कहां हैं गृह मंत्री? अमित शाह को बुलाओ! बुलाओ उनको! संसद के मानसून सत्र में जब विपक्ष के बड़े-बड़े दिग्गजों की आवाज शोर-शराबे में दब रही थी, तब राज्यसभा में कांग्रेस की महिला सांसद रेणुका चौधरी की कड़क और बुलंद आवाज गूंजी. इस एक दहाड़ ने न सिर्फ सत्ता पक्ष को बैकफुट पर ला दिया, बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. यह आवाज किसी नए राजनेता की नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की 'ओरिजिनल फायरब्रांड' यानी कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी की थी. जो लोग उन्हें करीब से जानते हैं, वो हैरान नहीं हैं, क्योंकि रेणुका चौधरी का इतिहास ही कुछ ऐसा है वो न कभी किसी से डरी हैं, न कभी किसी के सामने झुकी हैं.
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जब पीएम मोदी ने रेणुका चौधरी पर कसा था तंज
हालांकि अमित शाह आए नहीं. जब आएंगे तो हो सकता है अपने अंदाज में रेणुका चौधरी को जवाब दें, जैसा कि पीएम मोदी ने 2018 में दिया था. रेणुका चौधरी के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित और विवादित पन्ना 7 फरवरी 2018 को लिखा गया. राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे और आधार कार्ड को लेकर अपनी सरकार की पीठ थपथपा रहे थे. विपक्ष की बेंच पर बैठीं रेणुका चौधरी को मोदी का दावा रास नहीं आया और वह संसद में जोरदार ठहाके लगाने लगीं.
रेणुका की हंसी पर पीएम मोदी का जवाब
पूरी संसद उनकी हंसी से गूंज उठी. सभापति वेंकैया नायडू नाराज हो गए और उन्होंने रेणुका को डॉक्टर के पास जाने की सलाह तक दे डाली. तभी पीएम मोदी ने मुस्कुराते हुए बीच में हस्तक्षेप किया और एक ऐसा तंज कसा, जो इतिहास में दर्ज हो गया. पीएम मोदी ने कहा "सभापति जी, मेरी आपसे प्रार्थना है. रेणुका जी को कुछ मत कहिए. रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का सौभाग्य आज मिला है." मोदी का इशारा रामायण की शूर्पणखा की तरफ था. तब पूरी बीजेपी रेणुका की हालत पर ठहाके लगाने लगी.
विशाखापत्तनम में हुआ रेणुका चौधरी का जन्म
इस दिलचस्प कहानी की शुरुआत 13 अगस्त 1954 को विशाखापत्तनम में होती है. रेणुका चौधरी का जन्म विशाखापत्तनम में एक बेहद संभ्रांत और अनुशासित तेलुगु परिवार में हुआ था. उनके पिता एयर कमोडोर K.S. Rao भारतीय वायुसेना के बड़े अधिकारी थे. पिता की बार-बार होने वाली पोस्टिंग के कारण रेणुका की परवरिश देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई. उन्होंने देहरादून के प्रतिष्ठित वेल्हम गर्ल्स स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी की. इसके बाद उन्होंने कर्नाटक यूनिवर्सिटी, धारवाड़ से इंडस्ट्रियल साइकोलॉजी में एमए किया. पढ़ाई में तेज होने के साथ-साथ कॉलेज के दिनों से ही वह काफी मुखर और बेबाक रहीं. रेणुका चौधरी तीन बहनों में सबसे बड़ी हैं. उनका कोई भाई नहीं है. उनके पिता एयर कमोडोर के.एस. राव ने अपनी तीनों बेटियों को बेटों की तरह निडर और आत्मनिर्भर बनाया.
पढ़ाई के दौरान हुई श्रीधर चौधरी से मुलाकात
पढ़ाई के दौरान ही रेणुका की मुलाकात श्रीधर चौधरी से हुई. श्रीधर चौधरी आंध्र प्रदेश के एक बड़े और रसूखदार बिजनेस घराने से ताल्लुक रखते थे. रेणुका जहां बेहद आक्रामक, तेज-तर्रार और हर मुद्दे पर खुलकर बोलने वाली लड़की थीं, वहीं श्रीधर चौधरी स्वभाव से बेहद शांत, गंभीर और लाइमलाइट से दूर रहने वाले इंसान थे. दोनों के बीच प्यार हुआ और दोनों ने शादी करने का फैसला किया.
रेणुका राव कैसे बनीं रेणुका चौधरी?
हमेशा के लिए तेलुगु लड़की रेणुका राव, रेणुका चौधरी बन गईं. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 'चौधरी' कोई जाति नहीं है. वहां 'कम्मा' (Kamma) जाति के लोग सम्मान और रसूख के तौर पर अपने नाम के आगे 'चौधरी' सरनेम लगाते हैं. रेणुका जी का मायका कम्मा परिवार से था और उनके पति श्रीधर चौधरी भी इसी समाज से आते हैं, जिससे शादी के बाद उनका नाम रेणुका चौधरी हो गया.
हाउसवाइफ से सामाजिक जीवन की ओर बढ़ीं रेणुका
शादी के बाद रेणुका चौधरी हैदराबाद आ गईं. शुरुआत में बड़े परिवार की बहू और दो बेटियों तेजस्विनी और पूजिता की मां के रूप में एक आम हाउसवाइफ की जिंदगी जी रही थीं. लेकिन उनकी कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब 1984 में हैदराबाद और उसके आसपास के इलाकों में दंगे, चोरी और नक्सली हलचल बढ़ी. इससे उन्हें घर से बाहर निकलकर समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिली. रेणुका रात में टॉर्च और सीटी लेकर सड़कों पर पहरेदारी करने निकलने लगीं.
NTR की नजर पड़ी और खुला राजनीति का रास्ता
एक साधारण घरेलू महिला का यह असाधारण हौसला उस समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगु सिनेमा के भगवान कहे जाने वाले एन. टी. रामा राव (NTR) तक पहुंचा. एनटीआर को अपनी पार्टी 'तेलुगु देशम पार्टी' (TDP) के लिए ऐसे ही निडर चेहरों की तलाश थी. उन्होंने रेणुका को देखा और तुरंत राजनीति में आने का न्योता दे दिया. रेणुका ने जमीन पर काम करना शुरू किया. पहले हैदराबाद नगर निगम की पार्षद चुनी गईं. नगर निगम में उनके धाकड़ काम और आक्रामक मिजाज को देखने के बाद NTR ने 1986 में उन्हें राज्यसभा का टिकट दिया था.
दिल्ली के सियासी गलियारों में बनाई पहचान
महज 32 साल की उम्र में, साल 1984 में रेणुका चौधरी पहली बार राज्यसभा सांसद बनकर दिल्ली के सियासी गलियारों में पहुंच गईं. अपनी कड़क आवाज और तर्कों के दम पर वो जल्द ही टीडीपी की चीफ व्हिप बन गईं और संसद में उनकी तूती बोलने लगी. 1997 में देवगौड़ा सरकार में वह देश की स्वास्थ्य मंत्री भी बनीं. फिर रेणुका चौधरी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. पढ़ी-लिखी घरेलू महिला अचानक आंध्र की राजनीति में बुलंदियों पर जाने लगी.
चंद्रबाबू नायडू से बढ़ा टकराव
रेणुका चौधरी का खुद का बनाया नियम था गलत के आगे झुकना नहीं, फिर चाहे सामने कोई भी हो. 1995 में जब चंद्रबाबू नायडू ने तख्तापलट कर टीडीपी की कमान अपने हाथ में ली, तो पार्टी का आंतरिक समीकरण पूरी तरह बदल गया. 'टू मच इंडिपेंडेंट' होने की सजा रेणुका को मिलने लगी. नायडू ने धीरे-धीरे पार्टी के भीतर रेणुका चौधरी को दरकिनार करना शुरू कर दिया. टकराव तब चरम पर पहुंच गया, जब साल 1998 के राज्यसभा चुनावों में चंद्रबाबू नायडू ने रेणुका चौधरी का टिकट काटकर जया प्रदा को दे दिया. तब यह झटका था, लेकिन आगे रेणुका के लिए वरदान बना, क्योंकि कांग्रेस में जो मिल रहा था, वो टीडीपी में मुमकिन नहीं था.
TDP छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुईं रेणुका
रेणुका ने 1998 में टीडीपी को लात मार दी और कांग्रेस का हाथ थाम लिया. कांग्रेस में आते ही उन्होंने साबित किया कि वो सिर्फ राज्यसभा के लिए नहीं, जनाधार वाली नेता हैं. उन्होंने खम्मम सीट से लगातार दो बार 1999 और 2004 के लोकसभा चुनाव जीते. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में उन्हें महिला एवं बाल विकास मंत्री बनाया गया, जहां उन्होंने घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून को मजबूत करने में देश की महिलाओं के लिए ऐतिहासिक काम किया.
गांधी परिवार के साथ मजबूत हुआ रिश्ता
रेणुका चौधरी और गांधी परिवार यानी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के रिश्ते का इतिहास वफादारी, आपसी सम्मान और संकट के समय एक-दूसरे के साथ चट्टान की तरह खड़े होने का रहा है. साल 1998 में जब रेणुका चौधरी ने तेलुगु देशम पार्टी (TDP) छोड़ी, तो सोनिया गांधी ने खुद उनका कांग्रेस में स्वागत किया था.
सोनिया गांधी के भरोसेमंद चेहरों में हुईं शामिल
जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी की कमान संभाली, तब उन्हें संसद के अंदर और बाहर एक ऐसे आक्रामक और तार्किक चेहरे की जरूरत थी, जो विपक्ष के हमलों का करारा जवाब दे सके. रेणुका चौधरी इस पैमाने पर बिल्कुल फिट बैठीं. 1999 और 2004 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी की सिफारिश पर ही डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए (UPA-1) सरकार में रेणुका चौधरी को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में मंत्री बनाया गया.
राहुल गांधी के साथ भी मजबूत रहे समीकरण
सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी के साथ भी रेणुका चौधरी के राजनीतिक और व्यक्तिगत समीकरण बेहद मजबूत रहे हैं. दिसंबर 2025 में उन्होंने बड़ा कारनामा किया. रेणुका चौधरी संसद परिसर में एक लावारिस कुत्ते के बच्चे को लेकर आईं. बीजेपी ने उन पर विशेषाधिकार हनन की तैयारी की, तो राहुल गांधी खुलकर उनके बचाव में उतरे.
जब पुलिस अधिकारी का पकड़ लिया था कॉलर
रेणुका चौधरी केवल बयानों तक सीमित नहीं रहीं. गांधी परिवार पर आए संकट के समय वह खुद सड़कों पर लाठियां खाने और पुलिस से भिड़ने के लिए जानी जाती हैं. साल 2022 का वाकया है, जब नेशनल हेराल्ड मामले में ED राहुल गांधी से पूछताछ कर रहा था, तब पूरी कांग्रेस सड़कों पर थी. हैदराबाद में प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही रेणुका चौधरी इतनी भड़क गईं कि उन्होंने ऑन-ड्यूटी पुलिस सब-इंस्पेक्टर का कॉलर पकड़ लिया था. बाद में उन्होंने साफ किया था कि वह गांधी परिवार के खिलाफ हो रही तानाशाही कार्रवाई के विरोध में अपना आपा खो बैठी थीं.
2024 में फिर पहुंचीं राज्यसभा
आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद जब तेलंगाना राज्य बना, तो वहां कांग्रेस को स्थापित करने में गांधी परिवार ने रेणुका चौधरी के अनुभव का पूरा इस्तेमाल किया. खम्मम क्षेत्र में उनका मजबूत जनाधार रहा है. यही वजह है कि साल 2024 में जब राज्यसभा सीटों का बंटवारा हुआ, तो सोनिया और राहुल गांधी की सीधी सहमति से रेणुका चौधरी को राज्यसभा भेजा गया.
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