ओडिशा की शांत राजनीति में उस वक्त सियासी ज्वालामुखी फट गया, जब बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने राज्य के भूमिपुत्र और पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक पर एक विवादित टिप्पणी की. निशिकांत दुबे के दावों ने न केवल ओडिशा के लोगों को आक्रोशित कर दिया, बल्कि हमेशा शांत रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को भी कैमरे के सामने आकर कड़ा जवाब देने पर मजबूर कर दिया.
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निशिकांत दुबे का वो विवादित दावा
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान बीजू पटनायक, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के बीच एक 'लिंक' के रूप में काम कर रहे थे. दुबे ने नेहरू के कुछ पुराने पत्रों का हवाला देते हुए दावा किया कि नेहरू ने बीजू बाबू को महत्वपूर्ण रक्षा कार्यों के लिए अमेरिका भेजा था. इस बयान को बीजू पटनायक के कद और उनकी देशभक्ति पर लांछन के तौर पर देखा जा रहा है.
नवीन पटनायक का 'रौद्र रूप'
अपने पिता और ओडिशा के गौरव माने जाने वाले बीजू बाबू के अपमान पर नवीन पटनायक ने बेहद सख्त लहजे में पलटवार किया. उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि सांसद निशिकांत दुबे को किसी मेंटल डॉक्टर (मानसिक चिकित्सक) को दिखाना चाहिए.' नवीन बाबू ने बचपन की यादें साझा करते हुए बताया कि वे तब करीब 13 साल के थे और उन्हें अच्छी तरह याद है कि उनके पिता चीनी आक्रमण को लेकर कितने आक्रोशित थे और देश की रक्षा के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया.
संसदीय कमेटी से इस्तीफा और विरोध
यह विवाद सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहा. नवीन पटनायक के करीबी और राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा ने निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली संसदीय कमेटी से इस्तीफा दे दे दिया. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ऐसे व्यक्ति के नीचे काम नहीं कर सकते जो ओडिशा के राष्ट्रीय नायक का अपमान करें. पूरे ओडिशा में बीजू बाबू के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए हैं.
कौन थे बीजू पटनायक?
बीजू पटनायक को ओडिशा का 'शेर' और 'टॉल मैन' कहा जाता है. वे एक जांबाज पायलट थे जिन्होंने 1947 में डच सेना की घेराबंदी तोड़कर इंडोनेशियाई नेताओं को बचाया था, जिसके लिए इंडोनेशिया ने उन्हें 'भूमिपुत्र' की उपाधि दी. वे दुनिया के इकलौते ऐसे नेता हैं जिनकी अंतिम यात्रा में भारत, रूस और इंडोनेशिया के झंडे एक साथ झुके थे. नेहरू के दौर में वे उनके रक्षा सलाहकार भी रहे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गुप्त रूप से जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं की मदद की थी.
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