Shesh Bharat: पवन कल्याण तेलुगू फिल्मों के इतने बड़े स्टार हैं कि पवन स्टार पुकारे जाते हैं. उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद आंध्र की राजनीति में ये मुकाम हासिल किया कि चंद्रबाबू नायडू की सरकार में डिप्टी सीएम बने हैं. राजनीति सेट थी. सब बढ़िया चल रहा था लेकिन तमिलनाडु की राजनीति में थलापति विजय के उदय ने पवन कल्याण को झकझोर दिया. ऐसा झकझोरा कि आंध्र की राजनीति में मन नहीं लगने लगा. पवन कल्याण ने बदला है अपना 'गियर, जो टीडीपी और बीजेपी दोनों के लिए खतरे की घंटी है.
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जनसेना का दिल्ली दौरा
पवन कल्याण की पार्टी जनसेना आंध्र प्रदेश की पार्टी है. दिल्ली की राजनीति में इतनी ही दखल है कि एनडीए के पार्टनर हैं लेकिन कुछ नया और बड़ा करने के लिए पवन कल्याण पूरी पार्टी लेकर दिल्ली आ गए. सेना प्रस्थानम-तीन दिन का पार्टी सम्मेलन से ये ऐलान किया कि अब वो सिर्फ आंध्र तक सीमित नहीं रहेंगे. उन्हें नेशनल पॉलिटिक्स में उतरना है. हैदराबाद से पवन कल्याण दिल्ली ऐसे दौर में आए हैं तब कोलकाता में तृणमूल और मुंबई में उद्धव की पार्टियां टूट रही हैं.
'राष्ट्र प्रथम' का नया नारा
पवन कल्याण जब अपनी 'सेना प्रस्थानम' यानी राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के लिए दिल्ली पहुंचे, तो सबके कान खड़े हो गए. जो पवन कल्याण अब तक सिर्फ अमरावती और हैदराबाद की बात करते थे, वो अचानक दिल्ली के मंच से 'राष्ट्र प्रथम' और 'नेशनल इंटीग्रेशन' का नारा देने लगे. सेना प्रस्थानम के जरिए उन्होंने साफ कर दिया है कि वे सिर्फ आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं रहने वाले हैं. पवन कल्याण का यह नया राजनीतिक दांव न सिर्फ उनकी पार्टी को राष्ट्रीय दर्जा दिलाने की कोशिश है, बल्कि दक्षिण भारत की क्षेत्रीय भावनाओं को राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर दिल्ली के सत्ता गलियारों में अपनी ताकत बढ़ाना भी है.
नेशनल लीडर बनने की ओर कदम
पवन कल्याण की कहानी एक 'पावरफुल रीजनल किंगमेकर' से बढ़कर 'नेशनल लीडर' बनने की है. उन्होंने दिल्ली में राष्ट्र प्रथम (Country First), राष्ट्रीय अखंडता और विकास के मुद्दों को उठाकर एक बड़ा पिच तैयार किया है. जनसेना पार्टी अब खुद को सिर्फ तेलुगु पहचान तक सीमित न रखकर तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे पड़ोसी दक्षिणी राज्यों में फैला रही है, जहां वे तेजी से अपने संगठन को खड़ा करने और नेताओं को जोड़ने में जुट गए हैं.
2024 की ऐतिहासिक चुनावी सफलता
पवन कल्याण की National Ambition के पीछे उनकी चुनावी सफलता का सबसे बड़ा आधार है. 2024 के आंध्र प्रदेश चुनावों में जनसेना का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा. उन्होंने जिन 21 विधानसभा और 2 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी पर जीत हासिल की. जनसेना आंध्र प्रदेश विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इस बेदाग और मजबूत चुनावी नंबर ने ही पवन कल्याण को वह सियासी साहस दिया है कि वे सीधे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आकर हुंकार भर सकें.
टीडीपी के साथ गठबंधन का तालमेल
चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के साथ पवन कल्याण का तालमेल फिलहाल सहयोग और आंतरिक दबाव (Checks and Balances) के साथ चल रहा है. पवन कल्याण ही वो मैगनेट थे जिन्होंने जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ TDP and BJP को एक साथ लाकर गठबंधन को मुमकिन बनाया था. सरकार में तो चंद्रबाबू नायडू के साथ मजबूती से खड़े हैं, लेकिन सब इतना भी अच्छा नहीं कि वो चैन से रह सकें.
वोट बैंक और राजनीतिक जमीन का ओवरलैप
टीडीपी के रहते हुए पवन कल्याण की जनसेना पार्टी (JSP) के विस्तार में सबसे बड़ी दिक्कत "वोट बैंक और राजनीतिक जमीन का ओवरलैप (Overlap)" होना है, क्योंकि दोनों ही काफी हद तक एक ही वोटर क्लास और जोग्रॉफी पर निर्भर हैं. 2024 के चुनावों में गठबंधन धर्म निभाने के लिए जनसेना ने सिर्फ 21 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 100% स्ट्राइक रेट हासिल किया. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि राज्य की बाकी 154 सीटों पर TDP का मजबूत संगठन है. जिन क्षेत्रों में TDP के विधायक या मजबूत नेता मौजूद हैं, वहां जनसेना अपने नए संगठन या स्थानीय नेताओं को आगे नहीं बढ़ा सकती. अगर जनसेना वहां विस्तार की कोशिश करती है, तो गठबंधन में आपसी टकराव (Fissures) शुरू हो जाएगा.
कापू और कम्मा समुदायों का समीकरण
आंध्र की राजनीति में 'कापू' (Kapu) और 'कम्मा' (Kamma) समुदायों का राजनीतिक वर्चस्व रहा है. चंद्रबाबू नायडू की TDP को पारंपरिक रूप से कम्मा समुदाय और ओबीसी का मजबूत समर्थन प्राप्त है, जबकि पवन कल्याण कापू समुदाय के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे हैं दोनों दलों ने वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) को हराने के लिए इन वोटों को एक साथ जोड़ा. लेकिन अगर जनसेना राज्यव्यापी विस्तार करना चाहती है, तो उसे कम्मा और ओबीसी बाहुल्य क्षेत्रों में भी अपनी पैठ बनानी होगी, जो सीधे तौर पर TDP के कोर वोट बैंक में सेंध लगाने जैसा होगा.
ग्रासरूट कैडर खड़ा करने की चुनौती
TDP आंध्र प्रदेश की चार दशक पुरानी पार्टी है, जिसका हर गांव और बूथ स्तर पर एक बेहद मजबूत और वफादार ढांचा है.इसके विपरीत, जनसेना का आधार काफी हद तक पवन कल्याण के करिश्मे और उनके फैंस पर निर्भर है. जब तक TDP जमीन पर मजबूत है, तब तक जनसेना के लिए स्वतंत्र रूप से अपना ग्रासरूट कैडर खड़ा करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि नए राजनीतिक कार्यकर्ता स्थापित TDP को छोड़कर नई जनसेना की तरफ क्यों मुडना चाहेंगे. टीडीपी से कोई भी टकराव YSRCP को वापसी का मौका देगा.
राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की असली वजह
आंध्र प्रदेश के भीतर TDP की मौजूदगी में जो विस्तार की सीमाएं हैं, शायद इसी वजह से पवन कल्याण ने अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा (National Ambition) को आगे बढ़ाया है. वो जानते हैं कि आंध्र प्रदेश में TDP को परेशान किए बिना अगर पार्टी का कद बड़ा करना है, तो उन्हें तेलंगाना, कर्नाटक और दिल्ली जैसी जगहों पर पैर पसारने होंगे. दिल्ली में अपना प्रभाव बढ़ाकर वे आंध्र प्रदेश के भीतर भी TDP के सामने अपना राजनीतिक वजन (Leverage) बराबर रखना चाहते हैं.
तेलंगाना में धमाकेदार एंट्री
पवन कल्याण का नेशनल एंबिशन का पहला पड़ाव है तेलंगाना जहां उन्होंने अगला चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है. उनके इसी एंबिशन को देखकर हैदराबाद में सीएम रेवंत रेड्डी ने उन्हें रैली करने नहीं दिया. पवन कल्याण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ही तेलंगाना में धमाकेदार एंट्री का एलान कर दिया. पवन कल्याण तेलुगू फिल्मों के स्टार हैं. राज्य बंटने के बाद भी जितनी फैन फालोइंग आंध्र में है उतनी ही तेलंगाना में भी. आंध्र विभाजन के जिस विवाद और दाग से चंद्रबाबू नायडू तेलंगाना की राजनीति में टिके नहीं रह सके वैसा कोई दाग उन पर नहीं है. जब राज्य बंट रहा था तब वो राजनीति में थे नहीं.
बीजेपी के लिए नया चैलेंज
पवन कल्याण आंध्र और दक्षिण की राजनीति में बीजेपी के लिए ही चैलेंज बनेंगे. जब आंध्र में बीजेपी कांग्रेस, टीडीपी का विकल्प बनाने के लिए जोर लगा रही था तब पवन कल्याण ने धमाकेदार एंट्री ले ली. कर्नाटक में तो बीजेपी है लेकिन तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों में उसे बहुत काम करना है. ऐसे समय नए प्लेयर पवन कल्याण अपनी टीम लेकर उतर रहे हैं. मुद्दे भी वही बीजेपी वाले लेकर सनातन, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद. इसी के सहारे तो बीजेपी को भी दक्षिण जीतना है. जरा भी जगह बना ली तो पवन कल्याण से बीजेपी को चुनावों में मोलभाव करना पड़ेगा.
थलापति विजय बनाम पवन कल्याण
इस पूरी कहानी में तमिल सुपरस्टार थलपति विजय की नई राजनीतिक पारी का एंगल बहुत दिलचस्प है.विजय ने अपनी पार्टी 'तमिझगा वेत्री कड़गम' (TVK) के जरिए तमिलनाडु की राजनीति में धमाकेदार एंट्री की है. पवन कल्याण ने खुद खुलकर कहा है कि वे विजय के इस 'स्मूथ optical सफर' से थोड़ा ईर्ष्या (Envious) महसूस करते हैं, क्योंकि खुद पवन को इस मुकाम तक पहुंचने और सड़कों पर संघर्ष करने में 15 साल लग गए.असर जब पवन कल्याण अपनी पार्टी जनसेना को तमिलनाडु में विस्तार देने की बात करते हैं, तो सीधे तौर पर उनका मुकाबला विजय जैसी नई क्षेत्रीय ताकतों और स्थापित द्रविड़ राजनीति (DMK/AIADMK) से होना तय है. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भविष्य में दो बड़े सिनेमाई और राजनीतिक दिग्गज एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं या दक्षिण की राजनीति में कोई नया समीकरण बनाते हैं.
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