Tamil Nadu Election: तमिलनाडु की राजनीति में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प होता नजर आ रहा है. जहां एक तरफ सत्ताधारी डीएमके (DMK) अपना किला बचाने की जद्दोजहद में है, वहीं दूसरी तरफ अभिनेता से नेता बने विजय की एंट्री ने समीकरणों को पेचीदा बना दिया है. हालांकि, ताजा आंकड़ों और सियासी जानकारों की मानें तो मुकाबला उतना एकतरफा नहीं है जितना पहले लग रहा था.
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विजय का गिरता ग्राफ और वोटिंग इंटेंट
रिपोर्ट के अनुसार, सुपरस्टार विजय ने जब अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी, तब उनके प्रति जबरदस्त आकर्षण (करीब 20%) देखा जा रहा था. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यह आकर्षण घटकर 13-14% के आसपास आ गया है. चौंकाने वाली बात यह है कि एक्चुअल 'वोटिंग इंटेंट' यानी वोट देने का इरादा फिलहाल सिंगल डिजिट (8-9%) में सिमटता दिख रहा है. यह दर्शाता है कि लोकप्रियता और वास्तविक वोट शेयर के बीच एक बड़ी खाई हो सकती है.
किसे होगा विजय के मैदान में होने का नुकसान?
जानकारों का मानना है कि विजय के खाते में जाने वाला वोट बैंक मुख्य रूप से एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी) वोट है. आंकड़ों के मुताबिक, अगर विजय मैदान में नहीं होते, तो उनके 10 में से 7 वोट एडीएमके (AIADMK) को जाते और सिर्फ 3 वोट डीएमके को मिलते. ऐसे में विजय का अलग चुनाव लड़ना प्रत्यक्ष रूप से एडीएमके को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन अगर उनका ग्राफ गिरता है, तो इसका सीधा फायदा पलानीस्वामी की पार्टी को होगा.
पलानीस्वामी को हल्के में लेना पड़ी भूल?
विपक्षी नेता ई.के. पलानीस्वामी को राजनीतिक गलियारों में जितना हल्के में लिया गया, जमीन पर उनकी पकड़ उतनी ही मजबूत है. दशकों का राजनीतिक अनुभव और एडीएमके के कैडर पर उनकी पकड़ ने उन्हें स्टालिन के सामने एक मजबूत चुनौती बनाकर खड़ा कर दिया है. बीजेपी और खुद पार्टी के अंदरूनी विरोधियों ने भी पलानीस्वामी की ताकत को कम करके आंका था.
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