प्रणब मुखर्जी भारतीय राजनीति के एक सम्मानित चेहरे हैं. उन्होंने अपने जीवन में कांग्रेस पार्टी के साथ 36 साल बिताए और 2012 में भारत के राष्ट्रपति बने. उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी और बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी, दोनों राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन पिता के निधन के बाद उनकी राय और राजनीतिक मार्ग अलग-अलग हो गए. जहां अभिजीत ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस जॉइन की, वहीं शर्मिष्ठा ने राजनीति से दूरी बना ली.
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कांग्रेस बनाम बीजेपी पर बच्चों की राय
मनमोहन सिंह के निधन पर कांग्रेस के श्रद्धांजलि विवाद ने प्रणब मुखर्जी के बच्चों के बीच दरार को उजागर किया. शर्मिष्ठा ने कांग्रेस पर अपने पिता का अपमान करने का आरोप लगाया और स्मारक न बनाए जाने का मुद्दा उठाया. वहीं, अभिजीत ने कांग्रेस का बचाव करते हुए कहा कि कोरोना के चलते अंतिम संस्कार में सीमित लोग ही शामिल हो सके.
मोदी के समर्थन और प्रणब बाबू का सम्मान
शर्मिष्ठा मुखर्जी, प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आभार जताते हुए उनके द्वारा प्रणब मुखर्जी के सम्मान में किए गए कार्यों को सराहा. मोदी ने प्रणब को भारत रत्न दिलाया और उनकी विरासत को संजोने के लिए स्मारक बनाने का वादा किया.
पिता की विरासत
अभिजीत ने कांग्रेस को पिता की सफलता का श्रेय दिया, जबकि शर्मिष्ठा ने बीजेपी की ओर झुकाव दिखाया. दोनों भाई-बहन अपनी-अपनी राय के साथ पिता के राजनीतिक जीवन की विरासत को अलग-अलग तरीके से देख रहे हैं.
प्रणब मुखर्जी का जीवन और राजनीति, कांग्रेस और बीजेपी के बीच संतुलन का प्रतीक रहा, लेकिन उनके बच्चों की राजनीतिक राहें इस संतुलन को कायम रखने में असफल रहीं.
बच्चों की राजनीति
अभिजीत मुखर्जी और शर्मिष्ठा मुखर्जी के बीच पिता की राजनीतिक विरासत की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. राजनीति से तो प्रणब बाबू का परिवार लगभग आउट है. 2012 में प्रणब मुखर्जी को जब कांग्रेस ने राष्ट्रपति बनाया तब वो जंगीपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद होते थे. उन्होंने संसद से इस्तीफा दिया तो कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी के बड़े बेटे अभिजीत मुखर्जी को उपचुनाव में टिकट देकर लोकसभा चुनाव लड़ाया. अभिजीत पिता की राजनीतिक विरासत संभालते हुए चुनाव जीतकर सांसद बन गए. 2014 में कांग्रेस के खिलाफ लहर वाले चुनाव में भी अभिजीत दूसरी बार चुनाव जीत गए. 2019 में जीत की हैट्रिक नहीं लगा पाए.
प्रोफेशनल डांसर शर्मिष्ठा मुखर्जी राजनीति में थोड़ी देर से आईं. आईं भी तो बंगाल से नहीं, दिल्ली से एंट्री ली. 2015 में कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में शर्मिष्ठा मुखर्जी को ग्रेटर कैलाश सीट से चुनाव लड़ाया. इलेक्शन डेब्यू इतना खराब रहा कि वो सिर्फ 6 हजार वोट हासिल करके तीसरे नंबर पर रहीं. 2017 में प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद भाई-बहन कांग्रेस में टिक नहीं पाए. पहले अभिजीत मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल ज्वाइन कर ली. फिर शर्मिष्ठा ने कांग्रेस के साथ-साथ एक्टिव पॉलिटिक्स भी छोड़ दी. कुल मिलाकर दोनों भाई-बहन राजनीति में कहीं हैं नहीं.
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