Siddaramaiah v/s DK Shivakumar : सीएम के दावेदार और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार का एक छोटा सा बयान कि "जो होना है, वो होगा", अब राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है. सवाल फिर तेज है कि क्या कर्नाटक में सीएम की कुर्सी की अदला-बदली का समय आ गया है? क्या सिद्धारमैया और डीके के बीच का 'पावर शेयरिंग फॉर्मूला' अब धरातल पर उतरने वाला है? दिल्ली से लौटने के बाद, डीके शिवकुमार ने सीएम सिद्धारमैया की ओर से भी दावा किया कि वो और सीएम, दोनों कांग्रेस हाईकमान के फैसले का पालन करेंगे. हालांकि उन्होंने अपने मुंह से यह नहीं कहा कि ये सब बयानबाजी सीएम बदलने को लेकर ही है.
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चुनावी नतीजे और डीके शिवकुमार की नई रणनीति
5 राज्यों का चुनाव लगभग हो चुका है. डीके शिवकुमार को असम चुनाव की जो जिम्मेदारी दी गई थी, वो भी पूरी हो गई. अब 4 मई को पता चलेगा कि असम में प्रियंका गांधी के साथ डीके शिवकुमार की इलेक्शन प्लानिंग सफल हुई या नहीं. इसी के साथ कर्नाटक की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव संपन्न हो गए हैं, जिसमें डीके और सिद्धारमैया दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. चुनाव पूरा होते ही कर्नाटक में सीएम बदलने की राजनीति फिर गरमा गई है. दो दिन पहले दिल्ली में "ताजी हवा खाने नहीं आया हूं" कहने वाले डीके शिवकुमार ने एक और धमाका किया है.
4 मई के परिणामों पर टिकी हाईकमान की नजर
यह बयान 4 मई को होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों और कर्नाटक की दो विधानसभा सीटों (बागलकोट और दावणगेरे दक्षिण) के उपचुनाव के नतीजों से ठीक पहले आया है. माना जा रहा है कि 4 मई के बाद हाईकमान कोई बड़ा फैसला ले सकता है. असम और उपचुनावों में यदि कांग्रेस की जीत हुई, तो इसका पूरा क्रेडिट डीके शिवकुमार को जाएगा और सीएम पद पर उनका दावा और मजबूत होगा. हालांकि, महीनों की रस्साकशी के बाद भी फिलहाल पार्टी ने आधिकारिक तौर पर न कुछ कहा है और न ही कुछ किया है.
दार्शनिक अंदाज और नेतृत्व परिवर्तन के संकेत
दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेताओं से मुलाकात कर लौटे डीके शिवकुमार से जब मीडिया ने नेतृत्व परिवर्तन पर सवाल पूछा, तो उन्होंने बहुत ही दार्शनिक अंदाज में कहा "What has to happen will happen" यानी जो होना है, वो होकर रहेगा. यह बयान केवल किस्मत का भरोसा नहीं है, बल्कि सिद्धारमैया कैंप के लिए एक सिग्नल की तरह देखा जा रहा है कि अब वक्त आ गया है.
मई 2023 का समझौता और 'पावर शेयरिंग फॉर्मूला'
इस सत्ता संघर्ष की जड़ें मई 2023 के चुनाव परिणामों में छिपी हैं. कांग्रेस ने कर्नाटक में भारी बहुमत हासिल किया, लेकिन सीएम की कुर्सी के लिए दो दावेदार हैं सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार आमने-सामने थे. सूत्रों के मुताबिक, तब सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी में एक '2.5 + 2.5 साल' का फॉर्मूला तय हुआ था. शर्त थी कि पहले ढाई साल सिद्धारमैया सीएम रहेंगे और बाकी के ढाई साल डीके शिवकुमार को कमान सौंपी जाएगी.
वोक्कालिगा समुदाय की मांग और सिद्धारमैया का रुख
मई 2023 से अब तक ढाई साल से ज्यादा समय बीत चुका है. डीके शिवकुमार के समर्थक, जिनमें प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय के मठाधीश और गुरु भी शामिल हैं, अब खुलेआम मांग कर रहे हैं कि डीके को उनका 'हक' मिलना चाहिए. दूसरी तरफ, सिद्धारमैया अपने 'अहिंदा' (पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक) वोट बैंक के भरोसे अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं दिखते. उनके समर्थकों का साफ कहना है कि सीएम की कुर्सी खाली नहीं है और सिद्धारमैया पूरे 5 साल सीएम रहेंगे.
ट्रबलशूटर बनाम मंझे हुए खिलाड़ी की जंग
डीके शिवकुमार कर्नाटक कांग्रेस के 'ट्रबलशूटर' माने जाते हैं और उन्होंने सरकार बनाने में अपनी पूरी ताकत झोंकी थी. अब उनका धैर्य जवाब दे रहा है. दूसरी ओर, सिद्धारमैया एक मंझे हुए खिलाड़ी हैं जो अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दे रहे. कर्नाटक का यह सत्ता संघर्ष अब केवल दो नेताओं की लड़ाई नहीं, बल्कि दो बड़े समुदायों वोक्कालिगा और अहिंदा के बीच के संतुलन की परीक्षा भी है.
सिद्धारमैया का कड़ा स्टैंड और भविष्य के सवाल
सिद्धारमैया ने सीधे तौर पर किसी भी 'पावर शेयरिंग' समझौते से इनकार किया है. जब भी मौका मिला, उन्होंने यही कहा कि वे 5 साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. सवाल पूछने वालों से वे पलटकर पूछते हैं कि "क्या मैं यहाँ सीएम के रूप में नहीं बैठा हूँ? तो फिर कुर्सी खाली कहाँ है?" वे संदेश देते हैं कि जब तक आलाकमान चाहेगा, वो पद पर बने रहेंगे. अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक में जल्द 'ताजपोशी' का नया उत्सव दिखेगा या कांग्रेस आलाकमान इस गुटबाजी को दबाने में कामयाब होगा? डीके शिवकुमार का ताजा बयान किसी बड़े तूफान से पहले की शांति भी हो सकता है.
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