Karnataka Politics: 4 मई को जब पांच राज्यों के नतीजे आएंगे तब कांग्रेस के एंगल से सबसे ज्यादा इस बात पर नजर रहेगी कि कांग्रेस केरल जीत रही है या नहीं. जितने राज्यों में चुनाव हुए, जितने राज्यों के एग्जिट पोल आए उसमें केरल या असम में ही कांग्रेस की जीत होनी थी. असम में ऐसा होता दिख नहीं रहा और केरल में सब कुछ कांग्रेस के फेवर में दिख रहा है. ऐसा हुआ तो बुरी स्थिति का सामना कर रही कांग्रेस की चौथी सरकार बनेगी, चौथा सीएम केरल में बनेगा.
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कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार में एक फैसला अरसे से होल्ड पर चल रहा है. ऐसा दावा किया जाता रहा कि 2023 में सरकार बनते समय कांग्रेस हाईकमान ने तय किया था कि पहले ढाई साल सिद्धारमैया सीएम होंगे, दूसरे ढाई साल डीके शिवकुमार सीएम बनेंगे. ढाई साल हो चुके लेकिन फॉर्मूला लागू नहीं हुआ. डीके और उनके समर्थक हाईकमान को लगातार फॉर्मूले की याद दिलाकर वादा निभाने की मांग कर रहे हैं लेकिन हाईकमान अब तक साइलेंट था.
कौन बनेगा सीएम?
कर्नाटक में सीएम की कुर्सी एक है, लेकिन दावेदार कई हो गए हैं. कर्नाटक कांग्रेस में 'पॉवर गेम' अब अपने क्लाइमेक्स पर है, डीके शिवकुमार का 'अल्टीमेटम', सिद्धारमैया का 'वेट एंड वॉच' और इन सबके बीच गृह मंत्री का वो 'गुगली' बयान जिसने दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक हड़कंप मचा दिया है. शोर तेज हुआ है कि क्या कर्नाटक में झगड़ा शांत करने के लिए कहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तो खुद नहीं संभालेंगे कर्नाटक की कमान? उन्होंने मना नहीं किया, इनकार नहीं किया. उनका पुराना अफसोस रहा है कि लाख काबिलियत के बाद भी वो कर्नाटक के सीएम नहीं बन पाए.
खरगे ने साफ कर दिया!
दिल्ली से लेकर बेंगलुरु में महीनों से हलचल तेज है. अब जाकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सामने आए स्थिति साफ करने लिए. खरगे ने साफ कर दिया कि फिलहाल कोई बदलाव नहीं होगा. अभी राज्य में मुख्यमंत्री मौजूद हैं। खरगे का इतना कहना डीके शिवकुमार के लिए झटका और सिद्धारमैया के लिए संजीवनी है. खरगे के इतना कहने के बाद भी इशारा दे दिया कि फैसला सोनिया गांधी और राहुल गांधी से चर्चा के बाद 'जल्द' होगा। यानी सस्पेंस बरकरार है.
कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही खींचतान के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का यह बयान कि "फिलहाल मुख्यमंत्री नहीं बदला जाएगा," इस कहानी में एक बड़ा मोड़ है. यह पूरी कहानी सत्ता के संघर्ष और 'अढ़ाई-अढ़ाई साल' के कथित फॉर्मूले के इर्द-गिर्द घूम रही है. असली सस्पेंस तो खड़गे के उस बयान में छिपा है, जिसमें उन्होंने 'नो' तो कहा, लेकिन सोनिया गांधी का नाम लेकर एक बहुत बड़ा 'शायद' भी छोड़ दिया है.
कांग्रेस हाईकमान का कोई गुप्त प्लान?
कर्नाटक के गृह मंत्री जी. परमेश्वर सिद्धारमैया कैंप के माने जाते हैं. डीके शिवकुमार के सीएम बनने-बनाने के खिलाफ हैं. उन्हें इतना समझ तो आ रहा है कि सिद्धारमैया का लंबे समय तक कुर्सी पकड़े रहना चलेगा नहीं. उन्होंने बम फोड़ू आइडिया दिया कि अगर खरगे साहब खुद सीएम बनते हैं, तो हम सब उनका खुशी-खुशी स्वागत करेंगे. सियासी पंडित हैरान हैं! क्या ये सिद्धारमैया की चाल है डीके को रोकने के लिए? या कांग्रेस हाईकमान का कोई गुप्त प्लान? या खरगे की छिपी महत्वकांक्षा के बाहरआने का मौका.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में खरगे से पूछा गया अगला सवाल था कि 'क्या आप सीएम बनेंगे?', उन्होंने मुस्कुराते हुए गेंद सोनिया गांधी के पाले में डाल दी. उन्होंने कहा "सोनिया जी जो तय करेंगी, वही होगा. फिलहाल कोई वैकेंसी नहीं है." खड़गे का ये बयान न 'हां' है और न 'ना', जिसने सस्पेंस को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है.
सोनिया गांधी करेंगी फैसला!
कर्नाटक का मामला हमेशा से सोनिया गांधी का मामला माना जाता है. कहा जाता है कि जब 2023 में सरकार बनी और डीके ने दावा रखा तब सोनिया गांधी ने उन्हें शांत कराया. जिस ढाई साल वाले फॉर्मूले की चर्चा होती है वो भी सोनिया का दिया माना जाता है. फैसला सोनिया गांधी करेंगी, ये सुनकर डीके शिवकुमार को राहत मिल सकती है क्योंकि उनका सोनिया गांधी से रिलेशन राहुल, प्रियंका से कहीं ज्यादा इमोशनल और पर्सनल माना जाता है.
सोनिया गांधी और डीके शिवकुमार (DKS) का रिश्ता केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गहरे भरोसे और वफादारी की बुनियाद पर टिका है. डीके को गांधी परिवार का सबसे बड़ा 'संकटमोचक' (Troubleshooter) माना जाता है, जिन्होंने मुश्किल समय में न केवल कर्नाटक, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के विधायकों और सरकार को टूटने से बचाया. सोनिया गांधी के प्रति उनकी निष्ठा तब और मजबूत दिखी जब 2019 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल जाने के बावजूद उन्होंने पार्टी का साथ नहीं छोड़ा.
सोनिया गांधी ने भी डीके की इस वफादारी का सम्मान किया है. जब वे जेल में थे, तब सोनिया गांधी खुद उनसे मिलने तिहाड़ जेल गई थीं, जिसने एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था. 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जब सीएम पद को लेकर पेंच फंसा, तो यह सोनिया गांधी ही थीं जिनके हस्तक्षेप और व्यक्तिगत आश्वासन पर डीके शिवकुमार डिप्टी सीएम बनने के लिए तैयार हुए. डीके आज भी अपनी हर बड़ी मांग या शिकायत को सीधे सोनिया गांधी के सामने रखना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि आलाकमान उनके 'त्याग' को नजरअंदाज नहीं करेगा.
सोनिया के करीबी हैं डीके!
डीके शिवकुमार 'संगठन और वफादारी' के दम पर सोनिया गांधी के करीब हैं, वहीं सिद्धारमैया अपनी 'मास अपील' और 'प्रशासनिक पकड़' के कारण राहुल गांधी की पहली पसंद बने हुए हैं. 2023 के चुनाव प्रचार के दौरान राहुल और सिद्धारमैया की केमिस्ट्री साफ देखी गई थी. राहुल जानते हैं कि कर्नाटक में बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड को टक्कर देने के लिए सिद्धारमैया का 'कन्नडिगा अस्मिता' और 'सामाजिक न्याय' का मॉडल सबसे प्रभावी है. यही कारण है कि तमाम दबावों के बावजूद, राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद पर किसी भी बड़े बदलाव को लेकर बेहद सावधानी बरत रहे हैं, ताकि पार्टी का जमीनी आधार न हिले.
जी. परमेश्वर जो खुद दलित नेता हैं के इस बयान को राजनीतिक गलियारों में एक 'मास्टरस्ट्रोक' माना जा रहा है. जानकारों का कहना है कि खड़गे का नाम आगे करके उन्होंने सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच चल रहे सीधे मुकाबले में एक नई "सहमति वाली" राह दिखाई है. गृह मंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में 'दलित मुख्यमंत्री' की भी मांग हो रही है जो न तो सिद्धारमैया हैं, न डीके शिवकुमार.
4 मई तक दिल्ली में है डीके
जो कुछ चल रहा है उससे डीके शिवकुमार की बेचैनी बढ़ी हुई है. समर्थकों ने ये बात पकड़ रखी है कि 2023 में सरकार गठन के समय एक 'पावर-शेयरिंग' समझौता (अढ़ाई-अढ़ाई साल का फॉर्मूला) हुआ था. शिवकुमार ने हाल ही में कहा था कि "वादा निभाना सबसे बड़ी ताकत होती है," जिसे आलाकमान को दिया गया एक स्पष्ट संदेश माना गया. उन्होंने खड़गे से मांग की है कि 4 मई तक इस पर फैसला सुना दिया जाए. डीके हाल ही में दिल्ली में तीन दिन रूक कर गए हैं. जहां उन्होंने खड़गे से मुलाकात की और अपनी बात रखी. पता नहीं कि उन्हें पार्टी ने क्या कहा.
सीएम सिद्धारमैया फिलहाल अपनी कुर्सी पर विराजे हैं लेकिन उनके भी रतजगे वाली स्थिति है कि पता नहीं कब इस्तीफा देने के लिए कह दिया जाए. कुर्सी बचाने के लिए 'हाईकमान' के भरोसे हैं. सिद्धारमैया ने बार-बार कहा है कि नेतृत्व परिवर्तन की बातें महज "मीडिया की अटकलें" हैं. पार्टी के अनुशासित सिपाही हैं और अगर हाईकमान उन्हें दिल्ली बुलाएगा या कोई फैसला लेगा, तो वे उसे मानेंगे. उनके खेमे के विधायक रह-रहकर एकजुटता दिखाते रहे हैं. दिल्ली आते-जाते भी रहते हैं. उनका भी पता नहीं कि उनके लोगों को पार्टी ने क्या कहा हुआ है.
यह स्टोरी असल में दो कद्दावर नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई है. जहां डीके शिवकुमार अपने 'त्याग' और पुराने 'वादे' का हवाला देकर कुर्सी मांग रहे हैं, वहीं सिद्धारमैया अपनी लोकप्रियता और विधायकों के समर्थन के दम पर पद छोड़ने को तैयार नहीं दिख रहे. खड़गे का "फिलहाल नहीं" कहना इस आग को पूरी तरह बुझाने के बजाय कुछ समय के लिए टालने जैसा है.
4 मई के बाद क्या होगा?
माना जा रहा है कि पार्टी 4 मई को होने वाले उपचुनावों और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों का इंतज़ार कर रही है, जिसके बाद कैबिनेट विस्तार या अन्य बदलावों पर विचार हो सकता है. तो क्या 4 मई को उपचुनावों के नतीजों के बाद कर्नाटक को नया मुख्यमंत्री मिलेगा? क्या डीके शिवकुमार का इंतज़ार खत्म होगा, या खड़गे साहब खुद बेंगलुरु की कमान संभालकर इस गृहयुद्ध को खत्म करेंगे? कर्नाटक की इस सियासी 'शतरंज' की हर चाल पर हमारी नज़र बनी रहेगी.
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