Shesh Bharat: कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस सरकार को सत्ता संभाले अभी ठीक से दो दिन भी नहीं बीते हैं कि कैबिनेट के भीतर विभागों के बंटवारे को लेकर बड़ा सियासी घमासान छिड़ गया है. गत 3 जून को ही मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेहद सोच-समझकर अपने 13 मंत्रियों की टीम तैयार की थी और उन्हें पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई थी. लेकिन शपथ ग्रहण के महज 48 घंटे के भीतर ही वरिष्ठ कांग्रेस नेता और आठ बार के विधायक रामलिंगा रेड्डी ने कैबिनेट से इस्तीफा देकर पूरी सरकार की नींव हिला दी है.
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इस पूरे सियासी ड्रामे की मुख्य वजह रसूखदार और भारी-भरकम बजट वाले 'बेंगलुरु विकास विभाग' के आवंटन को माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने रामलिंगा रेड्डी से व्यक्तिगत तौर पर इस विभाग को देने का वादा किया था. हालांकि, जब वास्तविक सूची सामने आई तो करीब 20 हजार करोड़ रुपये के वार्षिक बजट और असीमित शक्तियों वाले इस महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी ब्याटरायनपुरा के विधायक कृष्णा बायरे गौड़ा को सौंप दी गई. वहीं रामलिंगा रेड्डी को जल संसाधन (सिंचाई) विभाग थमा दिया गया, जिसे सियासी गलियारों में 'सूखा मंत्रालय' कहकर संबोधित किया जा रहा है. इसी अनदेखी से नाराज होकर रेड्डी ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया.
लाइव टीवी कैमरों के सामने इस्तीफे पर दस्तखत
विभागीय आवंटन को लेकर उपजा यह असंतोष गुरुवार रात को ही सतह पर आ गया था. जैसे ही रामलिंगा रेड्डी को यह भनक लगी कि बेंगलुरु से जुड़ा मलाईदार विभाग कृष्णा बायरे गौड़ा को आवंटित कर दिया गया है, वे एक महत्वपूर्ण बैठक के बीच से ही बेहद तल्ख तेवरों में बाहर निकल आए. इसके बाद शुक्रवार सुबह बेंगलुरु की राजनीति में उस वक्त भारी उथल-पुथल मच गई, जब रेड्डी ने एक आपातकालीन प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. उन्होंने लाइव टीवी कैमरों की चमक के बीच सार्वजनिक रूप से अपने त्याग पत्र पर दस्तखत करना शुरू कर दिया.
इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के दौरान मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और कांग्रेस आलाकमान के कई दूत रेड्डी को मनाने के लिए उनके आवास पर पहुंचे. हालांकि, रेड्डी ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि मुख्यमंत्री उन्हें दोबारा भी इस विभाग की पेशकश करते हैं, तब भी वह कैबिनेट में वापसी नहीं करेंगे. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वे एक विधायक और निष्ठावान कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में पार्टी की सेवा करते रहेंगे. सियासी रणनीति के तहत रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने समर्थकों के माध्यम से मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया. इस गंभीर संकट पर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने डैमेज की कोशिश करते हुए कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है और वे जल्द ही रामलिंगा रेड्डी से सीधे बातचीत कर इस मामले को सुलझा लेंगे.
आखिर बेंगलुरु विकास विभाग के लिए क्यों मचा है असली बवंडर?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे विवाद की मुख्य वजह इस विभाग के पास मौजूद वित्तीय और प्रशासनिक ताकत है. बेंगलुरु विकास विभाग सीधे तौर पर 'बृहत बेंगलुरु महानगर पालिके' (BBMP) को नियंत्रित करता है, जिसका सालाना बजट लगभग 20 हजार करोड़ रुपये है. इस बजट का तकरीबन 65 फीसदी हिस्सा सीधे तौर पर बुनियादी ढांचे, सड़कों के निर्माण और व्हाइट-टॉपिंग जैसी परियोजनाओं पर खर्च होता है, जिसमें टेंडर जारी करने के असीमित अधिकार शामिल हैं.
इसके अलावा, बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) के जरिए शहर के पूरे रियल एस्टेट और बेशकीमती जमीनों के आवंटन की चाबी भी इसी विभाग के पास होती है. संक्षेप में कहें तो इस विभाग का मंत्री होने का अर्थ है राज्य की आर्थिक राजधानी का 'रिमोट कंट्रोल' अपने हाथ में रखना.
विभाग छोड़कर भी हाथ में रहेगा 'रिमोट कंट्रोल'
भले ही डीके शिवकुमार ने खुद मुख्यमंत्री बनने के बाद वित्त, कार्मिक और खुफिया (Intelligence) जैसे महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखे हैं, लेकिन बेंगलुरु पर से उन्होंने अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने दी. वर्ष 2023 में उपमुख्यमंत्री बनने से लेकर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने तक, वे स्वयं बेंगलुरु शहर विकास मंत्री थे. उन्होंने शहर के कायाकल्प के लिए 'ब्रैंड बेंगलुरु' का विजन पेश किया था और पूरे महानगर को छोटे निगमों में बांटकर एक नई महा-एजेंसी 'ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी' (GBA) का गठन किया.
आने वाले समय में जीबीए (GBA) के चुनाव होने तय हैं और मुख्यमंत्री होने के नाते डीके शिवकुमार पदेन (Ex-officio) इसके चेयरमैन रहेंगे. ऐसे में विभाग का मंत्री कोई भी बने, अंतिम फैसला और वास्तविक नियंत्रण हमेशा मुख्यमंत्री के हाथ में ही रहेगा. यही वजह थी कि डीके शिवकुमार किसी ऐसे सीनियर नेता को यह विभाग नहीं सौंपना चाहते थे जो उनके नियंत्रण से बाहर हो. रामलिंगा रेड्डी कद और अनुभव में बेहद सीनियर हैं, इसलिए उन्हें काबू में रखना आसान नहीं होता.
कौन हैं कृष्णा बायरे गौड़ा?
ब्याटरायनपुरा के विधायक कृष्णा बायरे गौड़ा को कांग्रेस के भीतर एक आधुनिक, शिक्षित और बेदाग छवि वाले नेता के रूप में देखा जाता है. उन्होंने बेंगलुरु के क्राइस्ट कॉलेज से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और अमेरिकन यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल अफेयर्स में मास्टर डिग्री ली है. राजनीति में कदम रखने से पहले वे वाशिंगटन में इथियोपियाई दूतावास और कई अंतरराष्ट्रीय विकास संस्थाओं में कार्य कर चुके हैं. वे एक मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं और उनके पिता सी. बायरे गौड़ा विधानसभा के पूर्व डिप्टी स्पीकर व कृषि मंत्री रह चुके हैं. वर्ष 2003 में पिता के निधन के बाद वे भारत लौटे और महज 30 वर्ष की उम्र में उपचुनाव जीतकर सबसे युवा विधायकों की सूची में शामिल हुए. वर्तमान में वे लगातार छह बार के विधायक हैं.
बेंगलुरु जैसे वैश्विक आईटी हब और कॉरपोरेट जगत के साथ तालमेल बिठाने के लिए डीके शिवकुमार को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो विदेशी निवेशकों को प्रभावित कर सके. चूंकि इस विभाग में हजारों करोड़ों के वित्तीय लेन-देन होते हैं, इसलिए गौड़ा की बेदाग छवि के जरिए विपक्ष को भ्रष्टाचार के आरोपों का मौका नहीं मिलेगा. इसके साथ ही, कृष्णा बायरे गौड़ा भी उसी वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं जिससे स्वयं मुख्यमंत्री आते हैं. उन्हें इस पद पर बैठाकर डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु की राजनीति में रामलिंगा रेड्डी के एकछत्र प्रभाव के समानांतर अपने एक बेहद वफादार और सहयोगी को स्थापित कर दिया है.
महज पोर्टफोलियो नहीं, वजूद और दबदबे की जंग
रामलिंगा रेड्डी को बेंगलुरु की राजनीति का 'अजेय चाणक्य' माना जाता है. 72 वर्षीय रेड्डी वर्तमान में बेंगलुरु की बीटीएम लेआउट सीट से विधायक हैं और लगातार आठ बार विधानसभा चुनाव जीतने का एक दुर्लभ रिकॉर्ड उनके नाम है. कांग्रेस पार्टी में सक्रिय रहते हुए उन्हें 53 साल से अधिक का समय हो चुका है. वे वर्ष 1983 में बेंगलुरु महानगर पालिका (BMP) के कॉर्पोरेटर थे, जिसके चलते उन्हें शहर की जमीनी राजनीति की रग-रग का अंदाजा है. वे पूर्व की सरकारों में गृह, परिवहन और शिक्षा जैसे कद्दावर मंत्रालय संभाल चुके हैं और वर्तमान में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं.
ऐसे में रामलिंगा रेड्डी का यह ऑन-कैमरा इस्तीफा महज एक विभाग की लड़ाई नहीं, बल्कि बेंगलुरु के पावर सेंटर पर अपने राजनीतिक वजूद और दबदबे को बचाए रखने की एक बड़ी जंग है. अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि डीके शिवकुमार अपने इस 'पक्के दोस्त' की नाराजगी को कैसे दूर करते हैं और 'ब्रैंड बेंगलुरु' के इस सियासी सस्पेंस का ऊंट किस करवट बैठता है.
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