Shesh Bharat: तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है. एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम (OPS) ने आधिकारिक रूप से डीएमके का दामन थाम लिया है. चेन्नई स्थित 'अन्ना अरिवलयम' में 20 से ज्यादा गाड़ियों के काफिले के साथ उनकी एंट्री ने राज्य की सियासत में हलचल बढ़ा दी है.
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वही ओपीएस, जिन्हें कभी जयललिता का सबसे वफादार नेता माना जाता था, अब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के साथ मंच साझा करते नजर आए. जब तस्वीर सामने आई तो उसने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं- क्या यह राजनीतिक मजबूरी है या 2026 के विधानसभा चुनाव की बड़ी रणनीति?
EPS से टकराव और नई सियासी राह
जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके में नेतृत्व की लड़ाई शुरू हुई. ओपीएस और एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) के बीच सत्ता संघर्ष खुलकर सामने आया. धीरे-धीरे पार्टी की कमान EPS के हाथों में चली गई और 2022 में ओपीएस को पार्टी से बाहर कर दिया गया.
बीजेपी ने भी 2026 चुनावों के लिए EPS गुट को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया. ऐसे में राजनीतिक जमीन खिसकती देख ओपीएस ने नया ठिकाना तलाशा. डीएमके में शामिल होना उनके लिए प्रासंगिकता बचाने का विकल्प बन गया.
थेवर वोट बैंक पर नजर
ओपीएस दक्षिण तमिलनाडु के प्रभावशाली थेवर समुदाय के बड़े चेहरे माने जाते हैं. इस समुदाय का असर करीब 40 से 50 विधानसभा सीटों पर है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओपीएस की एंट्री से डीएमके को दक्षिणी जिलों में सीधा फायदा मिल सकता है.
ओपीएस के साथ उनके बेटे और पूर्व सांसद रवींद्रनाथ कुमार भी डीएमके में शामिल हुए हैं. इससे एआईएडीएमके के पारंपरिक वोट बैंक में विभाजन की संभावना बढ़ गई है.
DMK की रणनीति और 2026 का चुनाव
स्टालिन ने पश्चिमी तमिलनाडु में EPS के प्रभाव को संतुलित करने के लिए दक्षिण में OPS को साथ लेकर क्षेत्रीय समीकरण साधने की कोशिश की है. इससे डीएमके को मनोवैज्ञानिक बढ़त भी मिलती दिख रही है.
राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते. कभी जयललिता की तस्वीर जेब में रखने वाले ओपीएस आज करुणानिधि के बेटे के साथ खड़े हैं. इसे तमिलनाडु की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जा रहा है.
'अम्मा' के वफादार की बदली राह
2014 में जब जयललिता को आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल जाना पड़ा था, तब ओपीएस को मुख्यमंत्री बनाया गया था. शपथ ग्रहण के दौरान उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे. वे अम्मा की तस्वीर सामने रखकर काम करते थे और सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठते थे.
2016 में जयललिता के निधन के बाद शशिकला और ओपीएस के बीच विवाद खुलकर सामने आया. मरीना बीच पर जयललिता की समाधि पर 40 मिनट ध्यान लगाकर बैठने की घटना को ‘धर्मयुद्ध’ कहा गया. लेकिन अंततः पार्टी की कमान EPS के हाथों में चली गई.
आज हालात ऐसे हैं कि शशिकला भी हाशिए पर हैं और ओपीएस को डीएमके की शरण लेनी पड़ी है.
क्या बदलेगा सियासी गणित?
ओपीएस की डीएमके में एंट्री सिर्फ एक नेता का शामिल होना नहीं, बल्कि दक्षिण तमिलनाडु के समीकरण बदलने की कोशिश है. 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह गठबंधन कितना असर दिखाएगा, यह आने वाला समय बताएगा.
फिलहाल इतना तय है कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है.
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