Shesh Bharat: नवीन पटनायक को मात देने के बाद अब बीजू बाबू की तारीफ, क्या दिल्ली की मजबूरी बदल रही बीजेपी की बिसात?

रूपक प्रियदर्शी

• 08:22 AM • 11 Jul 2026

Shesh Bharat: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इंडोनेशिया की संसद में बीजू पटनायक की ऐतिहासिक बहादुरी का जिक्र केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि ओडिशा की बदलती राजनीति और दिल्ली के नए सियासी समीकरणों की ओर भी इशारा माना जा रहा है. जानिए बीजू पटनायक के इंडोनेशिया मिशन की पूरी कहानी, नवीन पटनायक और बीजेपी के रिश्तों की पृष्ठभूमि और राज्यसभा का गणित.

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राजनीति में कोई भी बयान बेवजह नहीं होता और जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा कद्दावर नेता विदेश जाकर किसी विपक्षी दल के नेता के पिता की जमकर तारीफ करे, तो यह साफ समझ आता है कि पर्दे के पीछे की बिसात बदल रही है. इंडोनेशिया की संसद में पीएम मोदी ने ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के उस जांबाज मिशन को याद किया, जिसने 79 साल पहले इतिहास का रुख बदल दिया था. लेकिन इस ऐतिहासिक वाकये को याद करने के पीछे के राजनीतिक मायने बेहद गहरे हैं. ओडिशा के हालिया विधानसभा चुनाव में नवीन पटनायक के 24 साल पुराने साम्राज्य को धूल चटाने के बाद, अचानक पीएम मोदी द्वारा बीजू बाबू को याद करने के पीछे दिल्ली की सियासी मजबूरियां और नए समीकरणों की आहट साफ देखी जा रही है.

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जकार्ता की संसद में गूंजा बीजू पटनायक का नाम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जकार्ता में इंडोनेशिया की सरकार और सांसदों के सामने मंच पर आए, तो उन्होंने ओडिशा के महान सपूत बीजू पटनायक का जिक्र किया, जिससे पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. पीएम मोदी ने दुनिया को याद दिलाया कि कैसे साल 1947 में भारत के इस जांबाज पायलट ने अपनी जान की परवाह न करते हुए इंडोनेशिया के शीर्ष नेताओं की जान बचाई थी. 

डच सेना की मिसाइलों और गोलियों को ठेंगा दिखाकर बीजू बाबू ने इतिहास की वह उड़ान भरी थी, जिसने भारत और इंडोनेशिया को हमेशा के लिए एक अटूट और ऐतिहासिक रिश्ते में बांध दिया. आज बीजू पटनायक को भले ही लोग ओडिशा के पूर्व सीएम नवीन पटनायक के पिता के तौर पर जानते हों, लेकिन वह अपने दौर में देश के सबसे 'डेयर डेविल' पायलटों में शुमार थे.

जब नेहरू के कहने पर युद्ध क्षेत्र में कूद पड़े थे बीजू बाबू

इतिहास का यह पन्ना बेहद रोमांचक और बहादुरी से भरा हुआ है. जुलाई 1947 में जब इंडोनेशिया अपनी आजादी की जंग लड़ रहा था, तब डच फौज ने इंडोनेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुल्तान सजहरीर को जकार्ता में नजरबंद कर दिया था. ऐसे नाजुक वक्त में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कहने पर 31 साल के युवा पायलट बीजू पटनायक अपनी पत्नी ज्ञानवती के साथ डेकोटा विमान लेकर सीधे युद्ध क्षेत्र में कूद पड़े थे. डच सेना की सीधे मार गिराने की धमकियों को दरकिनार करते हुए उन्होंने इंडोनेशियाई नेताओं को सुरक्षित रेस्क्यू किया और दिल्ली लेकर आए. उनकी इसी अद्भुत बहादुरी के लिए इंडोनेशिया की सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भूमिपुत्र' से भी नवाजा था.

आसमान के सिकंदर और संकटमोचक

बीजू पटनायक राजनीति में कदम रखने से पहले आसमान के एक ऐसे बेबाक सिकंदर थे, जिनके लिए कोई भी खतरा बड़ा नहीं था. कटक के रेवेनशॉ कॉलेज से पढ़ाई के दौरान ही उन पर पायलट बनने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और दिल्ली फ्लाइंग क्लब से ट्रेनिंग ली. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह रॉयल इंडियन एयरफोर्स में शामिल हुए और अपनी बेहतरीन पायलट स्किल्स की बदौलत खराब मौसम व गोलियों की बौछार के बीच भी विमान को सुरक्षित लैंड कराने के लिए मशहूर हुए.

चाहे स्टालिनग्राद में रसद पहुंचानी हो या आजादी के ठीक बाद 27 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी कबायलियों के चंगुल से कश्मीर को बचाने के लिए श्रीनगर हवाई पट्टी पर भारतीय सैनिकों के पहले जत्थे को उतारना हो, बीजू पटनायक का डेकोटा विमान हमेशा संकटमोचक बनकर उड़ा. वह दुनिया के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्हें उनकी इस आसमानी बहादुरी के लिए भारत, रूस और इंडोनेशिया तीनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान मिला है.

हर खतरनाक मिशन में साथी रहीं पत्नी ज्ञानवती

बीजू पटनायक के इन खतरनाक हवाई मिशनों में उनकी पत्नी ज्ञानवती पटनायक का नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में जुड़ा रहेगा. ज्ञानवती देश की शुरुआती महिला पायलटों में से एक थीं, जिनका विवाह 1938 में बीजू बाबू के साथ हुआ था. वह सिर्फ घर-परिवार संभालने वाली पत्नी नहीं थीं, बल्कि बीजू पटनायक के हर मिशन की को-पायलट थीं.

जुलाई 1947 के उस ऐतिहासिक इंडोनेशिया मिशन में जब डच सेना ने विदेशी विमानों को मार गिराने की धमकी दी थी, तब वह भी डेकोटा विमान के कॉकपिट में अपने पति के साथ बैठी थीं और इंडोनेशिया के पीएम को रेस्क्यू करने में बराबर की हिस्सेदार रहीं. यही वजह है कि इंडोनेशिया के लोग आज भी ज्ञानवती पटनायक को उतनी ही इज्जत और सम्मान के साथ याद करते हैं.

पंडित नेहरू के 'इंडियास डेयर डेविल'

पंडित जवाहरलाल नेहरू और बीजू पटनायक के बीच का रिश्ता महज दो नेताओं का नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक समझ और अटूट भरोसे का था. नेहरू बीजू बाबू की निडरता और उनके विजन के कायल थे. आजादी से पहले ब्रिटिश सेना में पायलट रहते हुए भी बीजू बाबू गुप्त रूप से महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ गए थे.

ब्रिटिश पाबंदियों को ठेंगा दिखाकर वह नेहरू, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को अपने विमान में बिठाकर गुप्त ठिकानों पर पहुंचाते थे और खुफिया संदेश बांटते थे, जिसके कारण साल 1943 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा. आजादी के बाद भी नेहरू का उन पर इतना भरोसा था कि देश की सुरक्षा या विदेश नीति से जुड़े किसी भी गोपनीय और असंभव दिखने वाले मिशन के लिए वह सबसे पहले बीजू पटनायक को ही याद करते थे और उन्हें प्यार से 'इंडियास डेयर डेविल' बुलाते थे.

बयान के पीछे का असली सियासी खेल और दिल्ली की मजबूरी

इतिहास के इन गौरवशाली पन्नों को आज के राजनीतिक संदर्भ में देखना बेहद जरूरी है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि पीएम मोदी का यह बयान सिर्फ इतिहास की याद भर नहीं, बल्कि पूर्व सीएम नवीन पटनायक के लिए दोस्ती का एक नया संदेश है. साल 2024 के ओडिशा विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बीजेडी को हराकर सत्ता हासिल की थी, और उस दौरान दोनों नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी से रिश्तों में कड़वाहट आ गई थी. 

हालांकि, दोनों के रिश्ते हमेशा से अनोखे रहे हैं और नवीन बाबू दिल्ली में मोदी सरकार के संकटमोचक माने जाते थे. चाहे आर्टिकल 370 हटाना हो, नोटबंदी, राष्ट्रपति चुनाव हो या फिर दिल्ली सेवा बिल, जब-जब मोदी सरकार संसद में फंसी, नवीन पटनायक की पार्टी ने हमेशा वॉकआउट करके या पक्ष में वोट डालकर बीजेपी की नैया पार लगाई, जिसे 'फ्रेंडली अपोजिशन' कहा जाता था.

राज्यसभा का गणित और डैमेज कंट्रोल की कोशिश

अब सवाल उठता है कि दोबारा सरकार बनाने के बाद मोदी को नवीन पटनायक की याद क्यों आई? इसका जवाब दिल्ली के सत्ता समीकरण में छिपा है. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है और सरकार सहयोगियों के भरोसे चल रही है. संसद में बड़े बिल पास कराने के लिए बीजेपी को अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की सख्त जरूरत है. लोकसभा चुनाव में बीजेडी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और उसके पास एक भी लोकसभा सांसद नहीं है. 

वहीं राज्यसभा में भी बीजेडी के नौ सांसदों में से दो ने इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन कर ली थी और हालिया राज्यसभा चुनावों के बाद अब बीजेडी की ताकत घटकर महज पांच सांसदों पर आ गई है. ये पांच सांसद आज भी बीजेपी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. चुनाव हारने के बाद नवीन पटनायक ने आक्रामक रुख अपनाते हुए केंद्र को बिना शर्त समर्थन देने से इंकार कर दिया था, और बीजेपी के कुछ स्थानीय नेताओं के विवादित बयानों से उड़िया अस्मिता को ठेस पहुंची थी. ऐसे में पीएम मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच से बीजू बाबू को 'वैश्विक नायक' बताकर न सिर्फ उस डैमेज को कंट्रोल किया है, बल्कि नवीन पटनायक की दुखती रग पर मरहम भी लगा दिया है. अब देखना दिलचस्प होगा कि नवीन बाबू इस साइलेंट फ्रेंडशिप के संदेश का क्या जवाब देते हैं.