दिल्ली की सड़कों पर 6 अक्टूबर को जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ विपक्ष का हुजूम CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ रहा था, तब बैरिकेड्स पर दो ऐसे चेहरे दिखाई दिए, जिन्होंने बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं. ये चेहरे थे नवीन पटनायक की पार्टी BJD के सांसद मानस मंगराज और सुलता देव के. दशकों तक दिल्ली की राजनीति में 'एकला चलो रे' की नीति पर चलने वाले और कांग्रेस को कभी भाव न देने वाले ओडिशा के 'शालीन जादूगर' का यह रूप देखकर हर कोई हैरान रह गया. संसद की सीढ़ियों से लेकर लुटियंस की सड़कों तक आज एक ही सवाल गूंज रहा है, आखिर नवीन पटनायक ने राजनीति का यह सबसे बड़ा यू-टर्न क्यों लिया?
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बीजेपी और कांग्रेस से समान दूरी की राजनीति
साल 2000 से 2024 तक ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक की राजनीति का एक ही मूलमंत्र था. बीजेपी और कांग्रेस से समान दूरी. लेकिन हकीकत यह थी कि सत्ता में रहते हुए नवीन बाबू ने कांग्रेस और समूचे विपक्ष को कभी 'जी' में नहीं लगाया. बीजेपी के साथ सुविधा वाले राजनीतिक संबंध बनाए रखे. जब-जब दिल्ली में कांग्रेस और राहुल गांधी एकजुट होकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करते, भुवनेश्वर से नवीन पटनायक का एक मौन इशारा होता और संसद में बीजेडी के सांसद बीजेपी के लिए संकटमोचक बनकर खड़े हो जाते थे.
बीजेपी के मुद्दों पर समर्थन देते रहे नवीन बाबू
बीजेपी की पसंद वाले मुद्दों पर बिना शर्त समर्थन देते रहे. चाहे तीन तलाक का बिल हो, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाना हो, या फिर राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी- नवीन बाबू ने हमेशा केंद्र सरकार की नीतियों का खुलकर साथ दिया. बदले में बीजेपी से कभी कुछ मांगा भी नहीं.
विपक्ष से बनाई रखी दूरी
बल्कि विपक्ष से सख्त दूरी बना रखी. कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए या इंडिया गठबंधन के किसी भी न्योते को उन्होंने बड़े सलीके से ठुकराया. नीतीश कुमार इंडिया अलायंस में बुलाने भुवनेश्वर पहुंच गए तो मुंह पर ना कहकर लौटा दिया. विपक्ष चिल्लाता रहा कि बीजेडी, बीजेपी की 'बी-टीम' है, लेकिन नवीन बाबू अपनी चिरपरिचित रहस्यमयी मुस्कान के साथ राज्य के विकास का हवाला देकर अपनी चाल चलते रहे.
2024 में बीजेपी ने ही खत्म कर दी 24 साल पुरानी सरकार
कहते हैं राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, यहां सिर्फ हित स्थायी होते हैं. 2024 के ओडिशा विधानसभा चुनाव में जिस बीजेपी को नवीन बाबू ने दिल्ली में खाद-पानी दिया, उसी बीजेपी ने ओडिशा में उनकी 24 साल पुरानी सरकार को उखाड़ फेंका. पार्टी बीजेडी को भी नहीं छोड़ा. राजनीति के इस कड़वे सबक ने 78 साल की उम्र में नवीन पटनायक को अपनी पूरी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया.
अब बदले रुख के साथ सड़क पर उतरे नवीन पटनायक
अब नवीन बाबू कैसी राजनीतिक चालें चल रहे हैं. चुनाव आयोग के SIR और वोटर लिस्ट से अल्पसंख्यकों के नाम काटे जाने के मुद्दे पर नवीन पटनायक ने न सिर्फ CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की, बल्कि अपने सांसदों को सीधे राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने दिल्ली भेज दिया.
सिर्फ दिल्ली ही नहीं, ओडिशा में भी नवीन पटनायक खुद सड़कों पर उतरकर केंद्र सरकार के माइन्स एंड मिनरल्स (MMDR) संशोधन कानून को 'काला कानून' बताते हुए बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे हैं. हालांकि बीजेडी सांसद सुलता देव ने साफ किया है कि वो अभी भी 'इंडिया गठबंधन' का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन जमीन पर उनका एक्शन कांग्रेस की लाइन से पूरी तरह मेल खा रहा है.
राहुल के मार्च में BJD सांसदों का गर्मजोशी से स्वागत
राहुल गांधी के सेव डेमोक्रेसी मार्च में जब नवीन पटनायक के सांसद हाथों में तख्तियां लेकर पहुंचे, तो विपक्षी खेमे में खुशी की लहर दौड़ गई और 'इंडिया' गठबंधन के नेताओं ने दिल खोलकर उनका स्वागत किया. जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर बाकायदा तस्वीर साझा करते हुए इस कदम को 'लोकतंत्र और संविधान को बचाने की साझा लड़ाई में एक ऐतिहासिक मोड़' बताया.
मार्च का नेतृत्व कर रहे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी गर्मजोशी से बीजेडी सांसदों का स्वागत किया. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा समेत अन्य विपक्षी दिग्गजों ने नवीन बाबू के इस यू-टर्न को देश की स्वायत्त संस्थाओं को बचाने के लिए एक 'साहसिक और जरूरी कदम' करार दिया. विपक्षी नेताओं ने एक सुर में कहा कि 24 साल तक भाजपा की नीतियों को मूक समर्थन देने वाली बीजेडी का आज दिल्ली की सड़कों पर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना यह साबित करता है कि अब मोदी सरकार की तानाशाही के खिलाफ क्षेत्रीय दलों का सब्र पूरी तरह टूट चुका है.
राज्यसभा में नवीन पटनायक के रुख का क्या असर होगा?
नवीन पटनायक के इस आक्रामक अवतार के बाद देश और ओडिशा की राजनीति में आने वाले दिनों में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. लोकसभा में भले ही आज बीजेडी के पास शून्य सीटें हों, लेकिन राज्यसभा में उनके 7 सांसद हैं. नवीन बाबू के इस बदले रुख के बाद अब मोदी सरकार के लिए राज्यसभा में कोई भी कड़ा बिल पास कराना टेढ़ी खीर साबित होगा. नवीन पटनायक भविष्य में ओडिशा की जनता के बीच यह संदेश लेकर जा सकते हैं कि बीजेपी सरकार ओडिशा के संघीय अधिकारों और वित्तीय स्वायत्तता पर हमला कर रही है. वे राज्य में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए धुर-बीजेपी विरोधी राजनीति को अपनी ढाल बनाएंगे.
क्या आगे भी जारी रहेगा नवीन पटनायक का यह रुख?
दो सांसदों को राहुल गांधी के प्रोटेस्ट में भेजकर नवीन बाबू ने क्यों प्रयोग किया या आगे यही स्टैंड रहेगा, इसकी कोई पुष्टि नहीं है. बस इशारा है कि नवीन बाबू भले ही औपचारिक रूप से कांग्रेस या 'इंडिया गठबंधन' में शामिल न हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को घेरने वाले हर उस मुद्दे का साथ देंगे, जो सीधे जनता या संघवाद से जुड़ा हो.
2024 की हार के बाद बदली राजनीतिक चाल
2024 तक नवीन पटनायक का राजनीतिक सफर हमेशा एक शांत नदी की तरह दिखता था, लेकिन 2024 की हार ने उस नदी में ऐसा ज्वार पैदा किया है, जिसने दिल्ली तक की सियासी नींव हिला दी है. सत्ता में रहते हुए जिन्होंने कभी विपक्ष को तरजीह नहीं दी, आज वही नवीन बाबू बैरिकेड्स पर खड़े होकर विपक्ष की आवाज को ताकत दे रहे हैं. यह यू-टर्न साबित करता है कि 'जादूगर' भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतर चुका हो, लेकिन राजनीति की बिसात पर वे आज भी अपनी एक चाल से पूरी बाजी पलटने का माद्दा रखते हैं.
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