2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद सरकार बनाने के बाद कांग्रेस कर्नाटक में कोई चुनाव नहीं हारी. 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मनमुताबिक सीटें नहीं मिली लेकिन 2019 के मुकाबले पार्टी ने अच्छा ही किया. चुनावों में कांग्रेस की जीत को सीएम सिद्धारमैया की सरकार और इलेक्शन मैनेजर डीके शिवकुमार की जीत के तौर पर देखा जाता है. ऐसे समय जब कर्नाटक में सीएम को लेकर कांग्रेस हाईकमान फैसले के मूड में है तब फिर से दो सीटों दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट पर उपचुनाव हुए जिसमें कांग्रेस के रेप्युटेशन दांव पर लगा है. फिर से वही सवाल कि उपचुनावों में सिद्धारमैया या डीके शिवकुमार किसका करियर दांव पर है. डीके कांग्रेस के संकटमोचक और 'चाणक्य माने जाते हैं.
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कुछ तो ऐसा है कि बागलकोट और दावणगेरे दक्षिण के चुनाव कांग्रेस के लिए कठिन नहीं माने गए. एक बड़ा कारण ये कि 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने दोनों सीटें जीती थी. उपचुनावों की नौबत इसलिए कि दोनों सीटों पर जीतने वाले कांग्रेस विधायकों की मौत हो गई.
बागलकोट यानी कांग्रेस के दिग्गज एच.वाई. मेती का किला. उनके निधन ने शून्य पैदा किया. अब मैदान में हैं उनके बेटे उमेश मेती. पिता की विरासत को बचाने का बोझ कंधे पर है, तो सामने खड़े हुए बीजेपी के वीरन्ना चरंतिमठ. कांग्रेस के लिए बड़ा सवाल ये है कि एच.वाई. मेती के जाने के बाद बागलकोट की जनता उनके बेटे उमेश मेती को स्वीकार करेगी या बीजेपी को मौका देगी. एच.वाई. मेती की इस इलाके में कुरुबा समुदाय जिससे CM सिद्धारमैया भी आते हैं पर मजबूत पकड़ रही. उमेश पूरी तरह से Sympathy Factor और अपने पिता के अधूरे कामों के नाम पर वोट मांग रहे हैं. उनके लिए ये चुनाव राजनीति में लॉन्च होने और पारिवारिक विरासत को बचाने की पहली सीढ़ी की तरह है.
बीजेपी उम्मीदवार वीरन्ना चरंतिमठ पूर्व विधायक होने के साथ इलाके के प्रभावशाली व्यक्ति हैं. शिक्षण संस्थान (B.V.V. Sangha) के चेयरमैन हैं. लिंगायत समुदाय में इनका असरदार माने जाते हैं. बागलकोट शहर में व्यापारी वर्ग और लिंगायत वोटर्स का झुकाव बीजेपी की तरफ माना जाता है जबकि ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस मजबूत है. यहां की लड़ाई 'जातीय समीकरण' कुरुबा+अल्पसंख्यक vs लिंगायत पर टिकी है.
दावणगेरे दक्षिण में मुकाबला 'पोते' और 'प्रतिष्ठा' के बीच है. भीष्म पितामह' कहे जाने वाले शमनूर शिवशंकरप्पा के निधन के बाद ये सीट खाली हुई. 92 साल की उम्र तक राज करने वाले शमनूर का दबदबा ऐसा था कि विरोधियों के पसीने छूट जाते थे. अब विरासत की मशाल उनके पोते समर्थ मल्लिकार्जुन के हाथ में है. उनके पिता एस.एस. मल्लिकार्जुन कर्नाटक सरकार में मंत्री हैं. परिवार की थर्ड जेनरेशन की पॉलिटिकल लॉन्चिंग हुई है उपचुनाव में. दावणगेरे को 'शमनूर परिवार का गढ़' माना जाता है, जिनका असर राजनीति से लेकर शिक्षा और बिजनेस तक फैला है. समर्थ युवा चेहरा हैं और 'युवा जोश' के साथ अपने दादा की 90 साल पुरानी सियासी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. कांग्रेस की जीत इस बात पर सबसे ज्यादा निर्भर है कि शमनूर शिवशंकरप्पा के जाने के बाद ब्रांड शमनूर कितना चलता है.
बीजेपी के श्रीनिवास दसकरियप्पा इस किले में सेंध लगाने के लिए बेताब हैं. उन्होंने परिवारवाद को ही मुद्दा बनाया है. बागलकोट की तरह यहां भी वही सवाल कि क्या शमनूर ब्रांड का जादू आज भी बरकरार है? क्या जनता उनके पोते समर्थ मल्लिकार्जुन को मौका देगी? दावणगेरे 'कर्नाटक का मैनचेस्टर' कहा जाता है. यहा बुनकर समुदाय और व्यापारियों के वोट निर्णायक होते हैं. कांग्रेस का किला यहां बहुत मजबूत है. बीजेपी की जीत इस बात पर निर्भर है कि उसने कितना अंडरकरंट कांग्रेस और शमनूर परिवार के खिलाफ पैदा किया. दोनों सीटों पर बंपर वोटिंग का ट्रेंड बता रही है कि बरसों पुराने नेताओं को खोने के बाद नेक्स्ट जेनरेशन के नेताओं को चुनने के लिए जनता खामोश नहीं रही.
ये सिर्फ उपचुनाव नहीं है. सीएम होने के कारण सबसे बड़ी जिम्मेदारी सीएम सिद्धारमैया की बनती है क्योंकि सरकार वही चला रहे हैं. बागलकोट सिद्धारमैया की जाति कुरुबा बहुल है, जबकि दावणगेरे में डीके शिवकुमार की संगठन शक्ति की परीक्षा है. डीके शिवकुमार चुनावी टेस्ट करने में माहिर हैं. उनके इलेक्शन मैनेजमेंट का टेस्ट फिर से हुआ है. डीके शिवकुमार सिर्फ डिप्टी सीएम नहीं, बल्कि कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं. उनके लिए ये उपचुनाव महज दो सीटें नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का ट्रेलर हैं. डीकेएस (DKS) का टारगेट दोनों सीटों को जीतकर ये साबित करना है कि संगठन पर उनकी पकड़ अभी भी फौलादी है. वे जानते हैं कि जीत का सेहरा उनके सिर बंधेगा, जो उन्हें भविष्य में मुख्यमंत्री पद की रेस में और मजबूती देगा. हारने पर चीजें नेगेटिव हो सकती हैं.
डीके शिवकुमार के पास मौका है अपनी रणनीति से सिद्धारमैया के गढ़ में भी अपनी चमक बिखेरने का. नतीजों के बाद कांग्रेस के भीतर 'नंबर 1' की जंग और तेज हो सकती है. डीके शिवकुमार ने दोनों सीटों पर धुंआधार रैलियां की. उन्होंने इसे 'अपने Pride का चुनाव बना दिया. खुले मंच से हुंकार भरी कि ये चुनाव उम्मीदवारों का नहीं, मेरा चुनाव है. सीधे तौर पर लोगों के लिए ये संदेश है कि वोट सीधा सरकार की ताकत को जाएगा. हालांकि डीके ने ये चुनाव तब भी संभाले जब उन्हें असम का भी चुनाव देखना पड़ा.
अगर कांग्रेस के पास डीके शिवकुमार का 'चाणक्य' दिमाग है, तो बीजेपी के पास बीएस येदियुरप्पा का चुनावी मैनेजमेंट है जो
बेटे बी वाई विजयेंद्र को आगे रखकर चल रहा है. मुकाबला अब सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि कर्नाटक के असली 'किंग' की पहचान का है. 80 साल की उम्र पार कर चुके येदियुरप्पा के लिए बागलकोट और दावणगेरे दक्षिण प्रतिष्ठा का प्रश्न हैं. ये दोनों इलाके लिंगायत बाहुल्य हैं, और BSY इस समुदाय के निर्विवाद नेता रहे हैं. बीजेपी ने प्रचार के दौरान ये नैरेटिव सेट करने की कोशिश की है कि कांग्रेस सरकार लिंगायत समुदाय के बड़े नेताओं जैसे शमनूर शिवशंकरप्पा के परिवार) को सिर्फ चुनाव के लिए इस्तेमाल कर रही है, जबकि असली सत्ता 'सिद्धारमैया-डीके' की जोड़ी के पास है जो गैर लिंगायत हैं.
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