क्या बीजेपी ने दक्षिण के अभेद्य किले को ढहाने के लिए अपने सबसे बड़े 'सिक्रेट वेपन' को मैदान में उतार दिया है? क्या उत्तर प्रदेश में सपा, बीएसपी, कांग्रेस की हवा निकालने वाले और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक करिश्मा करने वाले सुनील बंसल अब मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की नींद उड़ाने वाले हैं? बीजेपी हाईकमान ने संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए एक बार फिर सुनील बंसल पर भरोसा जताया है और उन्हें तेलंगाना का प्रभारी नियुक्त किया है. यह कोई सामान्य नियुक्ति नहीं है. यह कांग्रेस के दक्षिण के सबसे मजबूत गढ़ पर 'अमित शाह के सबसे भरोसेमंद चाणक्य' का सीधा धावा है! कौन हैं सुनील बंसल, क्या है उनका अचूक चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड, और क्यों उनके तेलंगाना आने से कांग्रेस और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जानी चाहिए.
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तेलंगाना से पुराना नाता
सुनील बंसल के लिए तेलंगाना कोई नया राज्य नहीं है. अगस्त 2022 में जब उन्हें उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री पद से प्रमोट करके बीजेपी का राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया था, तभी उन्हें पहली बार तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और ओडिशा का प्रभारी नियुक्त किया गया था. उन्होंने पिछले चार सालों में तेलंगाना की जमीन को बहुत करीब से मापा है. साल 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव, जिसमें बीजेपी ने इतिहास रचते हुए 8 सीटें जीतीं, इसमें पर्दे के पीछे रहकर बंसल ने ही पूरी बिसात बिछाई थी.
अब तेलंगाना में जिम्मेदारी और बढ़ी
तेलंगाना में राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की भूमिकाओं में थोड़ा बदलाव होता रहा है. तरुण चुघ पहले से ही तेलंगाना संभाल रहे थे. अब पार्टी ने तरुण चुघ की जगह सुनील बंसल को पूरी तरह से 'फुल-टाइम कमान' (सोल इन-चार्ज) सौंप दी है. इसके साथ ही बंसल की मदद के लिए अभय पाटिल और रेखा शर्मा को सह-प्रभारी नियुक्त किया गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अब तक जो बंसल सिर्फ एक रणनीतिकार और 'सुपरवाइजर' के तौर पर काम देख रहे थे, अब उन्हें 'फ्रंट सीट' पर बिठा दिया गया है.
कैमरों से दूर रहकर काम करने की पहचान
आमतौर पर नेताओं को कैमरों के सामने रहने, रैलियों में मंच पर बैठने और अखबारों में सुर्खियां बटोरने का शौक होता है, लेकिन सुनील बंसल इसका ठीक उल्टा हैं. यूपी और बंगाल जैसे बड़े राज्यों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या अमित शाह की विशाल रैलियां होती थीं, तो सुनील बंसल कभी मंच पर वीआईपी कुर्सियों पर बैठे नजर नहीं आते थे. वे या तो रैली ग्राउंड के पीछे बने कंट्रोल रूम में बैठकर भीड़ का मैनेजमेंट देख रहे होते थे या साधारण कार्यकर्ताओं के बीच खड़े रहते थे. मीडिया की चकाचौंध से इतनी दूरी बनाए रखने के कारण ही उन्हें राजनीति का 'इनविजिबल मैन' (Invisible Man) कहा जाता है.
राजस्थान से निकला राजनीतिक सफर
सुनील बंसल राजस्थान के कोटपुतली के रहने वाले हैं, लेकिन लंबा समय उत्तर प्रदेश में गुजारा. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कोटपुतली में हुई, जिसके बाद हायर एजुकेशन के लिए राजस्थान यूनिवर्सिटी, जयपुर पहुंचे. कॉलेज के दिनों में ही उनके भीतर राजनीतिक लीडर वाले गुण सामने आने लगे. 1989 में राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में ABVP के टिकट पर भारी बहुमत से महासचिव चुने गए. बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में संगठन को सींचा. उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने उन्हें अपने साथ जोड़ा. सुनील बंसल बड़ी रैलियों या मंचों पर भाषण देने के बजाय सिर्फ डेटा, बूथ मैनेजमेंट और माइक्रो-प्लानिंग पर काम करने के लिए जाने जाते हैं.
तेलंगाना में गुटबाजी बड़ी चुनौती
तेलंगाना में सुनील बंसल के सामने वहां भी कांटों का ताज है, क्योंकि राज्य बीजेपी में अंदरूनी गुटबाजी बहुत पुरानी बीमारी है. केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी और फायरब्रांड नेता बंदी संजय के अलग-अलग खेमों को एक मंच पर लाना और पार्टी के भीतर जारी सिरफुटव्वल को शांत करना बंसल के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. तेलंगाना के ग्रामीण और दक्षिणी हिस्सों में आज भी बीजेपी का बुनियादी ढांचा कमजोर है. बंसल का सीधा टारगेट इसी गुटबाजी पर कड़ा प्रहार करना और नेताओं को दिल्ली के चक्कर काटने के बजाय जमीन पर काम करने के लिए मजबूर करना है.
तेलंगाना में बढ़ा बीजेपी का ग्राफ
हालांकि बीजेपी का बढ़ता ग्राफ बताता है कि तेलंगाना की जमीन सुनील बंसल के काम लायक है. 2014 में बीजेपी के पास तेलंगाना में सिर्फ 1 लोकसभा सीट और 10% वोट शेयर था, जो 2019 में बढ़कर 4 सीटें हुआ. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इतिहास रचते हुए 8 सीटें और 36% वोट शेयर हासिल कर लिया. फरवरी 2026 में हुए तेलंगाना निकाय चुनावों में भी बीजेपी ने निजामाबाद और करीमनगर नगर निगमों पर ऐतिहासिक कब्जा जमाकर कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी है. हालांकि अभी भी बीजेपी कांग्रेस से पीछे है. बीआरएस से आगे निकलने की कोशिश कर रही है.
क्या रेवंत रेड्डी के लिए चुनौती बढ़ेगी?
बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और कांग्रेस के लिए सुनील बंसल का आना खतरे का अलार्म है? ये एक फैक्ट है कि 2022 से तेलंगाना को सुपरवाइज कर रहे सुनील बंसल रेवंत रेड्डी को 2023 में हरा नहीं सके. अभी तेलंगाना में बीजेपी इस स्थिति में नहीं कि सीधे टक्कर दे सके कांग्रेस या बीआरएस को. अभी बीआरएस से नंबर 2 की जगह लेने की लड़ाई में है पार्टी.
अमित शाह के रडार पर तेलंगाना?
पॉलिटिकल कॉरिडोर में सुनील बंसल की इस ताजपोशी का सिर्फ एक ही मतलब निकाला जा रहा है, तेलंगाना अब सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रडार पर आ चुका है. बंसल कोई स्वतंत्र रणनीतिकार नहीं, बल्कि अमित शाह के सबसे भरोसेमंद और आजमाए हुए सिपहसालार हैं. जब-जब शाह को किसी राज्य में विपक्ष के मजबूत किले को ध्वस्त करना होता है, वे सुनील बंसल को अपनी 'आंख और कान' बनाकर वहां तैनात करते हैं. बंसल के तेलंगाना का प्रभार संभालने का सीधा संदेश यह है कि अब राज्य बीजेपी का रिमोट कंट्रोल सीधे दिल्ली में अमित शाह के हाथों में आ चुका है. अब न तो स्थानीय नेताओं की बहानेबाजी चलेगी और न ही गुटबाजी बर्दाश्त होगी. शाह के इस 'अमोघ अस्त्र' के मैदान में उतरने से साफ है कि बीजेपी तेलंगाना में सिर्फ औपचारिकता के लिए नहीं लड़ रही, बल्कि कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए शाह की सीधी निगरानी में एक बेहद आक्रामक और क्लोज-मॉनिटर्ड ऑपरेशन शुरू हो चुका है.
यूपी से शिफ्ट करने पर क्यों उठ रहे सवाल?
सुनील बंसल का पोर्टफोलियो बड़ा है, लेकिन फिलहाल उतना रेलेवेंट नहीं रहा. उन्हें बंगाल, तेलंगाना और ओडिशा राज्यों के प्रभार मिले हैं. बंगाल और ओडिशा में चुनाव हो चुके. बीजेपी चमत्कारिक जीत दर्ज कर चुकी है. तेलंगाना में चुनाव 2028 के आखिर में होना है. चुनाव तो अभी यूपी में होने हैं, जहां से सुनील बंसल शिफ्ट किए गए. एक सवाल तैर तो रहा है कि चूंकि चुनावी राज्य में विनोद तावड़े को लगाया गया है, तो क्या सुनील बंसल को यूपी से हटाकर साइडलाइन किया गया? इसका जवाब होना चाहिए बिल्कुल नहीं. उन्हें किसी पुराने काम से हटाया नहीं गया, बल्कि बीजेपी के 'मिशन साउथ' और नए मोर्चों को फतह करने का सबसे बड़ा टास्क दिया गया है. एक ऐसे जोन तेलंगाना भेजे गए, जहां बीजेपी बहुत कोशिशों के बाद भी करिश्मा नहीं कर पा रही है.
बंसल का ट्रैक रिकॉर्ड क्या कहता है?
सुनील बंसल का ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा है, उन्हें पार्टी साइडलाइन करने की सोच भी नहीं सकती. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी ने यूपी की 80 में से 73 सीटें जीतीं, तो अमित शाह के पीछे सुनील बंसल ही थे. बतौर संगठन महामंत्री, उन्होंने यूपी में 'पन्ना प्रमुख' और 'मेरा बूथ सबसे मजबूत' जैसे ऐतिहासिक फॉर्मूले लागू किए, जिससे बीजेपी ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल किया. मई के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बंसल ने वो कर दिखाया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. यूपी के अपने कोर रणनीतिकारों की टीम को चुपचाप बंगाल के 65 हजार से ज्यादा बूथों पर तैनात कर उन्होंने बीजेपी की सीटों को 2021 की 77 सीटों से बढ़ाकर सीधे 207 सीटों के ऐतिहासिक आंकड़े पर पहुंचा दिया. और पहली बार पूरे बहुमत के साथ सरकार बनवा दी.
सुनील बंसल की राजनीतिक पृष्ठभूमि
सुनील बंसल राजस्थान के कोटपुतली के रहने वाले हैं, लेकिन लंबा समय उत्तर प्रदेश में गुजारा. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई कोटपुतली में हुई, जिसके बाद हायर एजुकेशन के लिए राजस्थान यूनिवर्सिटी, जयपुर पहुंचे. कॉलेज के दिनों में ही उनके भीतर राजनीतिक लीडर वाले गुण सामने आने लगे. 1989 में राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में ABVP के टिकट पर भारी बहुमत से महासचिव चुने गए. बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में संगठन को सींचा. उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने उन्हें अपने साथ जोड़ा. सुनील बंसल बड़ी रैलियों या मंचों पर भाषण देने के बजाय सिर्फ डेटा, बूथ मैनेजमेंट और माइक्रो-प्लानिंग पर काम करने के लिए जाने जाते हैं.
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