Shesh Bharat: तमिलनाडु की सियासत में इन दिनों जबरदस्त हलचल है. फिल्मी पर्दे पर खलनायकों को धूल चटाने वाले थलापति विजय अब सूबे की राजनीति के नए धुरंधर बनकर उभरे हैं. हाल ही में हुए जादुई 'फ्लोर टेस्ट' को पास करके विजय ने अपनी सरकार तो बचा ली है, लेकिन इसके पीछे का सियासी गुणा-गणित बेहद दिलचस्प है. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल एआईएडीएमके के कद्दावर बागी नेता सी.वी. षणमुगम को लेकर उठ रहा है, जो सरकार बनवाने के बाद भी खुद कैबिनेट से बाहर रह गए हैं.
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कैबिनेट विस्तार..फुल हुआ कोटा
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद थलापति विजय ने तेजी से अपनी कैबिनेट का विस्तार किया है. सबसे पहले 10 मई को सीएम विजय के साथ 10 मंत्रियों ने शपथ ली थी. इसके बाद 21 मई को दूसरा विस्तार हुआ, जिसमें कांग्रेस के दो विधायकों समेत 23 नए चेहरों को जगह मिली. वहीं, 22 मई को हुए तीसरे छोटे विस्तार में सहयोगी दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ए.एम. शाहजहां और वीसीके के वन्नी अरासु को मंत्री पद दिया गया. अब विजय सरकार में मुख्यमंत्री सहित कुल 35 मंत्री हो चुके हैं और संवैधानिक नियमों के मुताबिक अब राज्य में कोई नया मंत्री नहीं बनाया जा सकता है.
संविधान का वो नियम जिसने रास्ते बंद किए
91वें संविधान संशोधन के अनुच्छेद 164-1A के तहत किसी भी राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या वहां की विधानसभा सीटों के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती. तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं, जिसका 15 फीसदी ठीक 35 बैठता है. कानूनी तौर पर मंत्रियों का कोटा पूरी तरह समाप्त होने के कारण अब षणमुगम कैंप के लिए कैबिनेट के दरवाजे पूरी तरह बंद हो चुके हैं.
षणमुगम क्यों दे रहे हैं त्याग की थ्योरी?
एआईएडीएमके के कुल 47 विधायकों में से करीब 25 विधायक बगावत करके सी.वी. षणमुगम की अगुवाई में विजय सरकार के साथ आ चुके हैं. इतनी बड़ी मदद के बाद भी कैबिनेट में जगह न मिलने पर षणमुगम अब मीडिया में सफाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि वे किसी लालच या मंत्री पद के लिए विजय के साथ नहीं आए थे. उनका मकसद तमिलनाडु में दोबारा चुनाव टालना, अपनी पार्टी को बचाना और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने से रोकना था. षणमुगम अब खुद को पार्टी हित में त्याग करने वाले नेता के रूप में पेश कर रहे हैं.
कानूनी पेंच से सरकार का बचाव
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी विधायकों को मंत्री न बनाने के पीछे एक बड़ा कानूनी कारण भी है. एआईएडीएमके पर अभी भी एडप्पादी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) का नियंत्रण है और उन्होंने बागी विधायकों को पार्टी से निकाल दिया है. अगर विजय इन बागियों को सीधे मंत्री बनाते, तो ईपीएस तुरंत कोर्ट का रुख करते और दलबदल विरोधी कानून के तहत इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग करते. थलापति विजय अपनी नई नवेली सरकार को शुरुआत में ही कानूनी पचड़ों में नहीं फंसाना चाहते थे.
सहयोगी दलों का भारी दबाव
सरकार में शामिल लेफ्ट और वीसीके जैसे दलों ने मुख्यमंत्री विजय पर साफ दबाव बनाया था कि बीजेपी के साथ चुनाव लड़ चुकी एआईएडीएमके के लोगों को कैबिनेट में जगह न दी जाए. विजय के सामने यह बड़ा सियासी संकट था कि अगर वह षणमुगम के कुछ लोगों को मंत्री बनाकर खुश करते, तो लेफ्ट और वीसीके के करीब 15 से 20 विधायक नाराज हो जाते. सहयोगियों की यह नाराजगी सरकार को संकट में डाल सकती थी, इसलिए विजय ने अपने पुराने साथियों को तवज्जो देना बेहतर समझा.
साफ-सुथरी की छवि को बचाना
थलापति विजय राजनीति में एक 'साफ-सुथरे विकल्प' के तौर पर आए हैं और उन्होंने पारंपरिक राजनीति खत्म करने का वादा किया था. सत्ता संभालते ही विपक्षी दल के बागियों को मलाईदार मंत्रालय देने पर उनकी साफ-सुथरी छवि पर सवाल खड़े हो जाते और जनता में यह संदेश जाता कि वह भी बाकी नेताओं की तरह समझौते कर रहे हैं. अपनी इसी 'ब्रांड इमेज' को बचाने के लिए विजय ने बागियों को सरकार से दूर रखा. फिलहाल थलापति विजय बेहद मजबूत स्थिति में हैं, जबकि सी.वी. षणमुगम अब सरकार से बाहर रहकर पूरी एआईएडीएमके पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह 'दो पत्ती' पर कब्जा करने की तैयारी में जुटे हैं.
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