Shesh Bharat: तमिलनाडु की सियासत में इस बार बड़ा उल्टफेर देखने को मिल रहा है. चुनाव के मद्देनजर ना सिर्फ DMK और कांग्रेस बल्कि AIADMK और BJP तक ने किसी ब्राह्मण को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है. अब आप सोच रहे हैं इससे क्या होगा? कितना असर होगा? नहीं बनाया तो नहीं बनाया, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. करीब साढ़े तीन दशक में पहली बार ऐसा हो रहा है जब अन्नाद्रमुक (DMK) ने किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है. और बात सिर्फ एक पार्टी की नहीं, सभी पार्टियों ने अमूमन ऐसा ही किया है. अब इसके पीछे की राजनीति को समझिए...समझिए कि सियासत में ब्राह्मण राजनीति पूरी तरह से हाशिए पर जाने से तमिलनाडु में किसे फायदा? सबसे बड़ा सवाल कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में कोई भी दल ब्राह्मण को क्यों टिकट नहीं देना चाहते हैं?
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तमिलनाडु मद्रास प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था तो ब्राह्मणों की सियासी तूती बोला करता थी, लेकिन द्रविड़ आंदोलन के चलते सियासी हाशिए पर पहुंच गए. राज्य में ब्राह्मणों का समर्थन हासिल करने वाली बीजेपी ने भी ब्राह्मण से किनारा कर लिया है. बीजेपी ने अपने कोटे की 27 विधानसभा सीटों में से किसी भी सीट पर ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं दिया.
बीजेपी-कांग्रेस ने भी किया ब्राह्मण प्रत्याशी से किनारा
तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों में से इंडिया गठबंधन में डीएमके 164 और कांग्रेस 28 सीट पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन दोनों ने किसी भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया. इसके अलावा उनके सहयोगी लेफ्ट और वीसीके और मुस्लिम लीग ने भी किसी भी ब्राह्मण पर भरोसा नहीं जताया.
वहीं, ब्राह्मणों के सहारे राजनीति करने वाली एनडीए गठबंधन भी ब्राह्मणों पर भरोसा नहीं जता सकी. AIADMK 178 सीट, बीजेपी 27 और पीएमके 18 सीट पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन एक भी सीट पर ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतार सकी. यह पैटर्न तमिलनाडु की बदलती सियासत को दिखा रहा.
किस दल ने ब्राह्मण को दिया टिकट?
- अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) ने सिर्फ दो ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं.
- तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी तमिलर कच्ची ने छह ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.
इन दोनों ही दलों ने मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे इलाके को चुना है, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. ब्राह्मण वोटर निर्णायक रोल अदा करते हैं. यही वजह है कि टीवीके और एनटीके ने ब्राह्मणों को टिकट देकर उन्हें साधने का दांव चला है.
NTK ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को क्यों उतारा?
एनटीके द्वारा छह ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के पीछे विश्लेषकों का कहना है कि सीमान ने तमिलनाडु में 'पेरियार-विरोधी' रुख अपनाया है. RSS से जुड़े एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए उन्होंने कहा कि वह एक ‘ब्राह्मण कडाप्परई’ (सब्बल) का इस्तेमाल करके 'द्रविड़ दीवार' को गिरा देंगे. वे अपने राजनीतिक संदेशों में जाति और पहचान का खुलकर इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में ब्राह्मणों को टिकट देकर सियासी संदेश देने की कवायद की है.
अब सवाल ये कि आखिर AIADMK, DMK, BJP का ब्राह्मणों से मोहभंग क्यों हुआ? एक-एक कर समझिए
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही जयललिता ब्राह्मण समाज से रही हैं, लेकिन अब निधन के करीब 10 साल बाद उनकी पार्टी किसी भी ब्राह्मण को मैदान में नहीं उतारा है. AIADMK ने 2021 में ब्राह्मण समाज से आने वाले पूर्व पुलिस महानिदेशक आर नटराज को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन इस बार उनका भी पत्ता काट दिया है. तमिल की सियासत में ब्राह्मण मतदाता लंबे समय तक AIADMK के साथ रहे हैं, उन्हें वोट देकर सत्ता में भी लाने का काम करते रहे हैं. इसके चलते जयललिता और MGR ब्राह्मण उम्मीदवारों को हमेशा मैदान में उतारते थे. हाल के वर्षों में ब्राह्मणों का झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ा है. इसी कारण अब यह पार्टी ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने में चुनावी लाभ नहीं देख रही है. इसीलिए AIADMK ने ब्राह्मण समुदाय को टिकट देने से परहेज किया है.
किस वजह से नहीं दिया टिकट?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु ब्राह्मण एसोसिएशन (TAMBRAS) का समर्थन पाने में बीजेपी कामयाब रही है. इसके बाद भी ब्राह्मणों को टिकट नहीं देना बीजेपी के समर्थकों को निराश किया है. राज्य में 3 फीसदी के करीब ब्राह्मण मतदाता हैं, जिन्हें नायर के नाम से जाना जाता है. राज्य की सियासत में ओबीसी और दलित वोटर बहुत निर्णायक हैं, इसीलिए ब्राह्मण को टिकट देने से परहेज कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि ब्राह्मण को चुनावी मैदान में उतरने से दलित और ओबीसी वोटर छिटक सकता है, जिसके चलते बीजेपी ने टिकट नहीं दिया.
डीएमके और कांग्रेस ने भी तमिलनाडु से कोई ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं उतारा है. इसके पीछे भी दलित और ओबीसी वोटर का छिटकना माना जा रहा है. DMK ने राज्यसभा के लिए कमल हासन को नामित किया है, लेकिन वे खुद को नास्तिक बताते हैं. DMK के पास ब्राह्मणों को बाहर रखने का कोई औपचारिक नियम नहीं है. लेकिन उसकी राजनीतिक स्थिति गैर-ब्राह्मणों के सशक्तिकरण पर केंद्रित है.
TVK के मामले में, उम्मीदवारों के चयन के पीछे कोई स्पष्ट तर्क नजर नहीं आता. पार्टी ने ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाया है, जबकि पेरियार उसके पांच आदर्शों में से एक हैं. शायद TVK यह संदेश देना चाहती है कि वह ब्राह्मण-विरोधी पार्टी नहीं है.
तमिलनाडु में ब्राह्मणों की जनसंख्या
तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी सिर्फ 3 फीसदी है. राजनीतिक पार्टियां उन जातियों को प्राथमिकता देती हैं जिनकी संख्या अधिक है. मुथुराय्यर, थेवर, वन्नियार और गौंडर. कम संख्या के कारण ब्राह्मणों को वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाता. इसके अलावा राज्य में 69 फीसदी आरक्षण लागू है. द्रविड़ दलों ने अपनी राजनीति को OBC और दलितों के उत्थान के इर्द-गिर्द बुना है.
द्रविड़ राजनीति में ब्राह्मणों को आर्य या बाहरी माना जाता है, जबकि गैर-ब्राह्मणों को मूल द्रविड़. यही कारण है कि किसी ब्राह्मण नेता के लिए खुद को विशुद्ध रूप से तमिल हितों का रक्षक साबित करना अपने आप में ही बड़ी चुनौती है. इसीलिए ब्राह्मणों को सियासी तवज्जो नहीं मिल रही.
देखना होगा कि इस अनदेखी को लेकर यह समुदाय चुनाव में किसके पक्ष में मतदान करता है. राज्य की 234 विधानसभा सीटों पर 23 अप्रैल 2026 को मतदान होना है और 4 मई को नतीजे आएंगे.
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