Shesh Bharat: AIADMK टूटने से बची! EPS ने बागियों को क्यों किया माफ? जानिए इस 'सामूहिक माफी' के पीछे की इनसाइड स्टोरी

Shesh Bharat: तमिलनाडु में मुख्यमंत्री थलपति विजय की सरकार बनने के बाद एआईएडीएमके (AIADMK) में बड़ी बगावत हुई थी. पार्टी को टूटने से बचाने और मुख्य विपक्ष का दर्जा बनाए रखने के लिए प्रमुख ईपीएस पलानीस्वामी ने बड़ा यू-टर्न लिया है.

Palaniswami
Palaniswami

रूपक प्रियदर्शी

follow google news

Shesh Bharat: तमिलनाडु की सियासत में इन दिनों एक ऐसा राजनीतिक ड्रामा देखने को मिल रहा है, जिसने बड़े-बड़े समीक्षकों को हैरान कर दिया है. सुपरस्टार से राजनेता बने थलपति विजय की चुनावी जीत के बाद राज्य के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं. विजय के सत्ता संभालते ही मुख्य विपक्षी पार्टी AIADMK में बड़ी बगावत हो गई थी. हालांकि, अब पार्टी प्रमुख एडप्पाडी के. पलानीस्वामी (EPS) ने एक बड़ा यू-टर्न लेते हुए अपने बागी विधायकों को 'सामूहिक माफी' दे दी है. इस फैसले ने न सिर्फ उनकी पार्टी को टूटने से बचा लिया, बल्कि मुख्यमंत्री विजय की नई सरकार को भी बड़ी स्थिरता दे दी है.

Read more!

फ्लोर टेस्ट में हुआ था बड़ा खेल

यह पूरा विवाद 13 मई को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार के फ्लोर टेस्ट के दौरान शुरू हुआ था. AIADMK प्रमुख पलानीस्वामी ने अपनी पार्टी के सभी 47 विधायकों को सरकार के खिलाफ वोट करने का कड़ा व्हिप जारी किया था. इसके बावजूद, पार्टी के वरिष्ठ नेता एस.पी. वेलुमणि और पूर्व कानून मंत्री सी.वी. षणमुगम की अगुवाई में 25 विधायकों ने बगावत कर दी.

इन बागियों ने व्हिप का उल्लंघन करते हुए विजय सरकार के समर्थन में मतदान किया. इस बगावत के कारण पलानीस्वामी के पास केवल 22 वफादार विधायक रह गए थे, जिससे पार्टी के अस्तित्व और मुख्य विपक्ष के दर्जे पर संकट खड़ा हो गया था.

पलानीस्वामी के यू-टर्न की असली वजह

शुरुआत में गुस्से में आए पलानीस्वामी ने सभी बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के पास याचिका दायर की थी. लेकिन जल्द ही उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास हो गया. अगर 21 विधायक अयोग्य हो जाते, तो सदन में AIADMK महज 22 विधायकों की एक छोटी सी पार्टी बनकर रह जाती.

इसके अलावा राज्य में एक साथ 21 सीटों पर उपचुनाव का खतरा मंडराने लगता. हालिया चुनाव हार चुकी पार्टी इस समय इतने बड़े पैमाने पर उपचुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थी. ऐसे में जब इन विधायकों ने अपनी गलती मानी तो पलानीस्वामी ने व्यावहारिक राजनीति का परिचय देते हुए अपनी याचिका वापस ले ली.

पार्टी का चालाक और नपा-तुला फॉर्मूला

पलानीस्वामी ने इस पैचअप के लिए एक बेहद सोची-समझी रणनीति अपनाई. उन्होंने उन 21 विधायकों को माफ कर दिया जिन्होंने सिर्फ वोटिंग में बगावत की थी और पार्टी में वापस लौटना चाहते थे. लेकिन, उन्होंने उन 4 विधायकों को बिल्कुल नहीं बख्शा जिन्होंने विधानसभा से इस्तीफा देकर सीधे विजय की पार्टी टीवीके (TVK) की सदस्यता ले ली थी.

स्पीकर जे.सी.डी. प्रभाकर ने इन चारों विधायकों (मरगाथम कुमारवेल, सत्यभामा पी, जयकुमार एस और इसाकी सुबैया) का इस्तीफा मंजूर कर उनकी सीटें खाली घोषित कर दीं. इस कदम से पलानीस्वामी ने साफ संदेश दिया कि सुधार करने वालों के लिए दरवाजे खुले हैं, लेकिन पूरी तरह पार्टी छोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी. इस तरह AIADMK के पास 43 विधायक बचे रहे और उनका विपक्ष का दर्जा सुरक्षित रहा.

बगावत के पीछे की अंदरूनी कहानी

इस सियासी ड्रामे के असली सूत्रधार AIADMK के कद्दावर नेता एस.पी. वेलुमणि और सी.वी. षणमुगम थे. दरअसल, चुनाव के बाद ऐसी खबरें आ रही थीं कि पलानीस्वामी अपनी कट्टर विरोधी पार्टी डीएमके (DMK) के साथ कोई अंदरूनी समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं. वेलुमणि और षणमुगम गुट को यह मंजूर नहीं था, क्योंकि AIADMK की बुनियादी राजनीति ही डीएमके के विरोध पर टिकी है.

उन्होंने तर्क दिया कि डीएमके से हाथ मिलाने के बजाय थलपति विजय की नई सरकार को समर्थन देना बेहतर है. उन्होंने रातों-रात विधायकों को एकजुट कर खुद को 'असली AIADMK' के रूप में पेश किया था. इसके अलावा, दल-बदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई विधायकों के साथ होने के कारण पलानीस्वामी के लिए कानूनी कार्रवाई करना भी आसान नहीं था.

बिना कुछ खोए मुख्यमंत्री विजय को मिला 'मास्टरस्ट्रोक'

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे फायदे में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय रहे. AIADMK के बागी धड़े की मदद से उनकी सरकार ने 144 वोटों के भारी-भरकम आंकड़े के साथ आसानी से बहुमत साबित कर दिया. सबसे बड़ी बात यह रही कि विजय ने इन बागी विधायकों को अपनी कैबिनेट में कोई मंत्री पद भी नहीं दिया. यानी विजय को बिना किसी राजनीतिक दबाव या ब्लैकमेलिंग के अपनी सरकार के लिए जरूरी स्थिरता मिल गई. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह पैचअप भविष्य में डीएमके के खिलाफ एआईएडीएमके और विजय की टीवीके के बीच एक बड़े गठबंधन की शुरुआत हो सकता है.

देश की राजनीति के लिए एक नया मॉडल

हाल के वर्षों में महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी और पश्चिम बंगाल में टीएमसी जैसी पार्टियों में बड़ी टूट देखने को मिली है. उन मामलों में कड़े रुख के कारण मूल पार्टियों ने अपना नाम और निशान तक गंवा दिया. लेकिन पलानीस्वामी ने व्यावहारिक रुख अपनाकर बगावत को संभालने का एक नया मॉडल पेश किया है. तमिलनाडु की इस घटना ने साबित कर दिया है कि राजनीति में परिस्थितियों के अनुसार लचीलापन दिखाना ही वजूद बचाने की सबसे बड़ी चाबी है.

    follow google news