देश के कई राज्यों में चुनाव आयोग की ओर से वोटर लिस्ट रिवीजन यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया चलाई जा रही है. बिहार और बंगाल के बाद अब जैसे ही यह प्रक्रिया कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक पहुंची, इस पर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. कर्नाटक में वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) के नेता बेहद आक्रामक हो गए हैं और उन्होंने बकायदा हस्ताक्षर कर चुनाव आयोग से इस प्रक्रिया में धांधली की शिकायत की है. कहानी में ट्विस्ट यह है कि बीजेपी इस गड़बड़ी के लिए कर्नाटक की डीके शिवकुमार सरकार पर दोष मढ़ रही है, जबकि कांग्रेस इस बात पर मजे ले रही है कि जो आरोप कल तक विपक्ष चुनाव आयोग पर लगाता था, आज वही आरोप बीजेपी लगा रही है.
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बीजेपी और जेडीएस ने चुनाव आयोग को सौंपी शिकायत
सोमवार को कर्नाटक में बीजेपी और जेडीएस के नेताओं के एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबकुमार से मुलाकात की. इस दौरान नेताओं ने चुनाव आयोग को एक औपचारिक शिकायत सौंपी, जिसमें आरोप लगाया गया कि राज्य में वोटर लिस्ट रिवीजन के दौरान नियमों और दिशा-निर्देशों की पूरी तरह से अनदेखी की जा रही है. एनडीए नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस सरकार के इशारे पर नियमों को ताक पर रखकर यह पूरा खेल खेला जा रहा है.
बीएलओ पर घर-घर न जाने और धार्मिक स्थलों पर फॉर्म भरवाने का आरोप
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र और पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोमई ने बड़ा दावा किया है कि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को हर नागरिक के घर-घर जाकर सत्यापन करना था. विपक्ष का आरोप है कि कर्नाटक में ऐसा कुछ नहीं चल रहा है, बल्कि अधिकारियों द्वारा मस्जिदों, मदरसों, कम्युनिटी हॉल्स और अन्य धार्मिक स्थलों पर कैंप लगाकर थोक के भाव में एसआईआर (SIR) फॉर्म भरवाए जा रहे हैं. विपक्ष ने आरोप लगाया कि बीएलओ घरों पर जाने और वहां स्टिकर लगाने के बजाय इन खास जगहों पर बैठकर काम कर रहे हैं.
फर्जी वोटरों और अवैध प्रवासियों को लेकर केंद्रीय मंत्रियों के गंभीर दावे
इस विवाद में केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी और जेडीएस नेता एचडी कुमार स्वामी ने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं. दोनों नेताओं का दावा है कि कर्नाटक की वोटर लिस्ट में हजारों फर्जी नाम जोड़े जा रहे हैं. उन्होंने आशंका जताई कि इसके पीछे अवैध प्रवासियों को भी भारत का वोटर बनाने की एक बड़ी और सोची-समझी साजिश काम कर रही है. कुमार स्वामी ने इस संबंध में मीडिया को कुछ तस्वीरें और लगभग 25 बूथों से जुड़ी जानकारियों की एक पेनड्राइव भी दिखाई, जिसे उन्होंने चुनाव आयोग को सबूत के तौर पर सौंपा है.
सरकारी नोटिस से विपक्ष के हाथ लगा सबसे बड़ा सबूत
इस पूरे हंगामे की मुख्य वजह नियमों का उल्लंघन और उस पर प्रशासनिक कार्रवाई है. चुनाव आयोग के नियमों को दरकिनार कर मैसूर, कोलार, रोन और गदक जैसे इलाकों में कम्युनिटी हॉल्स और धार्मिक स्थलों पर कैंप लगाए जा रहे थे. विवाद तब और ज्यादा भड़क गया जब कोलार के जिला कलेक्टर (डीसी) ने खुद इस नियमों के उल्लंघन पर कड़ा संज्ञान लिया. जिला कलेक्टर ने कार्रवाई करते हुए एक असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) समेत पांच बूथ लेवल अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. इस सरकारी नोटिस के सामने आते ही विपक्ष को कांग्रेस सरकार और प्रशासनिक मशीनरी को घेरने का सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत मिल गया.
रणदीप सुरजेवाला ने याद दिलाया बिहार-असम का इतिहास
विपक्ष के इन तीखे हमलों पर कांग्रेस पूरी तरह से फ्रंट फुट पर आकर जवाब दे रही है. कर्नाटक के कांग्रेस प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने एनडीए के इस विरोध को सरासर पाखंड करार दिया है. सुरजेवाला ने बीजेपी और जेडीएस के नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनमें हिम्मत है तो वे कहें कि विधानसभा चुनावों से पहले बिहार में एसआईआर के तहत 47 लाख, असम में 11 लाख और पश्चिम बंगाल में 84 लाख वोटरों के नाम हटाना गलत था. उन्होंने कहा कि बीजेपी को खुलकर बोलना चाहिए कि चुनाव आयोग की यह एसआईआर प्रक्रिया ही गलत और लोकतंत्र विरोधी है और इसे पूरे देश में तुरंत खत्म कर देना चाहिए.
डीके शिवकुमार ने आरोपों को सिरे से नकारा
चूंकि कांग्रेस राज्य की सत्ता में है, इसलिए सरकार के स्तर पर बेहद संभलकर और स्पष्ट रुख अपनाया जा रहा है. मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बीजेपी और जेडीएस के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया कि इसमें सरकार कोई खेल कर रही है. उन्होंने साफ किया कि चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया में सरकार या कांग्रेस पार्टी का कोई भी राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है. हालांकि, डीके शिवकुमार इस एसआईआर प्रक्रिया को लेकर खुद काफी सक्रिय दिखे हैं. उन्होंने खुद अपनी पत्नी उषा शिवकुमार के साथ कैमरे के सामने आकर फॉर्म भरा और मंत्रियों व कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे आम जनता, गरीबों और अल्पसंख्यकों के बीच उनके वोटिंग अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं.
गारंटी योजनाएं और परमानेंट रेजिडेंस सर्टिफिकेट का बड़ा कनेक्शन
कर्नाटक सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दो बेहद महत्वपूर्ण और बड़े फैसले लिए हैं, जिसने इस प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी को काफी बढ़ा दिया है. पहला फैसला यह है कि सरकार ने वोटर आईडी को अपनी कल्याणकारी गारंटी योजनाओं से जोड़ दिया है. नए नियमों के तहत अगर किसी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से कट जाता है, तो उसे सरकार की कल्याणकारी गारंटी योजनाओं का लाभ मिलना भी बंद हो जाएगा.
दूसरा बड़ा फैसला कर्नाटक के मूल निवासियों के लिए 'परमानेंट रेजिडेंस सर्टिफिकेट' (स्थाई निवास प्रमाण पत्र) जारी करने का है. सरकार का तर्क है कि चुनाव आयोग के नियमों के तहत वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन के लिए इस सर्टिफिकेट को वैध माना जाएगा. यह सर्टिफिकेट वैध और मूल मतदाताओं के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा ताकि किसी प्रशासनिक चूक के चलते स्थानीय नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से न कटे.
राज्य के राजस्व विभाग द्वारा जारी इन आसान नियमों के तहत अब नागरिक अपने आधार कार्ड, राशन कार्ड या राज्य में 10 साल की पढ़ाई के प्रमाण के आधार पर 'सेवा सिंधु पोर्टल' के जरिए ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम से इसे आसानी से बनवा सकेंगे. भविष्य में यह सर्टिफिकेट न केवल वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के काम आएगा, बल्कि सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों में स्थानीय कोटे और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए भी एक भरोसेमंद कानूनी दस्तावेज बनेगा.
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