Shesh Bharat: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ केरल में फिर खुला पुराना चैप्टर, सामने आया 2006 का मामला

रूपक प्रियदर्शी

• 08:51 AM • 02 Oct 2026

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़ा 2006 का पुराना मामला फिर चर्चा में है. केरल के गृह विभाग ने कथित तौर पर उस समय की विजिलेंस जांच की फाइलें तलब की हैं. मामला मलेशियाई इंजीनियर ली सी बीन की मौत और सुसाइड नोट में लगाए गए कथित आरोपों से जुड़ा है.

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ज्ञानेश कुमार को लेकर राहुल गांधी तो अरसे से मोर्चा खोले हुए हैं. चीख-चीखकर कह रहे हैं कि ज्ञानेश कुमार अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के बाद तो ज्ञानेश कुमार की पोल गई कि वो चुनावों को लेकर अकेले फैसले कर रहे थे. दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और एसएस संधू की आपत्तियों और असहमतियों को भी नहीं सुन रहे थे. मांगा जा रहा है ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा, जो वो दे नहीं रहे हैं. उन्हें जबरन हटाने की कोई कोशिश सफल हो नहीं पाएगी. इसलिए नया खेल हुआ है केरल में, जहां कांग्रेस की सरकार बनी है. केरल में वीडी सतीशन की सरकार ने ज्ञानेश कुमार की केरल में पोस्टिंग के दौरान हुए कांडों की फाइलें खोल दी हैं.

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ज्ञानेश कुमार का केरल से पुराना कनेक्शन

केरल सरकार जिस मामले की फाइलें खंगाल रही है, वो ज्ञानेश कुमार के चुनाव आयुक्त बनने से बहुत पहले का है. केरल में ज्ञानेश कुमार का पूरा करियर गुजरा, क्योंकि IAS बनने के बाद उनका कैडर केरल ही था. ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अफसर रहे हैं. उन्होंने वहां एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर, कोचीन कॉर्पोरेशन के म्यूनिसिपल कमिश्नर और केरल स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के MD जैसे कई पदों पर काम किया.

UDF और LDF दोनों सरकारों के साथ किया काम

केरल कैडर का होने के कारण ज्ञानेश कुमार ने राज्य की दोनों बड़ी राजनीतिक ताकतों यानी कांग्रेस के नेतृत्व वाली UDF (यूडीएफ) और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली LDF (एलडीएफ), दोनों ही सरकारों के साथ काम किया. लेकिन साल 2006 में LDF की अच्युतानंदन सरकार के दौरान एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने उनके करियर का रुख मोड़ दिया.

20 साल पुराने केस से फिर उठा मामला

20 साल पुराना एक सुसाइड नोट, मलेशिया से जुड़ा भ्रष्टाचार का एक ऐसा जिन्न, जो दो दशक बाद कब्र फाड़कर बाहर आ गया है ज्ञानेश कुमार को घेरने. ज्ञानेश कुमार को फांसने के लिए जो एक मामला पकड़ में आया है, वो 2006 का है. कहानी साल 2006 की है, जब ज्ञानेश कुमार केरल में PWD यानी लोक निर्माण विभाग के वर्क्स सेक्रेटरी थे. उस वक्त केरल राज्य परिवहन परियोजना (KSTP) के तहत सड़कों के अपग्रेडेशन का एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट एक मलेशियन कंपनी के पास था. इसी कंपनी के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर और मलेशियन सिविल इंजीनियर ली सी बीन (Lee See Been) ने कुआलालंपुर में अचानक खुदकुशी कर ली.

सुसाइड नोट में गंभीर आरोपों का जिक्र

मौत से पहले लिखे गए कथित सुसाइड नोट में मलेशियन इंजीनियर ने प्रशासनिक प्रताड़ना, फाइलों को रोकने और रिश्वत मांगे जाने के संगीन आरोप लगाए, जिसमें ज्ञानेश कुमार का नाम प्रमुखता से शामिल था. इस तहलका मचाने वाले खुलासे के बाद 2006 में ही विजिलेंस ब्यूरो ने उनके खिलाफ एक प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) शुरू की थी. हालांकि, ज्ञानेश कुमार बाद में Central Deputation पर दिल्ली आ गए और फाइल ठंडे बस्ते में चली गई.

केरल के गृह विभाग ने मांगी पुरानी जांच की फाइल

दक्षिण भारत के बड़े मीडिया आउटलेट्स में इस वक्त यही स्टोरी फ्रंट पेज पर तैर रही है. साउथ के अखबारों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, केरल के गृह विभाग ने विजिलेंस ब्यूरो को अचानक समन जारी कर ज्ञानेश कुमार से जुड़ी उस 2006 की जांच की सभी फाइलें और रिकॉर्ड्स तलब कर लिए हैं. इस एक्शन और जांच की चर्चा इसलिए है कि ये सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश में चल रही बड़ी राजनीतिक जंग का हिस्सा हो सकता है. केरल सरकार ने जो फाइल मंगवाई है, उसका मकसद सिर्फ एक पुरानी खुदकुशी की गुत्थी सुलझाना नहीं, बल्कि ज्ञानेश कुमार को यह याद दिलाना है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं.

2023 के कानून से जुड़ा कानूनी पेंच

2023 का केंद्र सरकार का बनाया वो विवादित कानून, जो देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को हर कानूनी कार्रवाई के खिलाफ एक अभेद्य सुरक्षा कवच देता है. एक ऐसी कानूनी ढाल जो उन्हें किसी भी क्रिमिनल एक्शन से बचाती है! लेकिन क्या ये सुरक्षा कवच केरल के एक 20 साल पुराने चक्रव्यूह के सामने फेल होने वाला है? ज्ञानेश कुमार को लेकर केरल से आ रही धमाकेदार स्टोरी यही है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भले ही केंद्र के कानून से सुरक्षा मिली हो, लेकिन केरल की कांग्रेस सरकार ने उनकी केरल में पोस्टिंग के दौरान हुए विवादों के जरिए उन्हें घेरने की पूरी तैयारी हो रही है. इसी से अब तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा है.

CEC की कानूनी इम्युनिटी पर सवाल

पूरा कानूनी पेंच इसी बात पर अटका है कि क्या साल 2023 में पास हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त कानून की धारा 16 के तहत मिली सुरक्षा, ज्ञानेश कुमार को उनके अतीत के विवादों से बचा पाएगी? इस कानून के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों को उनके पद पर रहते हुए किए गए ऑफिशियल कामों के लिए दीवानी और आपराधिक कार्रवाई से संरक्षण प्राप्त है. केरल सरकार इसी कानूनी पेंच का फायदा उठा रही है. CEC को मिली कानूनी इम्युनिटी केवल उनके 'आधिकारिक चुनावी कर्तव्यों' यानी Official Electoral Duties के लिए है. यह सुरक्षा उन्हें दो दशक पहले एक राज्य के सचिव के रूप में किए गए किसी कथित व्यक्तिगत या प्रशासनिक मिसकंडक्ट के मामले में पूर्ण सुरक्षा नहीं देती.

पुरानी जांच होने से कानूनी पेंच अलग

सर्विस रूल्स के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी या IAS के रिटायर होने के 4 साल के भीतर ही किसी नए कदाचार या मामले में विभागीय पूछताछ या कार्रवाई शुरू की जा सकती है. लेकिन ज्ञानेश कुमार के मामले में कानूनी पेंच अलग है. उनके खिलाफ यह जांच नई नहीं है, बल्कि 2006 में उनके सर्विस में रहते हुए ही शुरू की गई एक पेंडिंग इंक्वायरी (Pending Enquiry) है. जब जांच पहले से दर्ज हो, तो फाइलें दोबारा खोली जा सकती हैं और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है.

मामले में राजनीतिक एंगल भी

ये केवल कोई प्रशासनिक जांच नहीं है. राजनीति तो है इसमें. दिल्ली में राहुल गांधी लीड हुए हैं और पूरा विपक्ष वोटर लिस्ट के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आक्रामक है. सुप्रीम कोर्ट में भी 2023 के कानून, लीगल प्रोटेक्शन लेकर याचिकाएं लंबित हैं. केरल की कांग्रेस सरकार का ठीक इसी वक्त 20 साल पुरानी फाइलों को विजिलेंस से तलब करना, सीधे तौर पर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त पर एक बड़ा नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है.

बीजेपी से जुड़े आरोप का भी हुआ जिक्र

केरल से ही ज्ञानेश कुमार पर बीजेपी के लिए काम करने का एक और आरोप लगा. पूर्व मुख्य सचिव जीजी थॉमसन ने दावा किया था कि 2016 में ज्ञानेश कुमार ने उन्हें बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने का सुझाव दिया था. ये खुलासा थॉमसन ने तब किया, जब एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद ज्ञानेश कुमार पर प्रेशर बढ़ा.

पुराने विवाद फिर चर्चा में

भले ही 2023 का कानून ज्ञानेश कुमार को पद पर रहते हुए सीधे तौर पर गिरफ्तार होने या तुरंत किसी बड़ी अदालती कार्रवाई से बचाता हो, लेकिन केरल सरकार के इस कदम से यह साफ है कि उनके अतीत के विवाद अब उनकी पोजिशन को प्रभावित करने वाले हैं. अगर केरल विजिलेंस इस मामले में आगे बढ़ती है, तो मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर भी पहुंचेगा, जहां CEC की इस 'संवैधानिक ढाल' की असली परीक्षा होगी.

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