Shesh Bharat: साल 2014 में जब आंध्र प्रदेश का बंटवारा हुआ और तेलंगाना देश का 29वां राज्य बना, तब वहां की क्षेत्रीय राजनीति में एक बड़ा उथल-पुथल देखने को मिला था. उस समय भाषा और संस्कृति एक होने के बावजूद कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी (TDP) जैसी बड़ी ताकतें तेलंगाना की जमीन से धीरे-धीरे गायब हो गईं. विभाजन के बाद टीडीपी ने खुद को सिर्फ आंध्र प्रदेश तक सीमित कर लिया था और तेलंगाना विरोधी पार्टी का टैग लगने के बाद चंद्रबाबू नायडू ने वहां से एक दूरी बना ली थी. लेकिन अब पूरे 10 साल बाद टीडीपी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी 'रिवर्स माइग्रेशन' की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं.
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हाल ही में मंगलगिरि में आयोजित टीडीपी के सबसे बड़े सम्मेलन 'महानाडु' में एक ऐसा प्रस्ताव पास हुआ जिसने सबको चौंका दिया है. टीडीपी ने फैसला किया है कि वह आंध्र प्रदेश से बाहर निकलकर तेलंगाना में अपनी पार्टी का दोबारा विस्तार करेगी. हालांकि तेलंगाना में अभी कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं होने वाले हैं, लेकिन इसी साल होने वाले नगरपालिकाओं (निकाय) के चुनाव से टीडीपी राज्य में अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरुआत करने जा रही है.
बीजेपी की उम्मीदों पर फिर सकता है पानी
टीडीपी का तेलंगाना में दोबारा आना सत्तारूढ़ कांग्रेस और कमजोर पड़ चुकी बीआरएस के लिए तो चिंता की बात है ही, लेकिन इसका सबसे बड़ा झटका भारतीय जनता पार्टी (BJP) को लग सकता है. बीजेपी पिछले काफी समय से तेलंगाना में खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने यहां बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 8 सीटें जीती थीं और करीब 35.19% का रिकॉर्ड वोट शेयर हासिल किया था.
अब जब बीजेपी राज्य में तेजी से आगे बढ़ रही है, ऐसे मोड़ पर टीडीपी का पीला रंग भगवा रंग के सामने एक नई चुनौती बनकर खड़ा हो गया है. टीडीपी के पास सबसे बड़ा फायदा यह है कि उनके पास तेलुगू अस्मिता, खान-पान और भाषा का सीधा जुड़ाव है. अगर टीडीपी निकाय चुनावों में थोड़ा भी बेहतर प्रदर्शन करती है, तो बीआरएस और बीजेपी में गए टीडीपी के पुराने नेताओं की घर वापसी का रास्ता साफ हो जाएगा. दिल्ली की राजनीति में भले ही बीजेपी और टीडीपी साथ दिखते हों, लेकिन तेलंगाना की सड़कों पर 'कमल' और 'साइकिल' का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है.
नारा लोकेश का 'मास्टरप्लान' और एनटीआर की विरासत
माना जा रहा है कि टीडीपी को तेलंगाना में दोबारा जिंदा करने का यह पूरा आईडिया चंद्रबाबू नायडू के बेटे और पार्टी के वर्किंग प्रेसीडेंट नारा लोकेश का है. नारा लोकेश ने इसके पीछे तर्क दिया है कि जब टीडीपी का जन्म ही 29 मार्च 1982 को हैदराबाद (एनटीआर भवन) में हुआ था, तो पार्टी तेलंगाना में काम क्यों नहीं कर सकती?
इसके अलावा टीडीपी का यह कदम तेलंगाना के मौजूदा मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के लिए भी एक बड़ी परीक्षा साबित होगा. सीएम रेवंत रेड्डी कभी चंद्रबाबू नायडू के बेहद करीबी और टीडीपी के सिपाही रह चुके हैं. साल 2015 के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और अपनी मेहनत से कांग्रेस को सत्ता दिलाई. अब अपने पुराने गुरु की पार्टी के सामने वे अपनी जमीन कैसे बचाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा.
क्या है टीडीपी का प्लान-A और प्लान-B?
तेलंगाना की राजनीति में बीआरएस के कमजोर होने के बाद पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए टीडीपी ने एक सटीक रणनीति तैयार की है:
प्लान-A (शहरी क्षेत्रों पर फोकस): टीडीपी का मुख्य ध्यान ग्रेटर हैदराबाद, खम्मम, रंगारेड्डी और सिकंदराबाद जैसे शहरी इलाकों पर है. इन क्षेत्रों में आंध्र मूल के निवासियों (सेटलर्स) और कम्मा समुदाय की बड़ी आबादी रहती है, जो पारंपरिक रूप से टीडीपी का मजबूत वोट बैंक मानी जाती है.
प्लान-B (संगठनात्मक मजबूती): महानाडु सम्मेलन में तेलंगाना के लिए 19 से ज्यादा कमेटियों का गठन किया गया है. इसके साथ ही पार्टी ने साल 2029 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की बात कही है, जिससे महिला वोटर्स के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत हो सके.
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