ली में फील्डिंग कर रहे हैं. पूर्व सीएम डीवी सदानंद गौड़ा ने तो यहां तक दावा कर दिया कि उन्होंने चुनाव से पहले ही इस बगावत की चेतावनी दी थी, लेकिन उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

परिवारवाद का ठप्पा और राजनीतिक सफर

विजयेंद्र की इस हालत के पीछे सिर्फ मौजूदा चुनाव नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक एंट्री की कहानी भी है. पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के बेटे होने के नाते विजयेंद्र को लिंगायत समुदाय की विरासत तो मिली, लेकिन राजनीति का यह सफर हमेशा कांटों भरा रहा. मांड्या और तुमकुरु के उपचुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाकर विजयेंद्र ने संगठन में अपना लोहा मनवाया था. साल 2023 में पहली बार विधायक बनते ही हाईकमान ने उन्हें सीधे प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंप दी, लेकिन इसी के साथ उन पर 'परिवारवाद' का ठप्पा लग गया, क्योंकि उनके भाई पहले से ही सांसद थे. कांग्रेस के लगातार हमलों और बीजेपी के भीतर ही खुद को साबित करने के दोहरे दबाव ने विजयेंद्र को शुरुआत से ही संभलने का मौका नहीं दिया.

विजयेंद्र के सामने त्रिकोणीय चुनौती

कर्नाटक की इस सियासी जंग में साफ है कि डीके शिवकुमार ने सामने आए बिना एक ऐसा तीर चलाया है, जिसने बीजेपी संगठन की कमियों को उजागर कर दिया है. विजयेंद्र इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं, जहां उन्हें एक साथ कांग्रेस के चक्रव्यूह, अपनी ही पार्टी के बागियों और दिल्ली की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है. स्थिति यह है कि विजयेंद्र के सामने अपनी कुर्सी बचाने, पार्टी के भीतर अपने विरोधियों को शांत करने और दिल्ली हाईकमान के सामने खुद को एक मजबूत व वफादार नेता साबित करने की त्रिकोणीय चुनौती है. कर्नाटक की यह 'क्रॉस वोटिंग' स्टोरी आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति में और बड़े बदलाव ला सकती है. अब देखना होगा कि येदियुरप्पा के बेटे इस भयंकर दबाव से खुद को कैसे बाहर निकालते हैं.

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