Special Intensive Revision (SIR) से जो धमाके बिहार और बंगाल में हुए, उसने देश की राजनीति पलट दी. असर चुनाव नतीजों में दिख चुका है. 24 साल बाद यही प्रोसेस कर्नाटक में भी शुरू हुआ है. चुनाव आयोग देश की वोटर लिस्ट को एकदम शुद्ध और पारदर्शी बनाने चला है. कर्नाटक में 30 जून से SIR ड्राइव की शुरुआत हुई है, जो 29 जुलाई तक चलेगी. करीब 59 हजार BLO घर-घर जाकर वोटर्स का वेरिफिकेशन कर रहे हैं. 5 अगस्त को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट आएगी और 7 अक्टूबर को फाइनल वोटर लिस्ट जारी की जाएगी.
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डीके शिवकुमार का काउंटर दांव और ब्रैंड एंबेसडर लुक
कर्नाटक में SIR के आते ही डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने पूरी बाजी ही पलट दी. न केवल खुद फॉर्म भरकर SIR के ब्रैंड एंबेसडर बने, बल्कि साथ बिठाकर पत्नी उषा शिवकुमार से भी फॉर्म भरवाया. सीएम होने के नाते अपने राज्य के लोगों से अपील भी की और चेतावनी भी दी कि SIR को हल्के में नहीं लेना है. SIR को लेकर डीके शिवकुमार ने दो बड़े फैसले किए हैं. ऐसे फैसले किसी और राज्य की सरकारों ने नहीं किए.
वोटर लिस्ट सफाई पर विवाद और सुप्रीम कोर्ट का रुख
आमतौर पर वोटर लिस्ट में नाम जोड़ना या हटाना एक सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन SIR को लेकर विवाद ही ये है कि चुनाव आयोग के जरिए बीजेपी उन लोगों के वोट कटवा रही है जो उसे वोट नहीं देते. ऐसे-ऐसे कागज मांगे जा रहे हैं जो लोगों के पास हैं नहीं. आधार को खारिज करने के बाद पासपोर्ट को भी नागरिकता का सबूत नहीं माना गया. नागरिकता साबित नहीं करने के नाम पर ही लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटने का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा हुआ है.
सरकारी योजनाओं का डर और कोर वोट बैंक की सुरक्षा
कर्नाटक में भी कुछ ऐसा होने का डर है, इसलिए डीके शिवकुमार ने काउंटर दांव चला है. एक तो ये पक्का किया कि लोग SIR में शामिल होने से कतराएं नहीं और हर हाल में अपना नाम SIR में दर्ज कराएं. डीके ने डर दिखाया कि अगर किसी का नाम वोटर लिस्ट से कट गया, तो उसका नाम कर्नाटक सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों की सूची से भी कट जाएगा. सरकार की गारंटी योजनाओं, पेंशन और मुफ्त राशन का लाभ मिलना बंद हो सकता है. इस एलान से सरकार ने मुफ्त योजनाओं 'गृह लक्ष्मी' और 'अन्न भाग्य' के लाभार्थियों को अलर्ट कर दिया है कि वे हर हाल में अपना नाम वोटर लिस्ट में बनाए रखें, ताकि कांग्रेस का कोर वोट बैंक सुरक्षित रहे.
कागजात की कमी और परमानेंट रेजिडेंस सर्टिफिकेट (PRC)
दूसरा एलान ये कि जिन लोगों के पास पेपर की दिक्कत होगी, उनके नाम भी सरकार कटने नहीं देगी. आधार नहीं, पासपोर्ट नहीं तो क्या हुआ, कर्नाटक सरकार अपने नागरिकों को नागरिकता साबित करने के लिए 'परमानेंट रेजिडेंस सर्टिफिकेट' (PRC) जारी करेगी. इसका सीधा मतलब ये है कि SIR से किसी का नाम कागज नहीं होने के कारण कट रहा होगा, तो PRC ऐसा होने नहीं देगा.
PRC की सख्त शर्तें और सेवा सिंधु पोर्टल
PRC भी सिर्फ उसे मिलेगा जो कर्नाटक में पैदा हुआ हो या कम से कम 10 साल से राज्य में रह रहा हो; जिसने कर्नाटक में कक्षा 12वीं तक कम से कम 10 साल पढ़ाई की हो; जिसके पास राज्य में खुद का मकान या जमीन हो, या माता-पिता यहां के निवासी हों; अथवा जिसके पास पहले से आधार, राशन कार्ड या वोटर लिस्ट में नाम का पुराना रिकॉर्ड हो. यह सर्टिफिकेट 'Seva Sindhu' पोर्टल पर ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से मिलेगा. इसके लिए सरकार ने तहसीलदारों को अधिकृत किया है और राज्यभर में 49,000 से ज्यादा सहायता केंद्र खोल दिए हैं.
प्रशासनिक ढाल और बंगाल की गलतियों से सबक
सीधे तौर पर PRC, SIR की उस कथित साजिश के खिलाफ कर्नाटक सरकार की प्रशासनिक ढाल है. SIR को लेकर बिहार और बंगाल में विवाद ही ये होता रहा कि वोटर लिस्ट से लोगों के नाम काटे जा रहे हैं. चुनाव आयोग की SIR ड्राइव के तहत अगर किसी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से कट जाता है, तो तकनीकी रूप से वह उस क्षेत्र का निवासी नहीं माना जाता. अगर उस नागरिक के पास राज्य सरकार से मिला PRC होगा, तो वह अचूक कानूनी ढाल बन जाएगा.
वोटर्स के लिए कानूनी कवच और केंद्र बनाम राज्य की जंग
डीके ने तैयारी की है कि अगर चुनाव आयोग किसी का नाम काटता है, तो राज्य सरकार का PRC सर्टिफिकेट उस नागरिक के लिए 'कानूनी कवच' बनेगा. अगर चुनाव आयोग किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटा भी देता है, तब भी वह व्यक्ति कोर्ट में PRC दिखाकर ये साबित कर सकता है कि वह कर्नाटक का ही वैध नागरिक है और उसका नाम गलती से या जानबूझकर काटा गया है. ऐसा कोई इंतजाम नहीं करने का नतीजा ममता बनर्जी बंगाल में भुगत चुकी हैं.
कन्नड़ अस्मिता का कार्ड और राजनीतिक ढाल
कांग्रेस को डर है कि चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट सफाई में उसके वोटर टारगेट हो सकते हैं. डीके न सिर्फ अपने वोट बैंक को सेफ कर रहे हैं, बल्कि लोकल सेंटिमेंट यानी 'कन्नड़ अस्मिता' का कार्ड खेलकर बीजेपी को बैकफुट पर भी धकेल रहे हैं. यह प्रशासनिक से ज्यादा एक विशुद्ध राजनीतिक ढाल है, जो आने वाले समय में केंद्र बनाम राज्य की एक नई कानूनी लड़ाई को जन्म दे सकती है.
गाइडलाइंस का पेंच और कड़े नियमों की वजह
SIR के लिए चुनाव आयोग की गाइडलाइंस के मुताबिक, साधारण रेजिडेंशियल सर्टिफिकेट (जो ग्राम पंचायतें देती हैं या रेंटल एग्रीमेंट के आधार पर बनते हैं) मान्य नहीं हैं. लेकिन राज्य सरकार से जारी किया गया PRC यानी स्थायी निवास प्रमाण पत्र ऐसा मजबूत दस्तावेज है जिसे आयोग स्वीकार कर सकता है. 5 अगस्त को जब ड्राफ्ट वोटर लिस्ट आएगी, तब पता चलेगा कि डीके सरकार का ये 'PRC का कानूनी कवच' जनता को बचा पाता है या चुनाव आयोग की 'सफाई मशीन' के आगे फेल हो जाता है.
पुराना रेजिडेंशियल सर्टिफिकेट (RC) बनाम नया PRC
कर्नाटक में पहले जो 'डोमिसाइल' या सामान्य 'रेजिडेंशियल सर्टिफिकेट' (RC) मिलता था, वह बहुत ही बुनियादी दस्तावेजों के आधार पर बन जाता था. पुराना सिस्टम था कि अगर कोई कर्नाटक में किसी किराए के मकान में रह रहा है, और उसके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, बिजली बिल या रेंटल एग्रीमेंट है, तो आसानी से सामान्य निवास प्रमाण पत्र मिल जाता था.
इसका इस्तेमाल केईए (KEA) काउंसलिंग, कॉलेज एडमिशन या स्थानीय छात्रवृत्ति (Scholarship) के लिए होता था. नया सर्टिफिकेट इसलिए लाना पड़ा क्योंकि SIR में पुराना सर्टिफिकेट टिक नहीं रहा था. आयोग को ऐसा दस्तावेज चाहिए जो राज्य के साथ व्यक्ति के बहुत लंबे और गहरे जुड़ाव (Long-term connection) को साबित करे. इसीलिए, राज्य सरकार ने आनन-फानन में कड़े नियमों वाला यह नया 'PRC' नोटिफाई किया, जिसके लिए कम से कम 10 साल राज्य में रहने या पढ़ाई करने जैसे कड़े सबूत अनिवार्य कर दिए गए हैं.
संवैधानिक प्रावधान और एकल नागरिकता का नियम
भारत का संविधान पूरे देश के लिए एकल नागरिकता देता है, यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ भारत का नागरिक होता है, किसी राज्य का नहीं. लेकिन संविधान का अनुच्छेद 15(1) and 16(3) राज्य सरकारों को यह शक्ति देता है कि वे शिक्षा, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं के लिए अपने राज्य के मूल निवासियों (Domicile) को प्राथमिकता दे सकती हैं. इसी शक्ति के तहत राज्य सरकारें 'स्थायी निवास प्रमाण पत्र' (PRC) या डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करती हैं. फिर भी यह कोई नागरिकता का सर्टिफिकेट नहीं है, बल्कि इस बात का कानूनी सबूत है कि व्यक्ति किसी राज्य का मूल निवासी है.
देश के अलग-अलग राज्यों में इसके अलग-अलग नाम
भारत के सभी राज्यों में इसका नाम PRC यानी Permanent Residence Certificate नहीं है. देश के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग-अलग नाम हैं, लेकिन सबका कानूनी काम और मतलब एक ही है—यह साबित करना कि आप उस राज्य के मूल या स्थायी निवासी हैं. डोमिसाइल सर्टिफिकेट या निवास प्रमाण पत्र उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में इसी नाम से इस्तेमाल होता है.
संवेदनशील प्रदेशों में PRC का बड़ा महत्व
पीआरसी (Permanent Residence Certificate - PRC) नाम देश के बेहद संवेदनशील या विशेष दर्जा प्राप्त प्रदेशों में इस्तेमाल होता है, जहाँ बाहरी लोगों के आने पर कुछ पाबन्दियाँ होती हैं. पूर्वोत्तर भारत के असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय तथा ओडिशा में भी इसे PRC कहा जाता है. अब कर्नाटक सरकार भी इसी नाम का इस्तेमाल कर रही है. पूर्वोत्तर के राज्यों में PRC होना बहुत बड़ी बात है. इसके बिना वहाँ कोई सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, न ही कोई जमीन खरीदी जा सकती है.
LRC और स्टेट सब्जेक्ट सर्टिफिकेट का इतिहास
झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जो बाद में बने और जहां स्थानीय आदिवासियों और प्रवासियों के बीच विवाद रहता है, वहां इसका नाम LRC (Local Resident Certificate) कहा जाता है, ताकि बाहरी और स्थानीय का अंतर साफ रहे. अगस्त 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर में इसे 'स्टेट सब्जेक्ट सर्टिफिकेट' कहा जाता था, जो सिर्फ वहां के पुश्तैनी लोगों को मिलता था. धारा 370 हटने के बाद इसका नाम बदलकर अब 'डोमिसाइल सर्टिफिकेट' कर दिया गया है.
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