Shesh Bharat: राहुल को टांगकर ले गई पुलिस तो विजय का पारा क्यों चढ़ा? पेपर लीक के खिलाफ थलापति ने पेश किया मॉडल!

रूपक प्रियदर्शी

• 08:46 AM • 23 Jul 2026

दिल्ली में नीट पेपर लीक के विरोध में राहुल गांधी की हिरासत के बाद तमिलनाडु के सीएम थलापति विजय खुलकर समर्थन में आ गए हैं. विजय ने नीट को पूरी तरह खत्म करने और 12वीं के अंकों के आधार पर दाखिले का पुराना मॉडल बहाल करने की मांग की है.

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दिल्ली की सड़कों पर नीट पेपर लीक और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ राहुल गांधी और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जब पीएम मोदी के आवास (7 लोक कल्याण मार्ग) का घेराव किया, तो राजनीति का पारा चढ़ गया. राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने की खबर जैसे ही चेन्नई पहुंची, सीएम थलापति विजय ने बिना देर किए इसे लोकतंत्र को कुचलना करार दिया. अब तक विजय की चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे कि जंतर-मंतर पर हो रहे घटनाक्रम पर तमिलनाडु सरकार या विजय कुछ प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहे. अब विजय ने राहुल गांधी के बहाने जोरदार एंट्री मारी है और केंद्र सरकार को अपने कड़े तेवर दिखा दिए हैं.

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दिल्ली से चेन्नई तक नई राजनैतिक बॉन्डिंग

तमिलनाडु में सरकार गठन और मुख्यमंत्री पद की शपथ के दौरान राहुल गांधी और थलापति विजय की जो गर्मजोशी भरी मुलाकात और एक-दूसरे का हाथ थामने वाले विजुअल्स वायरल हुए थे, वे आज नई और मजबूत राजनैतिक बॉन्डिंग का इशारा कर रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर जहां राहुल गांधी केंद्रीय मंत्री शिक्षा मंत्री और मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, वहीं दक्षिण भारत में थलापति विजय ने राहुल गांधी के रुख को अपना पूरा समर्थन देकर साफ संकेत दे दिया है कि युवाओं और छात्रों के हक की इस लड़ाई में दिल्ली और चेन्नई का यह नया गठबंधन केंद्र के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है.

नीट को पूरी तरह खत्म करने की मांग

जब राहुल गांधी को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया, तो तमिलनाडु के सीएम थलापति विजय ने इस पर बेहद तीखा और कड़ा रुख अपनाया. विजय ने केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए न सिर्फ राहुल गांधी पर हुई कार्रवाई को लोकतंत्र की हत्या बताया, बल्कि साफ कहा कि अब सिर्फ नीट में सुधार नहीं, बल्कि इस परीक्षा का जड़ से खात्मा ही एकमात्र रास्ता है.

चेन्नई में रैपर अरीवू का प्रदर्शन और सीएम का संदेश

नीट के खिलाफ विरोध सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है. चेन्नई में तमिलनाडु सचिवालय के बाहर मशहूर तमिल रैपर और सामाजिक कार्यकर्ता 'थेरुकुरल' अरीवू (Arivu) अपने साथियों के साथ नीट परीक्षा रद्द करने और प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए पुलिस एक्शन के खिलाफ धरने पर बैठ गए. सचिवालय के हाई-सिक्योरिटी जोन में बिना अनुमति नारेबाजी के कारण चेन्नई पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. विपक्ष के नेता ने तुरंत टीवीके (TVK) सरकार की आलोचना शुरू कर दी.

जैसे ही सीएम सी. जोसेफ विजय को इसकी जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत एक्शन लिया और अरीवू को पुलिस के कब्जे से छुड़वाया. फिर उन्होंने अरीवू को अपने सचिवालय चैंबर में मिलने के लिए बुलाया और उनकी चिंताओं को सुना. लोगों का कहना है कि जहां दिल्ली में केंद्र सरकार प्रदर्शनकारी छात्रों की आवाज दबाने के आरोपों से घिरी है, वहीं थलापति विजय ने एक आंदोलनकारी को सीधे अपने दफ्तर बुलाकर चर्चा की और यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में संवाद ही हर समस्या का समाधान है.

नीट पर तमिलनाडु सरकार की कड़ी नीति

तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के बाद भी नीट परीक्षा को लेकर राज्य की मूल नीति में कोई बदलाव नहीं आया है. पूर्व सीएम एम. के. स्टालिन की सरकार ने तमिलनाडु के छात्रों के हित में जिस नीट विरोधी नीति को आगे बढ़ाया था, थलापति विजय उस पर पूरी तरह कायम हैं और इसे और आक्रामक धार दे रहे हैं. विजय की पार्टी टीवीके का स्पष्ट कहना है कि परीक्षा में सुधार या केवल पेपर लीक रोकने से काम नहीं चलेगा, नीट को ही पूरी तरह से खत्म किया जाना चाहिए. विजय सरकार की मांग है कि शिक्षा को संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) से हटाकर फिर से राज्य सूची (State List) में लाया जाए ताकि मेडिकल शिक्षा और दाखिले से जुड़े फैसले लेने का अधिकार राज्यों के पास रहे.

तमिलनाडु में क्यों है नीट का सर्वसम्मति से विरोध?

तमिलनाडु में चाहे AIADMK की सरकार रही हो, DMK की या अब थलापति विजय की TVK की—नीट का विरोध वहां एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे राज्य की सामूहिक राय है. तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि नीट केवल अमीर और शहरी पृष्ठभूमि के उन छात्रों को फायदा पहुंचाता है जो लाखों रुपये खर्च करके बड़े कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कर सकते हैं. सरकारी स्कूलों, तमिल मीडियम और गरीब ग्रामीण परिवारों के होनहार बच्चे, जो महंगी कोचिंग नहीं ले पाते, वे इस व्यवस्था में पिछड़ जाते हैं. राज्य सरकार का मानना है कि उन्होंने अपने फंड से मेडिकल कॉलेज बनाए हैं, इसलिए दाखिले का नियम तय करने का हक भी उनका ही होना चाहिए. नीट के दबाव और बार-बार होने वाले पेपर लीक के कारण राज्य के कई छात्रों ने मानसिक तनाव में आकर आत्महत्या जैसा कदम उठाया है.

एस. अनीता की कहानी, जिसने पूरे राज्य को झकझोरा

जब भी नीट के विरोध की बात होगी, तो तमिलनाडु के अरियालुर जिले की गरीब दलित छात्रा एस. अनीता का जिक्र होना स्वाभाविक है. एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी अनीता की मां का बचपन में ही देहांत हो गया था. बिना किसी सुख-सुविधा वाले साधारण से घर में रहते हुए उसने अपनी लगन से 12वीं की तमिल माध्यम बोर्ड परीक्षा में 1200 में से 1176 अंक हासिल किए थे. तमिलनाडु के पुराने कट-ऑफ सिस्टम के अनुसार, उसका स्कोर (196.75/200) इतना बेहतरीन था कि उसे राज्य के किसी भी टॉप मेडिकल कॉलेज में आसानी से एमबीबीएस (MBBS) की सीट मिल जाती.

जब 2017 में केंद्र सरकार ने नीट को पूरी तरह अनिवार्य कर दिया, तो कभी कोचिंग न जाने वाली अनीता सुप्रीम कोर्ट तक गई. उसने दलील दी कि नीट का सीबीएसई (CBSE) आधारित पैटर्न ग्रामीण और गरीब बच्चों के साथ अन्याय है. हालांकि, कोर्ट से उसकी गुहार खारिज हो गई और नीट परीक्षा में वह केवल 86 अंक ही ला सकी. डॉक्टर बनने का सपना टूटता देख 1 सितंबर 2017 को 17 साल की अनीता ने आत्महत्या कर ली. उसकी मौत ने पूरे तमिलनाडु को हिलाकर रख दिया. थलापति विजय आज जिस नीट विरोधी आंदोलन की कमान संभाल रहे हैं, उसकी बुनियाद इसी अनीता के संघर्ष पर टिकी है.

2017 से पहले कैसे मिलते थे मेडिकल दाखिले?

नीट परीक्षा अनिवार्य होने से पहले यानी 2017 से पहले तमिलनाडु की अपनी अलग व्यवस्था थी. तब 12वीं के अंकों के आधार पर मेरिट तय होती थी. राज्य के सभी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पूरी तरह 12वीं के अंकों पर होता था. इससे गांवों में पढ़ने वाले और सरकारी स्कूल के बच्चों को भी उनकी साल भर की मेहनत के आधार पर सीधे मेडिकल कॉलेजों में सीट मिल जाती थी. थलापति विजय इसी पुराने सिस्टम को दोबारा लागू करने की मांग कर रहे हैं.

एंटी-नीट बिल और सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई

तमिलनाडु में नीट को खत्म करने की मांग सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कानूनी और विधायी लड़ाई है. तमिलनाडु विधानसभा ने 'तमिलनाडु अंडरग्रेजुएट मेडिकल डिग्री कोर्स एडमिशन बिल' (Anti-NEET Bill) पास किया था. इस बिल का मकसद राज्य के छात्रों को नीट से पूरी तरह छूट देकर फिर से 12वीं के अंकों के आधार पर दाखिला दिलाना था. जब इस बिल को मंजूरी के लिए भेजा गया, तो राष्ट्रपति ने इसे वापस कर दिया.

इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. राज्य सरकार की दलील है कि राष्ट्रपति द्वारा बिना वजह बिल को रोकना असंवैधानिक है. थलापति विजय इसी कानूनी लड़ाई को अपनी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता मान रहे हैं.

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और 12वीं के मेरिट का आधार

तमिलनाडु सरकार के शोध विश्लेषण के अनुसार, जो बच्चे ग्रामीण पृष्ठभूमि या सरकारी स्कूलों से पढ़कर सीधे मेडिकल कॉलेज पहुंचते हैं, वे पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने ही राज्य के गांवों और कस्बों में सेवाएं देने के लिए अधिक तत्पर रहते हैं. इससे ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी दूर होती है. इसके अलावा, एक ही दिन में लाखों बच्चों की परीक्षा कराने वाला सिस्टम असफल साबित हो रहा है. पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स विवाद और डमी कैंडिडेट जैसे घोटालों से स्थिति बिगड़ी है. राज्य स्तर पर 12वीं के बोर्ड अंकों के आधार पर मेरिट लिस्ट बनाने से परीक्षा आयोजन में धांधली और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हो जाती है.