नौगांव लोकसभा सीट का उपचुनाव अब एक ऐसी पॉलिटिकल थ्रिलर फिल्म बन चुका है, जिसका क्लाइमेक्स किसी को नहीं पता. ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के सुप्रीमो बदरुद्दीन अजमल ने आखिरी वक्त पर खुद इस सीट से पर्चा दाखिल कर पूरे असम की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है. कांग्रेस इसे बीजेपी की 'बी-टीम' की चाल बता रही है, तो बीजेपी इसे कांग्रेस के पतन का आखिरी अध्याय बता रही है. आखिर इस एक उपचुनाव पर पूरे देश की नजरें क्यों टिक गई हैं?
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2024 के बाद नौगांव में फिर क्यों हो रहा चुनाव?
अब सवाल यह कि जब 2024 में देश में लोकसभा चुनाव हो चुके थे, तो यहां 2026 में दोबारा चुनाव क्यों हो रहा है? कहानी में ट्विस्ट यहीं है. यह सीट कांग्रेस का अभेद्य किला थी. कांग्रेस के प्रद्युत बोरदोलोई नौगांव से लगातार दो बार सांसद चुने गए. लेकिन मार्च में असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस को 'बाय-बाय' कह दिया और बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी के टिकट पर उन्होंने दिसपुर से विधानसभा चुनाव जीता और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया, जिसके कारण नौगांव में उपचुनाव कराया जा रहा है.
कांग्रेस के लिए एक सीट, असम बीजेपी के लिए बड़ी परीक्षा
लोकसभा की टैली में एक सीट से केंद्र सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कांग्रेस के लिए ये सीट जरूर अहम है. 2024 के चुनाव में कांग्रेस 99 पर जीती थी. नौगांव से प्रद्युत बोरदोलोई ने कांग्रेस के लिए ये सीट जीती थी, लेकिन उनके इस्तीफे से कांग्रेस की सीट घटकर 98 रह गई. अगर कांग्रेस उपचुनाव जीती तो फिर 99 पर पहुंच जाएगी. हार गई तो एक सीट बीजेपी की या किसी और की बढ़ जाएगी. कांग्रेस 98 पर रह जाएगी.
असम में बीजेपी में सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के लिए ये साबित करने का चुनाव है कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी फ्लूक से नहीं जीती. अगर बीजेपी कांग्रेस की ये सीट झपट ले गई तो उसका दबदबा मजबूत होगा, लेकिन हारी तो हिमंता के लिए बड़ा झटका होगा.
बदरुद्दीन अजमल के लिए क्यों अहम है चुनाव?
दिल्ली की बीजेपी को कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला. विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बनने के बाद अचानक लोकसभा चुनाव में कूदे बदरुद्दीन अजमल के लिए यह करो या मरो की लड़ाई है. अगर वो हारे, तो उनकी राजनीति का अंत माना जाएगा, और अगर वो मुस्लिम वोटों को अपने पाले में खींच ले गए, तो किंगमेकर बनकर उभरेंगे.
कौन हैं बदरुद्दीन अजमल?
मौलाना बदरुद्दीन अजमल असम के एक रसूखदार इस्लामिक धर्मगुरु, अरबपति बिजनेसमैन और नेता हैं. उन्हें परफ्यूम किंग भी कहा जाता है. उनका परिवार अजमल परफ्यूम्स ब्रांड का मालिक है. दारुल उलूम देवबंद से पढ़े अजमल असम में 'जमीयत उलेमा-ए-हिंद' के अध्यक्ष हैं. साल 2005 तक वह केवल बड़े कारोबारी और धार्मिक नेता थे, लेकिन असम के सामाजिक-राजनीतिक हालातों को देखते हुए उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और 2 अक्टूबर 2005 को AIUDF यानी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम से अपनी पार्टी का गठन किया. कांग्रेस और बीजेपी के बीच झूलती राजनीति में अजमल किंगमेकर बनकर उभरे. अजमल धुबरी सीट से तीन बार सांसद रह चुके हैं और फिलहाल बिन्नाकंडी से विधायक हैं. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन्हें 10 लाख से ज्यादा वोटों से हराकर अर्श से फर्श पर ला दिया था. अब खोई हुई सल्तनत को वापस पाने के लिए अजमल ने नौगांव के दंगल में खुद छलांग लगा दी है.
IMDT एक्ट के बाद बनाई AIUDF
अजमल को अपनी पार्टी बनाने की जरूरत तब महसूस हुई, जब साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित IMDT (Illegal Migrants Determination by Tribunal) एक्ट को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया. असम के बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय को लगा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार कोर्ट में इस कानून को बचा नहीं पाई और अब उनके नागरिक अधिकारों पर खतरा है. उसी राजनीतिक असंतोष का फायदा उठाकर अजमल ने AIUDF का गठन किया. उनका राजनीतिक आधार असम के लगभग 35% मुस्लिम, खासकर बंगाली भाषी मुसलमान हैं. मुस्लिम बहुल इलाकों जैसे धुबरी, करीमगंज, बारपेटा और नौगांव में अजमल ने अपनी मसीहा या पीर या धार्मिक गुरु की तरह ब्रैंडिंग की, जिसके कारण वे 2009 से 2024 तक लगातार तीन बार धुबरी से सांसद रहे.
कांग्रेस और अजमल के रिश्ते में क्यों आया उतार-चढ़ाव?
असम की राजनीति में कांग्रेस और अजमल का रिश्ता हमेशा 'कभी हां, कभी ना' वाला रहा है. शुरुआत में अजमल ने कांग्रेस के पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई, जिससे तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई उनके कट्टर विरोधी बन गए थे. 2011 में तरुण गोगोई ने बयान दिया था "कौन है यह अजमल?" लेकिन बदलते वक्त के साथ, बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए मजबूरन 2021 के असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और AIUDF ने 'महाजोत' बनाया. हालांकि, चुनाव में हार के तुरंत बाद कांग्रेस ने अजमल पर बीजेपी के साथ अंदरूनी सांठगांठ करने का आरोप लगाते हुए गठबंधन तोड़ दिया. तब से दोनों एक-दूसरे के धुर विरोधी बने हुए हैं और कांग्रेस लगातार AIUDF को बीजेपी की 'बी-टीम' कहती आ रही है.
2026 में AIUDF के सामने बड़ी चुनौती
असम विधानसभा चुनाव 2026 में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF को अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजरना पड़ा है. कांग्रेस से नाता टूटने के बाद अकेले चुनाव मैदान में उतरी AIUDF सिर्फ 2 सीटों पर सिमट कर रह गई. यह पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा झटका था, क्योंकि 2021 के चुनाव में उसने 16 सीटें जीती थीं. नागरिकता संकट (NRC) और डिटेंशन सेंटर्स के मुद्दों पर अल्पसंख्यक समुदाय की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने और कांग्रेस के आक्रामक प्रचार और बीजेपी के विस्तार के कारण अजमल का यह किला पूरी तरह ढह गया. वो लगातार पिछड़ रहे हैं.
विधायक बनने के बाद भी लोकसभा चुनाव में क्यों उतरे?
असम विधानसभा चुनाव 2026 में अजमल खुद बिन्नाकंडी (Binnakandi) सीट से भारी बहुमत से चुनाव जीतकर विधायक बने हैं. इसके बावजूद, नौगांव लोकसभा उपचुनाव में उनके खुद उतरने के पीछे 'पार्टी का अस्तित्व बचाने' का बड़ा संकट है.
2024 की हार के बाद वापसी की कोशिश
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रकीबुल हुसैन ने अजमल को उनके गढ़ धुबरी में 10 लाख से अधिक वोटों के ऐतिहासिक अंतर से करारी शिकस्त दी थी. इसके बाद 2026 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. ऐसे में बदरुद्दीन अजमल अच्छी तरह जानते हैं कि अगर AIUDF को असम की राजनीति में Relevant बनाए रखना है, तो नौगांव उपचुनाव में उनकी पार्टी का मजबूत प्रदर्शन बेहद जरूरी है. वे खुद एक बड़े चेहरे हैं, इसलिए कार्यकर्ताओं के दबाव और दिल्ली की राजनीति में अपनी धमक दोबारा कायम करने के लिए उन्होंने विधायक रहते हुए भी यह दांव खेला है.
बीजेपी के निशाने पर क्यों रहते हैं अजमल?
बीजेपी उन्हें असमिया अस्मिता और संस्कृति के लिए एक 'खतरे' के रूप में पेश करती है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अक्सर अजमल के बयानों और उनकी राजनीति का हवाला देकर हिंदुओं को एकजुट करते हैं. अपनी धार्मिक वेशभूषा, अरबों के इत्र कारोबार, विवादित बयानों और असम की सत्ता की चाबी अपने पास रखने की महत्वाकांक्षा के कारण अजमल हमेशा मीडिया और राजनीति की सुर्खियों में बने रहते हैं.
अजमल की एंट्री से कांग्रेस में हलचल
अजमल की एंट्री होते ही कांग्रेस कैंप में खलबली मच गई है. असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि बीजेपी घबरा गई थी, इसलिए उसने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की मदद के लिए अजमल को मैदान में उतारा है. दरअसल, नौगांव एक मुस्लिम बहुल सीट है. यहां अगर मुस्लिम वोट कांग्रेस और अजमल में बंटे, तो कांग्रेस का पत्ता साफ होने का खतरा है.
बीजेपी ने पूर्व IAS अधिकारी को दिया टिकट
बीजेपी ने नौगांव से चौंकाने वाला उम्मीदवार देवाशीष शर्मा को उतारा है. देवाशीष कोई नेता नहीं हैं, बल्कि वो इसी नौगांव के जिला उपायुक्त (DC) रह चुके हैं. चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने बाकायदा IAS की नौकरी से VRS ली और ठीक चुनाव से पहले बीजेपी ज्वाइन की.
कांग्रेस ने पुरानी नेता और पूर्व विधायक सिबामोनी बोरा को टिकट दिया है. सिबामोनी की इस इलाके में मजबूत पकड़ है और वे कांग्रेस के इस पुराने गढ़ को बचाने की इकलौती उम्मीद हैं. बटाद्रवा विधानसभा सीट से कांग्रेस की पूर्व विधायक रही हैं.
6 अक्टूबर को मतदान, 9 अक्टूबर को आएगा नतीजा
तो खेल बिल्कुल साफ है एक तरफ पूर्व IAS अधिकारी हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस की अपनी विरासत बचाने की छटपटाहट, और इन सबके बीच में एंट्री मारी है उस 'राजनीतिक जादूगर' ने जो पूरा गेम पलटने का माद्दा रखता है. 6 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा और 9 अक्टूबर को जब ईवीएम खुलेगी, तब पता चलेगा कि असम की राजनीति में नौगांव की जनता किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है.
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