कहा जाता है कि राजनीति में बिना गॉडफादर, बिना धनबल और बिना राजनीतिक बैकग्राउंड के चुनाव जीतना मुश्किल होता है. थलापति विजय ने इस पूरे मिथक को ध्वस्त कर दिया. विजय जब राजनीति में आए तो उनके पास खोने को कुछ नहीं था. उन्होंने सिर्फ जनता के भरोसे और अपने साहसी 'वादों' के दम पर सत्ता का सिंहासन हासिल कर लिया.
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पहले बजट में लोक-लुभावन योजनाओं की बारिश
जब कोई सुपरस्टार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है, तो उम्मीदें आसमान छूने लगती हैं. तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री और सिनेमा के 'थलापति' सी. जोसेफ विजय ने अपनी सरकार का पहला ऐतिहासिक बजट पेश कर दिया. सोने के सिक्के, नवजात बच्चों को सोने की अंगूठी, मुफ्त बिजली और शिक्षा का महा-बजट विजय ने तमिलनाडु की राजनीति में लोक-लुभावन योजनाओं का एक ऐसा 'सिनेमैटिक ब्लास्ट' किया है, जिसने विरोधियों के होश उड़ा दिए हैं. लेकिन क्या यह सिर्फ चुनावी वादों को पूरा करने का स्टंट है या फिर तमिलनाडु को 1.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का मास्टरस्ट्रोक?
क्या विजय भी फ्रीबीज की राजनीति पर चल पड़े?
विजय तमिलनाडु को एक नया भविष्य दे रहे हैं या फिर द्रविड़ियन पार्टियों की उसी 'मुफ्तखोरी' की स्क्रिप्ट को कॉपी कर रहे हैं, जिसे वे कभी कोसते थे? तमिलनाडु की सियासत हमेशा से 'फ्रीबीज' यानी मुफ्त के सामानों पर टिकी रही है और विजय भी इस जाल से बाहर नहीं निकल पाए. चुनाव में उन्होंने जो वादे किए, बजट में उन्हें पूरा करने के लिए खजाने का मुंह खोल दिया. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के दौरान विजय ने TVK के घोषणापत्र में जनता से बड़े-बड़े लोक-लुभावन वादे किए थे. अब मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने पहले ही बजट (2026-27) में उन वादों को जमीन पर उतारने का रोडमैप पेश कर दिया है. सबसे ज्यादा चर्चा उनके 'गोल्डन' वादों की है.
दुल्हनों और नवजातों के लिए सोने की योजना
अन्नन सीर विवाह योजना के तहत गरीब परिवारों की दुल्हनों को शादी के तोहफे के रूप में 8 ग्राम का सोने का सिक्का और एक रेशमी साड़ी दी जाएगी. इसके लिए सरकार ने 812 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. सरकारी अस्पतालों में पैदा होने वाले नवजात शिशुओं के लिए थाई मामन थंगा मोथिरम योजना शुरू की गई है, जहां हर बच्चे को सरकार की तरफ से 1 ग्राम की सोने की अंगूठी मिलेगी. इसके लिए 560 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट अलग रखा गया है.
सोना बांटने का पूरा वित्तीय गणित
पूरी आबादी को सोना देना किसी भी सरकार के लिए असंभव है. इसलिए विजय सरकार ने इसे गरीबी रेखा से नीचे (BPL) परिवारों की बेटियों की शादी से जोड़ा है. अगर सालाना करीब 1 लाख शादियों को कवर किया जाए तो बाजार भाव के अनुसार प्रति लाभार्थी 10 ग्राम सोने की कीमत करीब 75,000 रुपये बैठती है. इसका मतलब है कि सरकार को हर साल कुल एक टन सोने की जरूरत होगी. इस हिसाब से योजना पर शुद्ध वार्षिक खर्च 750 करोड़ रुपये आएगा. राज्य को दिवालिया किए बिना विजय बेहद सटीक वित्तीय अनुशासन के साथ अपनी महा-गारंटी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं.
विपक्ष का हमला और समर्थकों का बचाव
राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर इस वक्त सिर्फ एक ही बात की चर्चा है क्या विजय 'द्रविड़ियन मॉडल' (DMK-AIADMK) की राजनीति को मात देने के लिए उन्हीं के हथियार यानी मुफ्त योजनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं? डीएमके और एआईएडीएमके का आरोप है कि विजय ने उनके पुराने कल्याणकारी मॉडल की नकल की है. हालांकि, विजय के समर्थकों का कहना है कि यह 'कॉपी' नहीं बल्कि 'सुधार' है.
अन्ना और मामा की ब्रांडिंग पर फोकस
विजय ने बजट से संदेश दिया कि वे खुद को स्टार नहीं, बल्कि जनता के अन्ना यानी बड़े भाई और मामा के रूप में पेश करेंगे. इसलिए योजनाओं के नाम भी अन्नन सीर यानी 'भाई का उपहार' और थाई मामन यानी 'सगे मामा' रखे गए हैं. यह सीधे तौर पर महिलाओं और भावुक तमिल मतदाताओं के दिलों में उतरने की कोशिश है, जिसे विपक्षी पार्टियां 'प्योर स्टंट' बता रही हैं.
बजट से पहले ही लागू कर दी योजना
अक्सर सरकारें बजट पास होने के बाद योजनाएं शुरू करती हैं, लेकिन मुख्यमंत्री विजय ने ऐसा दांव चला कि बजट सत्र की तारीख आने से पहले ही जनता के हाथों में 'सोना' पहुंच गया. सरकार ने आदेश जारी किया कि सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले हर बच्चे को 1 ग्राम सोने की अंगूठी और बेबी वेलकम किट तुरंत दी जाएगी. विजय ने पहले प्रशासनिक आदेश से योजना लागू की और बाद में बजट में उसके लिए फंड पास करवाया. इस रणनीतिक कदम से उन्होंने जनता को यह संदेश दे दिया कि उनके लिए सरकारी औपचारिकताएं बाद में हैं और जनता को दिया गया वादा सबसे पहले.
जयललिता से मिलता-जुलता मॉडल
अगर लगता है कि विजय ने कुछ बहुत अनोखा किया है, तो इतिहास के पन्नों को पलटिए. भारत की राजनीति में सत्ता की चाबी हमेशा से लोक-लुभावन योजनाओं के पास रही है. तमिलनाडु में मुफ्त सामान बांटने की शुरुआत जयललिता ने की थी, जिन्होंने महिलाओं को मुफ्त मिक्सी, ग्राइंडर, पंखे और शादी के लिए सोना योजना दी थी. उन्होंने गरीब परिवारों की बेटियों की शादी के लिए 'थालिक्कु थंगम थित्तम' यानी 'मंगलसूत्र के लिए सोना' योजना शुरू की थी. भारतीय राजनीति में चुनावी गारंटी को पूरी ईमानदारी से निभाने का यह सबसे बड़ा और ऐतिहासिक उदाहरण माना जाता है.
2011 से 2016 तक कैसे बढ़ी सोना योजना
2011 में सत्ता में आते ही जयललिता ने गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों की शादी के लिए 4 ग्राम शुद्ध सोना मंगलसूत्र बनाने के लिए मुफ्त देना शुरू किया. 10वीं पास लड़कियों को 25,000 रुपये और ग्रेजुएट या डिप्लोमा धारक लड़कियों को 50,000 रुपये की नकद वित्तीय सहायता भी दी. 2016 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने इस सोने की मात्रा को दोगुना करने का वादा किया. दोबारा मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने अपनी पहली कैबिनेट बैठकों में इस फाइल को मंजूरी दी और सोने की मात्रा बढ़ाकर 8 ग्राम कर दी. योजना इतनी लोकप्रिय हुई कि तमिलनाडु सरकार ने कुछ ही वर्षों में इसके लिए करीब 2 टन से अधिक सोने की खरीद की. सरकार ने योजना के लिए सालाना 700 करोड़ रुपये से अधिक का बजट आवंटित किया, जिससे हर साल करीब 1.5 लाख गरीब लड़कियों को सीधा लाभ मिला.
जयललिता की ऐतिहासिक जीत का फॉर्मूला
जयललिता ने इस 'सोना योजना' के दम पर 2016 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. तमिलनाडु की राजनीति में करीब 32 साल से यह चलन था कि कोई भी पार्टी लगातार दूसरी बार चुनाव नहीं जीतती थी, लेकिन जयललिता ने मई 2016 में दोबारा सरकार बनाकर इस मिथक को तोड़ दिया. मई 2016 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के मात्र छह महीने बाद, 5 दिसंबर 2016 को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. उनके जाने के बाद उनकी पार्टी (AIADMK) की सरकार 2021 तक चलती रही, लेकिन 2021 में जब एम.के. स्टालिन मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने इस सोना योजना को बंद कर दिया.
क्या विजय भी दोहराएंगे इतिहास?
विजय की इस कहानी में जयललिता का यह अध्याय सबसे बड़ा सबक है. जयललिता ने 2016 में इस सोने के वादे के दम पर वह इतिहास रचा था, जो तमिलनाडु में तीन दशकों से कोई नहीं कर पाया था. जनता ने उनके वादे पर मुहर लगाकर उन्हें दोबारा सत्ता सौंपी थी. अब विजय भी उसी 'गोल्डन फॉर्मूले' के सहारे अपनी राजनीतिक सल्तनत को अजेय बनाने की राह पर निकल पड़े हैं.
क्या सोना चमकाएगा तमिलनाडु की किस्मत?
साफ है कि परदे पर विलेन को एक घूंसे में उड़ाने वाले थलापति विजय को भी यह समझ आ चुका है कि राजनीति के विलेन यानी विपक्ष को हराने के लिए 'मुफ्त की रेवड़ियों' और 'सोने के सिक्कों' का सहारा लेना ही पड़ेगा. अब देखना यह है कि यह सोना तमिलनाडु की किस्मत चमकाता है या उसे कर्ज के और गहरे दलदल में धकेलता है. विपक्ष का आरोप है कि कावेरी नदी और मेकेदातु बांध जैसे गंभीर मुद्दों पर अपनी प्रशासनिक नाकामी को छिपाने के लिए विजय ने यह भारी-भरकम बजट और मुफ्त योजनाओं का 'डैमेज कंट्रोल' कार्ड खेला है.
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