Shesh Bharat: रेवंत रेड्डी की अपील से गरमाई दक्षिण की राजनीति, क्या चंद्रबाबू नायडू बदलेंगे स्टैंड?

Shesh Bharat: रेवंत रेड्डी ने चंद्रबाबू नायडू से अपील कर दक्षिण भारत के राज्यों को परिसीमन के खिलाफ एकजुट होने को कहा है. आशंका है कि नए परिसीमन से दक्षिण की राजनीतिक ताकत घट सकती है. नायडू के सामने केंद्र और राज्य के हितों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हो गई है.

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राजू झा

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Revanth Reddy ने क्यों की चंद्रबाबू नायडू से मार्मिक अपील? बना रहे दक्षिण का यूनियन फ्रंट।

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बीजेपी ने महिला आरक्षण के नाम पर लोकसभा की सीटें नए सिरे से तय करने को जो प्लान बनाया है उसने दक्षिण भारत के राज्यों में खलबली मचा दी है. दक्षिण में बीजेपी किसी राज्य की सत्ता में नहीं है. बस चंद्रबाबू नायडू के सहारे आंध्र प्रदेश में सत्ता की पार्टनर है, जिसका रिमोट कंट्रोल चंद्रबाबू नायडू ने अपने हाथ में मजबूती से रखा हुआ है. रेवंत रेड्डी ने उसी रिमोट का सही इस्तेमाल करने के लिए चंद्रबाबू नायडू से मार्मिक अपील कर दी है. दुहाई दी है कि ये किसी पार्टी या सरकार का मामला नहीं, दक्षिण के भविष्य का सवाल है. सरकार पर दबाव बनाकर दक्षिण के हितों की रक्षा कर सकते हैं.

रेवंत रेड्डी और एन. चंद्रबाबू नायडू का रिश्ता भारतीय राजनीति में 'गुरु और शिष्य' के एक अनोखे और गहरे जुड़ाव के रूप में देखा जाता है. रेवंत ने अपनी राजनीति की लंबी पारी नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (TDP) से शुरू की थी, जहां नायडू उनके राजनीतिक गुरु और मार्गदर्शक बने. आज भी, जब रेवंत कांग्रेस में हैं और तेलंगाना के सीएम बन चुके हैं, सार्वजनिक रूप से नायडू को अपना गुरु मानने में संकोच नहीं करते. दोनों की पर्सनल केमेस्ट्री इतनी मजबूत है कि राजनीतिक विचारधाराओं के अलग होने और चुनावी मैदान में विरोधी होने के बावजूद, उनके पर्सनल रिलेशन में कभी कड़वाहट नहीं देखी गई.

रिश्ता हाल के और भी परिपक्व हुआ है, जहां दोनों नेता राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर एक दूसरे के साथ गहरी बॉन्डिंग दिखाते रहे हैं. तेलंगाना चुनाव में जीत के बाद जब रेवंत ने शपथ ली तो चंद्रबाबू ने शिष्य की तरक्की पर नाज किया. राज्य बंटवारे के बाद से फंसे मुद्दों को सुलझाने के लिए रेवंत रेड्डी के घर तक चले गए. लोकसभा सीटों के डिलिमिटेशन के मुद्दे पर जब रेवंत नायडू को लिखते हैं, तो वो केवल एक सीएम का दूसरे को संदेश नहीं होता, बल्कि उसमें उस पुराने विश्वास की झलक भी होती है कि मेरी बात मान लेंगे. दोनों एक-दूसरे को और रणनीतियों को बखूबी समझते हैं, जो दक्षिण की राजनीति में एक 'पावरफुल केमिस्ट्री' के रूप में उभरती है. 

सवाल ये है कि क्या रेवंत रेड्डी दक्षिण राज्यों के भविष्य के सवाल पर गुरु को बीजेपी से तोड़कर अपने साथ ला पाएंगे? डिलिमिटेशन का मुद्दा और विवाद चंद्रबाबू नायडू के लिए धर्मसंकट बना है. जिस राज्य के राजनीतिक भविष्य को बचाने वो ज्यादा बच्चे पैदा की मुहिम चला रहे हैं उसके लिए जिम्मेदार सरकार की पॉलिसी का समर्थन करना पड़ेगा. नहीं करेंगे तो बड़ा बवाल मचेगा. अगर आज दक्षिण के राज्यों के साथ खड़े नहीं हुए तो बदनामी अलग होगी.  

डिलिमिटेशन का जो प्लान बना है उसमें दक्षिण के राज्यों की लोकसभा सीटें कम होने का दावा किया जा रहा है. आशंका जताई जा रही है कि दक्षिण के राज्यों की लोकसभा सीटों का हिस्सा 24.3% से गिरकर 20.7% रह सकता है. हालांकि द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक अगर सभी राज्यों की सीटों में 50% की आनुपातिक बढ़ोतरी का प्रस्ताव काम किया तो इस मॉडल के तहत दक्षिण भारत की कुल सीटें 132 से बढ़कर 198 हो सकती हैं. नई लोकसभा में कुल सीटों की संख्या 850 तक होने का अनुमान है. 

रेवंत रेड्डी ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एकजुट होने की अपील की है. चेतावनी दी है कि खंडित लड़ाई यानी fragmented fight से काम नहीं चलेगा और दक्षिण भारत को अपनी राजनीतिक ताकत बचाने के लिए एक साथ आना होगा. दक्षिण के राज्यों का यूनियन फ्रंट बनाने पर काम कर रहे हैं. मिसाल दी कि आंध्र की 25 लोकसभा सीटें बढ़कर 38 तो हो जाएंगी लेकिन यूपी की 80 सीटें जब 120 हो जाएंगी तो सोचिए आंध्र का क्या होगा.

डिलिमिटेशन के लिए रेवंत ने एक नया हाईब्रिड फॉर्मूला पेश किया है. फॉर्मूला ये है कि 272 में से 50% सीटें यानी 136 जनसंख्या के आधार पर दी जाएं. 50% सीटें यानी 136 आर्थिक योगदान यानी GSDP (Gross State Domestic Product) के आधार पर दी जाएं. तर्क ये कि तरक्की की सजा नहीं मिलनी चाहिए. दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या पर काबू पाया और अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, तो उन्हें कम सीटें देकर दंडित करना अन्याय है. अब सबको ये मालूम है कि ये दलील काम नहीं करने वाली. बीजेपी ने जो ठाना है वो करेगी मानेगी.

तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन तो पहले से काले झंडे लेकर बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. उन्होंने आज पूरे तमिलनाडु में काले झंडे फहराकर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. सरकार को अंतिम चेतावनी दी है कि अगर दक्षिण की आवाज दबाई गई, तो 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलन जैसा ही बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे.

तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डी ने लड़ाई आगे बढ़ाई है. दक्षिण के राज्यों के भविष्य को मुद्दा बनाते हुए दक्षिण के राज्यों का यूनियन फ्रंट बनाने की पहल की है. खुला ऑफर है आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, कर्नाटक और पुद्दुचेरी को. इन राज्यों की लोकसभा में 132 सीटें हैं. बीजेपी का प्लान चला तो इतनी सीटें शायद नहीं रह पाएंगी. तेलंगाना, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकारें हैं तो कोई दिक्कत नहीं. तमिलनाडु में भी डीएमके के स्टालिन ने ओपन फाइट की हुंकार भरी हुई है.  केरल में लेफ्ट की सरकार चला रहे पी विजयन भी बीजेपी सरकार के प्लान के खिलाफ हैं. 

मामला फंसा है आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के कारण. टीडीपी सांसदों के समर्थन से मोदी सरकार चल रही है. हालांकि चंद्रबाबू नायडू केंद्र के साथ हैं, लेकिन आंध्र प्रदेश के हितों और सीटों के नुकसान को लेकर चिंता में तो हैं. माना है कि जनसंख्या कम करने में बढ़-चढकर योगदान देने के कारण दक्षिण के राज्यों की आबादी कम हो गई जिसका नतीजा आज आबादी के आधार पर अगले डिलिमिटेशन में भोगना पड़ सकता है. 

चंद्रबाबू ने अपने राज्य में यहां तक एलान किया हुआ कि 2 से ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहिए. ऐसा करने पर सरकार इनाम देगी लेकिन जब महिला आरक्षण के बहाने डिलिमिटेशन का मुद्दा गरमाया तो क्या करेंगे. माना तो जा रहा है कि वो सरकार के साथ रहेंगे. रेवंत रेड्डी यही तो कह रहे हैं कि सरकार का साथ मत दीजिए. दक्षिण का साथ दीजिए. 

पहले आंध्र प्रदेश में दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों के स्थानीय चुनाव लड़ने पर रोक थी. नायडू सरकार ने अब इस नियम को बदल दिया. प्रस्ताव दिया कि भविष्य में केवल वे ही लोग स्थानीय चुनाव लड़ पाएंगे जिनके दो से अधिक बच्चे हों. आंध्र प्रदेश में जन्म दर गिरकर 1.5-1.7 के आसपास आ गई, जो 2.1 के लेवल से कम है. डर है कि 2047 तक राज्य में युवाओं से ज्यादा बुजुर्ग होंगे, जिससे काम करने के लिए लोग नहीं बचेंगे. नायडू का मानना है कि जनसंख्या अब बोझ नहीं, बल्कि Asset है और दक्षिण को अपनी राजनीतिक ताकत बनाए रखने के लिए जनसंख्या गिरावट को रोकना होगा. 

डिलिमिटेशन पर अब तक वो सरकार के साथ बैलेसिंग एक्ट की तरह चल रहा है. उनकी राय रही है कि राज्यों की लोकसभा सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया जाए. यदि सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो उन्हें सभी राज्यों में आनुपातिक (Proportionately) रूप से बढ़ाया जाए ताकि दक्षिण का हिस्सा  कम न हो. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है कि वे दक्षिण के हितों की रक्षा करेंगे और "राष्ट्रीय हित" में फैसला लेंगे. रेवंत रेड्डी को चंद्रबाबू से गोलमोल नहीं, क्लियर स्टैंड चाहिए कि वो दक्षिण के राज्यों के हितों के साथ हैं या नहीं.

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