Rahul Gandhi citizenship case: कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है. दरअसल, यह विवाद नहीं छोड़ रहा है कि क्या वह भारतीय नागरिक ही हैं या ब्रिटिश नागरिकता से जुड़े हैं. राहुल गांधी पर विदेशी नागरिक होने के आरोप सबसे पहले सुब्रमण्यम स्वामी ने लगाए थे और अब कर्नाटक के बीजेपी नेता एस. विग्नेश शिशिर इस मामले को लेकर अदालत पहुंचे थे इलाहाबाद हाई कोर्ट में केस सुना जा रहा है लेकिन इस बीचअब इसमें एक नया मोड़आ गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर चल रहे विवाद में एक ऐसा आदेश दिया है जिसने देश के सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है. जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की सिंगल बेंच ने केंद्र सरकार को इस मामले में पार्टी के तौर पर शामिल होने की इजाजत दे दी है.
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केंद्र सरकार की बंद कमरे में सुनवाई की मांग
सुनवाई के दौरान एक बड़ा मोड़ तब आया जब केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट से कहा कि गृह मंत्रालय के पास इस मामले से जुड़े कुछ अत्यंत गोपनीय दस्तावेज मौजूद हैं. इन दस्तावेजों की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार ने इन कैमरा यानी बंद कमरे में सुनवाई का अनुरोध किया जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया है. अब आगे 6 अप्रैल 2026 को दोपहर 4:00 बजे सरकार नागरिकता विवाद से जुड़े सभी मूल रिकॉर्ड और फाइलें जज के सामने रख देगी. अब सारी निगाहें 6 अप्रैल की उस गोपनीय सुनवाई पर टिकी हैं जहां गृह मंत्रालय की फाइलों में बंद राज तय करेंगे कि राहुल गांधी की नागरिकता पर मंडरा रहा यह खतरा कितना वास्तविक है.
याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार लगाए ये आरोप
राहुल गांधी के विदेशी नागरिकता के मामले में केंद्र सरकार की एंट्री अचानक नहीं हुई बल्कि यह एक सोची समझी कानूनी प्रक्रिया और याचिकाकर्ता की मांग का नतीजा है. याचिकाकर्ता एस विग्नेश शिशिर ने मांग की थी कि नागरिकता का मुद्दा सीधे तौर पर गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए केंद्र सरकार को प्रतिवादी बनाना जरूरी है. विग्नेश का आरोप है कि उन्होंने जब भी सरकार से जानकारी मांगी वह दी नहीं गई और जो सबूत सौंपे उस पर सरकार ने इन एक्शन दिखाया. गृह मंत्रालय ने 2019 में राहुल गांधी को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया था, लेकिन शिशिर का आरोप है कि इतने साल बाद भी सरकार ने यह साफ नहीं किया कि उस पर क्या फैसला लिया गया.
नागरिकता को लेकर क्या है भारतीय कानून
भारतीय संविधान के अनुच्छेद नौ के तहत यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता स्वीकार करता है तो उसकी भारतीय नागरिकता और संसद सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाती है. हालांकि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी इन आरोपों को हमेशा से सिरे से खारिज करती रही है और इसे महज एक राजनीतिक साजिश करार देती आई है. राहुल गांधी की ओर से हमेशा यही पक्ष रहा है कि वह जन्म से भारतीय नागरिक हैं और उन्होंने कभी भी किसी दूसरे देश की नागरिकता के लिए आवेदन नहीं किया और ना ही उसे स्वीकार किया.
यहां से शुरू हुआ था नागरिकता का विवाद
ब्रिटेन की कंपनी बिकॉप्स लिमिटेड के जिन दस्तावेजों का हवाला दिया जा रहा है, उन्हें राहुल गांधी के वकीलों ने एक टाइपोग्राफिकल एरर यानी क्लर्क द्वारा फॉर्म भरते समय की गई टाइपिंग की गलती बताया है. उनका कहना है कि किसी निजी कंपनी के रिटर्न भरने वाले कर्मचारी की चूक को किसी व्यक्ति की नागरिकता बदलने का आधार नहीं बनाया जा सकता. कांग्रेस की लीगल टीम का दावा है कि राहुल गांधी ने 2003 में उस कंपनी को शुरू किया था और 2009 में उसे बंद कर दिया था. कंपनी के रजिस्ट्रेशन के वक्त राहुल गांधी ने अपनी राष्ट्रीयता भारतीय ही दर्ज कराई थी, लेकिन वार्षिक रिटर्न में अनजाने में उसे ब्रिटिश लिख दिया गया.
6 अप्रैल को बंद कमरे में होगी सुनवाई
अब 6 अप्रैल को होने वाली बंद कमरे की सुनवाई में राहुल गांधी की लीगल टीम इसी बात पर जोर देगी कि गृह मंत्रालय के पास मौजूद रिकॉर्ड्स में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जो साबित कर सके कि उन्होंने कभी ब्रिटिश पासपोर्ट हासिल किया. अब केंद्र सरकार की भूमिका इस केस में किंग मेकर की तरह हो चुकी है. 6 अप्रैल को गृह मंत्रालय के अधिकारी जो रिकॉर्ड जज के चेंबर में पेश करेंगे वही यह तय करेंगे कि राहुल गांधी के खिलाफ जांच आगे बढ़ेगी या यह केस यहीं खत्म हो जाएगा. यह मामला राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद संवेदनशील है.
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