NEET Exam Controversy: क्या फिल्मों का कोई सुपरस्टार, राजनीति की पिच पर उतरते ही युवाओं की सबसे दुखती रग को पकड़कर सीधे सत्ता पर काबिज हो सकता है? थलपति विजय ने बिल्कुल यही कर दिखाया है! फिल्मी चकाचौंध को छोड़कर सियासी मैदान में उतरे विजय ने तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में युवा वोटरों के दिलों में ऐसी जगह बनाई कि सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे.
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NEET-UG 2026 परीक्षा के पेपर लीक और उसे रद्द किए जाने के बाद तमिलनाडु के सीएम सी. जोसेफ विजय यानी अभिनेता थलपति विजय ने एक ऐसा दांव खेला है, जिसे देश के युवाओं का दिल जीतने का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. विजय ने सीधे केंद्र सरकार को ललकारते हुए मांग की है कि NEET को हमेशा के लिए खत्म किया जाए.
NEET को खत्म किया जाए
NEET-UG 2026 परीक्षा के पेपर लीक होने और इसे रद्द किए जाने के बाद, सीएम थलापति विजय ने देश के करोड़ों छात्रों और उनके परिवारों के गुस्से को एक नई राजनीतिक आवाज दे दी है. उन्होंने साफ लहजे में कहा है कि नीट के सिस्टम में ही खामियां हैं. इसे पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए. आखिर कैसे विजय ने छात्रों के इस दर्द को अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनाया और कैसे इस एक स्टैंड ने उन्हें आज देश भर के युवाओं का मसीहा बना दिया है?
12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर हो एडमिशन!
NEET-UG 2026 के रद्द होने के बाद देश का माहौल गर्म है. विजय ने कहा है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक और परीक्षाओं के कैंसिलेशन ने लाखों मेडिकल उम्मीदवारों की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया है. उन्होंने सीधे शब्दों में कहा कि यह परीक्षा प्रणाली अब अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुकी है. विजय ने युवाओं की नब्ज पर हाथ रखते हुए तर्क दिया कि मेडिकल कॉलेजों में दाखिला 12वीं कक्षा के बोर्ड अंकों के आधार पर होना चाहिए ताकि कोचिंग माफियाओं का राज खत्म हो सके. उनका यह स्टैंड सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है और छात्र इसे अपने हक की लड़ाई मान रहे हैं.
शिक्षा को समवर्ती सूची से हटाने की मांग!
यह पहली बार नहीं है जब थलपति विजय ने NEET के खिलाफ बिगुल फूंका है. राजनीति में आने से पहले और अपनी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के गठन के दौरान भी विजय छात्रों के सम्मान समारोहों में NEET का खुलकर विरोध करते आए हैं. साल 2024 में जब वे बतौर अभिनेता मेधावी छात्रों से मिले थे, तब भी उन्होंने कहा था कि 'एक राष्ट्र, एक परीक्षा' का फॉर्मूला देश की विविधता के खिलाफ है. उन्होंने शिक्षा को समवर्ती सूची (Concurrent List) से हटाकर वापस राज्य सूची में डालने की वकालत की थी ताकि हर राज्य को अपने बच्चों के भविष्य का फैसला करने का हक मिले.
तमिलनाडु में NEET का विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि बेहद भावनात्मक मुद्दा रहा है. पिछली स्टालिन सरकार का स्टैंड हमेशा से 'नो टू नीट' (No to NEET) का रहा है. राज्य विधानसभा ने NEET छूट विधेयक (NEET Exemption Bill) को सर्वसम्मति से पारित किया था. तमिलनाडु का तर्क है कि यह परीक्षा केवल अमीर और शहरी पृष्ठभूमि के बच्चों को फायदा पहुंचाती है जो महंगी कोचिंग ले सकते हैं, जबकि ग्रामीण, सरकारी स्कूल और तमिल माध्यम के गरीब बच्चे इसमें पिछड़ जाते हैं.
2016-17 से NEET अनिवार्य
अगर इस पूरी कहानी के पीछे का इतिहास देखें, तो NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) की शुरुआत साल 2013 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) और सीबीएसई द्वारा की गई थी. इसका उद्देश्य देश के अलग-अलग राज्यों और संस्थानों द्वारा ली जाने वाली दर्जनों प्रवेश परीक्षाओं को हटाकर 'एक देश, एक परीक्षा' के तहत मेडिकल दाखिलों को पारदर्शी बनाना था. शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया था, लेकिन बाद में साल 2016-17 से इसे पूरे देश में अनिवार्य कर दिया गया. तभी से तमिलनाडु लगातार इसका कानूनी और राजनीतिक विरोध कर रहा है.
आज जब पूरे देश का युवा नीट परीक्षा में हो रही धांधलियों और पेपर लीक से हताश है, तब विजय ने NEET को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कहकर देश के करोड़ों छात्रों और उनके अभिभावकों के दिलों को छू लिया है. विजय का यह आइडिया कि राज्य बोर्ड के नंबरों को ही आधार माना जाए, बिना कोचिंग के डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले आम भारतीय युवाओं को बेहद रास आ रहा है.
कितना आसान है विजय का फॉर्मूला!
12वीं के नंबरों (Board Marks) के आधार पर मेडिकल में दाखिला देना राजनीतिक रूप से जितना आकर्षक लगता है, व्यावहारिक तौर पर ये उतना ही पेचीदा और असमानताओं से भरा है. सबसे बड़ी चुनौती देश भर के अलग-अलग CBSE, ICSE और अलग-अलग स्टेट बोर्ड्स के बीच मूल्यांकन और मार्किंग के पैटर्न में भारी अंतर होना है. कुछ बोर्डों में छात्रों को खुलकर 95% से अधिक नंबर मिलते हैं, जबकि कई सख्त स्टेट बोर्ड्स में 80% लाना भी बेहद मुश्किल होता है. ऐसे में एक साझा और निष्पक्ष मेरिट लिस्ट बनाना करीब-करीब असंभव हो जाता है.
अगर केवल 12वीं के अंकों को ही डॉक्टर बनने का एकमात्र जरिया बना दिया जाए, तो इससे स्कूलों में 'नंबरों की अंधी दौड़' शुरू हो जाएगी, जिससे अंकों की विश्वसनीयता (Marks Inflation) पूरी तरह खत्म होने का खतरा रहेगा. इससे कोचिंग माफिया खत्म भी नहीं होगा क्योंकि वो 12वीं बोर्ड में 100% अंक' दिलाने के नए धंधे शुरू कर देंगे. नकल, पैरवी और कॉपी चेकिंग में करप्शन का मामला पहले से सवालों के घेरे में है.
विजय ने इस राष्ट्रीय संकट को एक बड़े राजनीतिक अवसर में बदल दिया है और युवाओं के बीच खुद को 'मसीहा' के रूप में स्थापित करने का सबसे दमदार आइडिया पेश कर दिया है. अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार विजय की इस मांग और छात्रों के इस बढ़ते आक्रोश पर क्या फैसला लेती है. देश-दुनिया की तमाम बड़ी खबरों के लिए बने रहिए हमारे न्यूज़ चैनल के साथ.ओ
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