Shesh Bharat: कागजी समर्थन या सियासी मजबूरी? UCC पर चंद्रबाबू नायडू का स्टैंड सिर्फ हेडलाइन बनाने के लिए या जमीन पर भी कोई तैयारी?

रूपक प्रियदर्शी

16 Sep 2026 (अपडेटेड: Sep 16 2026 9:16 AM)

अमित शाह ने 2029 से पहले 21 NDA-शासित राज्यों के जरिए बैकडोर से UCC लागू करने का दांव चला है, जिस पर विशेष फंड की एवज में टीडीपी ने समर्थन जताया है तो बिहार के मुस्लिम वोट बैंक को बचाए रखने के लिए जेडीयू खुलकर विरोध में उतर आई है.

अमित शाह
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Shesh Bharat: संसद में बहुमत का आंकड़ा नहीं है. सहयोगियों की बैसाखी पर दिल्ली की सरकार टिकी है... लेकिन एजेंडा अपनी जगह से 1 इंच भी पीछे नहीं हटा है! गृह मंत्री अमित शाह ने ऐसा मास्टरस्ट्रोक चल दिया है जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है. अमित शाह ने एलान कर दिया है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के सभी 21 एनडीए-शासित राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू होकर रहेगा. यानी नेशनल लेवल पर कानून लाकर सरकार गिराने का रिस्क नहीं लेना, बल्कि राज्यों के रास्ते बैकडोर एंट्री करानी है. 

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असली ट्विस्ट अमित शाह के एलान के बाद शुरू हुआ है. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी ने सरकार के फैसले के आगे सरेंडर कर दिया है लेकिन बिहार में नीतीश कुमार की जेडीयू ने नो एंट्री का बोर्ड टांग दिया है. लेकिन सवाल ये है कि चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी का समर्थन और जेडीयू का विरोध केवल हेडलाइन बनाने के लिए है या समर्थन और विरोध के लिए सचमुच ग्राउंड पर कोई काम हो रहा है.

सरकार जानती है कि संसद में देश में UCC लागू करने के लिए बिल लाना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा है. जेडीयू और टीडीपी जैसे सहयोगियों के भरोसे चल रही सरकार दिल्ली में कोई भी रिस्क नहीं ले सकती. यही वजह है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने प्लान बी एक्टिवेट कर दिया. संविधान की समवर्ती सूची Concurrent List का फायदा उठाते हुए बीजेपी ने एनडीए शासित राज्यों के रास्ते लागू करने की टाइमलाइन तय कर दी है. उत्तराखंड मॉडल पहले से तैयार है, गुजरात और असम लाइन में लगे हैं. रणनीति साफ है— सहयोगियों को दिल्ली में बिना नाराज किए, 2029 के चुनाव के लिए 21 राज्यों के जरिए देश की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी पर UCC लागू कर दिया जाए, ताकि नेशनल लेवल पर मैसेज भी चला जाए और सरकार पर भी कोई आंच न आए.

चंद्रबाबू नायडू का रुख 

आंध्र प्रदेश से सरकार क किंगमेकर चंद्रबाबू नायडू का रुख कहानी का सबसे चौंकाने वाला मोड़ है. चुनाव जीतने से पहले नायडू ने आंध्र के मुसलमानों से वादा किया था कि वो कभी भी उनके पर्सनल लॉ और UCC का समर्थन नहीं करेंगे. लेकिन सत्ता में आते ही टीडीपी का स्टैंड बदला है. पहले संसद में वक्फ संशोधन बिल पर टीडीपी ने सरकार का खुला समर्थन किया, और अब अमित शाह के UCC वाले बयान पर भी घुटने टेक दिए हैं. लोकसभा में 16 सांसदों के साथ एनडीए (NDA) की सबसे मजबूत और तेलुगु देशम पार्टी ने गृह मंत्री अमित शाह के अभियान को ऑक्सीजन दे दी है. 

टीडीपी के संसदीय दल के नेता लावु श्री कृष्ण देवरायालु ने कह दिया है कि हम UCC का समर्थन करेंगे. हालांकि, उन्होंने मुसलमानों को शांत करने के लिए स्टेकहोल्डर्स से बातचीत का सेफ क्लॉज जरूर जोड़ा है, लेकिन बड़ी पिक्चर दिखाने के लिए टीडीपी अब बीजेपी की पिच पर खेल रही है.लावून ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर कोई सीधी चर्चा नहीं चल रही है, और जब भी इस कानून को अपनाने की जरूरत महसूस होगी, पार्टी जल्दबाजी करने के बजाय अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पक्षों (Stakeholders) से व्यापक बातचीत के बाद ही अंतिम कदम उठाएगी.

लेकिन यूसीसी के लिए आंध्र की तैयारी बीजेपी शासित राज्यों के मुकाबले किसी टक्कर में नहीं है. आंध्र प्रदेश सरकार ने अभी तक UCC को लेकर अपनी राज्य विधानसभा या सरकारी स्तर पर कोई भी कमेटी तक नहीं बनाई है. चंद्रबाबू नायडू का समर्थन केवल कागजी और सैद्धांतिक है. नायडू इतना तो समझते हैं कि आंध्र में सीधे उत्तराखंड की तरह बिल लाना उनकी राजनीति में आग लगा सकता है. क्या पता टीडीपी ने दिल्ली में सरकार को खुश करने के लिए यूसीसी समर्थन का बयान तो दिलवा दिया, लेकिन आंध्र की जमीन पर कोई कानूनी तैयारी या कमेटी गठित करने से पूरी तरह तौबा कर रखी है. राजनीति में इसे ही वेट एंड वॉच का खेल कहते हैं.

 बिहार में किसी भी कीमत पर UCC लागू नहीं होने देंगे

यूसीसी पर टीडीपी की कोई तैयारी नहीं, सरकार के लिए ये चिंता नहीं. चिंता है जेडीयू जिसने बीजेपी के इस चक्रव्यूह के आगे अपनी ढाल अड़ा दी है. नीतीश कुमार तो कुछ बोले नहीं लेकिन जेडीयू के महासचिव श्याम रजक ने एलान कर दिया कि हम बिहार में किसी भी कीमत पर UCC लागू नहीं होने देंगे. सवाल उठता है कि क्या नीतीश कुमार का यह विरोध सिर्फ दिखावा है? 

जेडीयू का ये विरोध कागजी नहीं बल्कि जेडीयू के वजूद की लड़ाई है. बिहार में भले ही नीतीश कुमार सीएम की कुर्सी से हट चुके हों और बीजेपी के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन चुके हों, लेकिन जेडीयू जानती है कि अगर उन्होंने वक्फ के बाद UCC पर भी सरेंडर किया, तो बिहार का सेक्युलर और मुस्लिम वोटर कभी माफ नहीं करेगा. चर्चा है जेडीयू के संजय झा अमित शाह से दिल्ली में मिलेंगे लेकिन संजय झा अमित शाह को झुका पाएंगे, ये सवाल है. 

यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर नीतीश कुमार का स्टैंड अरसे से Consensus and Consultation का रहा है, जिसे 'शर्तों के साथ समर्थन' कहा जा सकता है. 2017 में नीतीश कुमार ने लॉ कमिशन को लिखी चिट्ठी में कहा था कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में UCC को किसी राजनीतिक हथियार की तरह जल्दबाजी में थोपा नहीं जाना चाहिए.  कानून को लाने से पहले सभी धार्मिक समूहों, विशेषकर अल्पसंख्यकों और जनजातीय समुदायों (Tribals) को विश्वास में लेकर एक व्यापक राष्ट्रीय आम सहमति बनाना अनिवार्य है. करीब 9 साल बाद स्थिति ये है कि Consultation तो हो रहा है लेकिन राज्यों के बहाने. Consensus के बिना एलान हो गया है कि 2029 तक 21 राज्यों में यूसीसी.

यूसीसी के विरोध और समर्थन का असली क्लाइमेक्स छिपा है आंध्र और बिहार की डेमोग्राफी यानी मुसलमानों की आबादी और वोट बैंक के आंकड़ों में. बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 17.7 प्रतिशत है. कम से कम 45 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर अकेले किसी की भी किस्मत बना या बिगाड़ सकते हैं. नीतीश कुमार की पूरी राजनीति 'लव-कुश' और 'अल्पसंख्यक' गठजोड़ पर टिकी है. अगर नीतीश ने UCC पर बीजेपी को वॉकओवर दिया, तो बिहार में जेडीयू का नुकसान हो सकता है. इसीलिए जेडीयू मजबूत और आक्रामक स्टैंड दिखा रही है.

 राज्य की कुल आबादी में मुस्लिम

2011 की जनगणना के मुताबिक जब आंध्र प्रदेश अविभाजित था, तब राज्य की कुल 8.45 करोड़ से ज्यादा की आबादी में करीब 7.48 करोड़ हिंदू और लगभग 80.8 लाख मुस्लिम आबादी दर्ज की गई थी. यानी राज्य की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी थी. हालांकि 2014 में राज्य के बंटवारे के बाद मौजूदा आंध्र प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी घटकर 7.33% करीब 36.17 लाख रह गई है, लेकिन कर्नूल, अनंतपुर और गुंटूर जैसे जिलों में आज भी यह आबादी 15 से 17 फीसदी के साथ हार-जीत तय करती है. चंद्रबाबू नायडू के लिए यह आबादी उतनी बड़ी मजबूरी नहीं है जितनी नीतीश के लिए बिहार में है. नायडू के लिए इस वक्त मुस्लिमों की नाराजगी से ज्यादा जरूरी है केंद्र सरकार से आंध्र प्रदेश के लिए मिलने वाला विशेष आर्थिक पैकेज और अमरावती राजधानी के लिए हजारों करोड़ का फंड. इसी 'फंड और फायदे' के गणित के चक्कर में नायडू ने मुस्लिमों के वोट बैंक का रिस्क उठाते हुए UCC पर बीजेपी की लाइन को स्वीकार कर लिया है!

मोदी सरकार का यह पैंतरा भारतीय राजनीति का चालाक फेडरल गेम प्लान' है. केंद्र सरकार अच्छी तरह जानती है कि संसद में राष्ट्रीय स्तर पर एक देश-एक कानून का बिल लाना सरकार को आलोचना, निशाने पर लाने जैसा होगा. दिल्ली में सीधे टकराव से बचने के लिए सरकार ने संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) का मास्टरकार्ड खेला है. पर्सनल लॉ और नागरिक संहिता चूंकि केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए सरकार राष्ट्रीय स्तर पर कोई कानून लाने के बजाय 'बैकडोर एंट्री' का रास्ता चुन चुकी है. 

रणनीति साफ है— दिल्ली के मंच पर सहयोगियों को वीटो (Veto) का सुख लेने दो, लेकिन चुपचाप बीजेपी-एनडीए शासित 21 राज्यों की विधानसभाओं के जरिए देश की बहुसंख्यक आबादी पर राज्य स्तर पर UCC लागू दो. उत्तराखंड इसका पहला लॉन्चिंग पैड बन चुका है, गुजरात-असम कतार में हैं, और बिना किसी बड़े राष्ट्रीय बवाल के 2029 से पहले बीजेपी अपना सबसे बड़ा कोर एजेंडा देश के आधे से ज्यादा हिस्से में लागू कर चुकी होगी!

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