केंद्र सरकार की नीति निर्माण संस्था 'नीति आयोग' की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक में इस बार एक नया इतिहास रच गया. लंबे समय के बाद मोदी सरकार के कार्यकाल में ऐसा हुआ है जब देश के सभी 28 राज्यों के मुख्यमंत्री एक साथ इस बैठक में शामिल होने राष्ट्रपति भवन परिसर के कल्चरल सेंटर पहुंचे. इस बैठक में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्रियों के साथ विकास योजनाओं पर संवाद किया, वहीं बैठक के दौरान हुए ऑफिशियल फोटो सेशन ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं. इस फोटो सेशन में दक्षिण भारत के नए मुख्यमंत्रियों का दबदबा साफ नजर आया.
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फर्स्ट रो का सियासी समीकरण और साउथ की 'मार्केटिंग'
सरकारी बैठकों में फोटो सेशन के दौरान नेताओं के खड़े होने की जगह किसी रैंडम चॉइस से नहीं, बल्कि कड़े प्रोटोकॉल, वरिष्ठता या अल्फाबेट के आधार पर तय होती है. हालांकि, इस बार पहली कतार (फर्स्ट रो) के अरेंजमेंट में केंद्र सरकार की एक खास रणनीति दिखाई दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ पहली कतार में एनडीए के मजबूत सहयोगी चंद्रबाबू नायडू, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस तो मौजूद थे ही, लेकिन उनके साथ दक्षिण भारत के तीन नए चेहरों को विशेष रूप से जगह दी गई.
इनमें तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री थलापति विजय, कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और केरल के सीएम वीडी सतीशन शामिल थे. 4 मई के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले इन नेताओं को आगे रखकर केंद्र ने दक्षिण भारत में एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. खास बात यह रही कि जहां कर्नाटक कोटे से जेडीएस नेता और केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी को भी अग्रिम पंक्ति में जगह मिली, वहीं दो साल से अधिक समय से सीएम पद संभाल रहे तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को दूसरी कतार में जगह दी गई.
थलापति विजय रहे 'सेंटर ऑफ अट्रैक्शन'
मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार किसी बड़े स्तर की आधिकारिक बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे तमिलनाडु के सीएम थलापति विजय पूरी बैठक के दौरान आकर्षण का मुख्य केंद्र बने रहे. आमतौर पर गैर-बीजेपी मुख्यमंत्रियों को केंद्र के मंचों पर इतनी प्रमुखता नहीं मिलती, लेकिन नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान खुलकर विजय की तारीफ की. डॉ. लाहिड़ी ने कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री विजय को पहली बार साक्षात देखा है और वे उनके विजन से बेहद प्रभावित हुए हैं.
बैठक में विजय ने तमिलनाडु को साल 2035 तक 1.5 ट्रिलियन डॉलर (1.5 लाख करोड़ डॉलर) की अर्थव्यवस्था बनाने का जो विस्तृत रोडमैप पेश किया, उसने नीति आयोग के बड़े-बड़े विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं को हैरान और प्रभावित कर दिया.
तमिल प्राइड पर स्टालिन की राह
पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के कार्यकाल के दौरान केंद्र और तमिलनाडु सरकार के रिश्ते बेहद तल्ख रहे थे. त्रि-भाषा नीति का विरोध करने के कारण केंद्र ने राज्य का करीब 3,000 करोड़ रुपये का शिक्षा फंड रोक रखा है. थलापति विजय भले ही स्टालिन के कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाकर चुनाव जीते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने 'तमिल प्राइड' से जुड़े कोर मुद्दों पर अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई.
विजय ने नीति आयोग के मंच से तमिलनाडु के हिस्से के रोके गए 3,284 करोड़ रुपये के फंड को बिना किसी शर्त के तुरंत जारी करने की मांग की. इसके साथ ही उन्होंने नीट (NEET) परीक्षा को लेकर भी केंद्र को स्पष्ट रुख बता दिया कि तमिलनाडु में एमबीबीएस दाखिले कक्षा 12वीं के अंकों के आधार पर ही होंगे और राज्य को नीट, बीडीएस व आयुष पाठ्यक्रमों से स्थायी छूट मिलनी चाहिए.
विजय ने साफ किया कि अगर केंद्र सरकार तमिलनाडु के विकास में रचनात्मक सहयोग करेगी, तभी राज्य सरकार भी केंद्र को हरसंभव रचनात्मक सहयोग (Constructive Cooperation) देगी. उन्होंने चेन्नई से कन्याकुमारी तक हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर सहित पांच बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, बाढ़ नियंत्रण और स्पेस मैन्युफैक्चरिंग के लिए अतिरिक्त केंद्रीय ग्रांट की भी मांग की.
चुनावी वादे पूरे करने की चुनौती और केंद्र से उम्मीदें
थलापति विजय ने सत्ता में आने के लिए जनता से कई बड़े लोक-लुभावन वादे किए हैं, जिनमें महिलाओं के लिए 2500 रुपये मासिक सहायता, बेरोजगार युवाओं को 4000 रुपये भत्ता, मुफ्त रसोई गैस और किसानों की कर्जमाफी शामिल है. इन वादों को पूरा करने के लिए राज्य सरकार को सालाना करीब 1 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त बजट की जरूरत होगी, जबकि तमिलनाडु पहले से ही 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज में डूबा है.
बिना नया टैक्स लगाए इन वादों को पूरा करने और 1.5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लक्ष्य को छूने के लिए तमिलनाडु को तत्काल 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की वित्तीय मदद की आवश्यकता है. यही वजह है कि विजय ने टैक्स में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने और रुके हुए फंड्स को जारी करने की पुरानी मांग को दोबारा दोहराया है. बैठक के खत्म होने के बाद भी विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अलग से मुलाकात कर राज्य के हितों पर चर्चा की.
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