तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जब किसी को इतनी उम्मीद नहीं थी, तब विजय की नई-नई पार्टी टीवीके ने सत्ता हासिल कर ली. बहुमत से जरा सा चूके लेकिन कांग्रेस, VCK, CPI, CPM और IUML जैसी पार्टियों के समर्थन से राज्य में अपनी सरकार बना ली. जो काम स्टालिन ने नहीं किया वो विजय ने किया. पावर शेयर करके. तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में ये पहली बार हुआ जब सत्ता वाली किसी पार्टी ने अपनी छोटी सहयोगी पार्टियों को सरकार में सीधे मंत्री पद देकर सत्ता की वास्तविक हिस्सेदारी दी. VCK और IUML को कैबिनेट पद दिए गए. इस कदम से छोटे दल TVK के साथ बेहद सहज महसूस कर रहे हैं, जिससे विजय को अपनी गठबंधन राजनीति मजबूत करने में मदद मिली है.
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1 जुलाई की कोवलम बैठक और विजय की कूटनीति
कोई भी ये सोचेगा कि जब अलायंस की सरकार ठीक चल रही है, आने वाले कुछ सालों तक कोई चुनाव नहीं लड़ना है तो थलापति विजय को नए फ्रंट बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उनके पास ये विकल्प खुला भी है कि दिल्ली में इंडिया अलायंस ज्वाइन कर लें. फिर भी विजय की नया फ्रंट बनाने की हलचल तेज है. एक जुलाई को चेन्नई के पास कोवलम रिजॉर्ट में आने के लिए धड़ाधड़ इनवाइट पर्सनली मिलकर दिए जा रहे हैं. विजय के मंत्रियों एन. आनंद और आधव अर्जुन ने जिस तरह निजी तौर पर जाकर VCK प्रमुख थोल थिरुमावलवन, MDMK के वाइको और वामपंथी नेताओं को न्योता दिया है, वह विजय की सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा है.
नए फ्रंट का एजेंडा और दूरगामी लक्ष्य
कहने को तो थैंक्सगिविंग मीटिंग है लेकिन इरादा फ्रंट बनाने का है. मकसद बिखरे हुए समर्थन को एक औपचारिक और मजबूत सेक्युलर फ्रंट में तब्दील करना है. नए फ्रंट का एक साझा नाम, नेतृत्व और न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय किया जाएगा. फ्रंट केवल तात्कालिक सरकार चलाने के लिए नहीं है. TVK का लक्ष्य इस मोर्चे के जरिए आगामी स्थानीय निकाय चुनाव (Local Body Polls), विधानसभा उपचुनावों, 2029 के लोकसभा चुनाव और यहाँ तक कि 2031 के विधानसभा चुनावों तक इस गठबंधन को एकजुट रखकर राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करना है.
तमिलनाडु की राजनीति में "Political Realignment"
एक जुलाई की विजय की बैठक तमिलनाडु की राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा "Political Realignment" है. कांग्रेस, VCK, लेफ्ट, IUML कल तक DMK के सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस SPA का पक्का हिस्सा थे, वो सब अब DMK का साथ छोड़कर TVK के नए फ्रंट में शामिल हो रहे हैं. विजय की पार्टी खुद को पेरियार, डॉ. बी.आर. आंबेडकर और के. कामराज के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित मानती है. इस नए धर्मनिरपेक्ष मोर्चे को खड़ा करके विजय एक तरफ DMK के द्रविड़ियन एजेंडे को चुनौती दे रहे हैं और दूसरी तरफ खुद को राज्य में BJP और RSS की राइट-वििंग राजनीति के खिलाफ बड़ा चेहरा बना रहे हैं.
कांग्रेस को मिला 60 साल बाद बड़ा सियासी बूस्ट
DMK का सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस हमेशा स्टालिन के कंट्रोल में रहा. DMK अपने सहयोगियों कांग्रेस या लेफ्ट को सीटें तो देती थी, लेकिन सत्ता या कैबिनेट में कोई हिस्सेदारी यानी मंत्री पद नहीं देती थी. ये पूरा द्रविड़ियन मॉडल था जिसके साथ रहना कांग्रेस की मजबूरी भी थी. DMK के गठबंधन (SPA) में कांग्रेस हमेशा बैकफुट पर रहती थी और उसे मनमुताबिक सीटें या सम्मान नहीं मिलता था. विजय ने कांग्रेस को करीब 60 साल बाद तमिलनाडु सरकार की कैबिनेट में शामिल करके उसे राज्य में एक बड़ा सियासी बूस्ट दिया है, जो DMK कभी नहीं दे पाई.
धर्मनिरपेक्षता के इकलौते मसीहा का कार्ड फेल
DMK का SPA यह नैरेटिव चलाता था कि तमिलनाडु में केवल द्रविड़ पार्टियां ही सामाजिक न्याय की रक्षा कर सकती हैं. विजय के इस नए मोर्चे ने उस एकाधिकार को तोड़ दिया है. विजय अब खुद को सूबे में भाजपा-आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष विकल्प (Secular Face) साबित कर रहे हैं, जिससे DMK का 'धर्मनिरपेक्षता का इकलौता मसीहा' होने का कार्ड फेल हो गया है.
चुनाव पूर्व गठबंधन बनाम भविष्य का साझा एजेंडा
स्टालिन का SPA एक प्री-पोल अलायंस (चुनाव पूर्व गठबंधन) था जो केवल सीटें बांटने के लिए था. विजय का 1 जुलाई को बनने वाला मोर्चा सरकार को स्थिरता देने और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों, उपचुनावों तथा 2029 के लोकसभा चुनावों में साझा एजेंडे के तहत विपक्षी DMK को पूरी तरह हाशिए पर धकेलने के लिए बनाया जा रहा है.
कांग्रेस की भूमिका और राहुल गांधी का गेम-चेंजर फैसला
इस पूरी कहानी में कांग्रेस पार्टी की भूमिका सबसे बड़ी और गेम-चेंजर साबित होने वाली है. राष्ट्रीय स्तर पर 'इंडिया ब्लॉक' (INDIA Bloc) का हिस्सा होने के बावजूद, राहुल गांधी की कांग्रेस ने तमिलनाडु में DMK का साथ छोड़कर मुख्यमंत्री विजय की TVK के साथ जाने का ऐतिहासिक फैसला किया है. कांग्रेस लंबे समय से तमिलनाडु में DMK की 'जूनियर पार्टनर' बनकर रहने से परेशान थी. विजय के साथ आकर कांग्रेस को राज्य में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने और सम्मानजनक हिस्सेदारी का बड़ा मौका मिला है.
इंडिया ब्लॉक के भीतर नए समीकरण और दरार
कांग्रेस का यह कदम राष्ट्रीय राजनीति में 'इंडिया ब्लॉक' के भीतर भी नए समीकरण पैदा कर रहा है, जिससे नाराज होकर DMK ने विपक्षी बैठकों से दूरी तक बना ली है. तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना एक पारंपरिक और वफादार वोटबैंक है खासकर दक्षिण तमिलनाडु में. विजय को समर्थन देकर कांग्रेस ने इस नए मोर्चे को राष्ट्रीय पहचान और विश्वसनीयता दी है. इसके अलावा, कांग्रेस का साथ मिलने से विजय पर "कम्युनल ताकतों की बी-टीम" होने का ठप्पा नहीं लग सकता.
दिल्ली में स्टालिन, तमिलनाडु में विजय: कांग्रेस की दोहरी रणनीति
इंडिया अलायंस (INDIA Bloc) के गठन में एम.के. स्टालिन की DMK एक बेहद महत्वपूर्ण और संस्थापक सदस्य रही है. चूंकि तमिलनाडु में विजय की सीधी राजनीतिक लड़ाई DMK से ही है, ऐसे में विजय का राष्ट्रीय स्तर पर उस अलायंस का हिस्सा बनना बेहद पेचीदा है जहां DMK पहले से बड़े भाई की भूमिका में है. यही वजह है कि विजय के साथ आने के कारण तमिलनाडु में कांग्रेस और DMK के बीच दरार जरूर आ गई है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अभी भी DMK को पूरी तरह छोड़ नहीं पाई है. राहुल की लाइन फिलहाल तो यही है कि दिल्ली में स्टालिन को साथ लेकर चलेंगे, तमिलनाडु में विजय के साथ होंगे.
स्टार पावर और जमीनी कैडर की नई केमिस्ट
विजय के पास 'स्टार पावर' और 'युवा जोश' है, लेकिन इन सहयोगी दलों के पास 'जातीय समीकरण', 'मजबूत कैडर', 'अल्पसंख्यक-दलित गठजोड़' और 'राजनीतिक अनुभव' है. इन सभी यूएसपी को मिलाकर जो गुलदस्ता (Chemistry) बनता है, वही तमिलनाडु की राजनीति में DMK के पारंपरिक सामाजिक समीकरण को सीधे चुनौती दे रहा है.
क्षेत्रीय वोटबैंक और सरकार चलाने की जरूरत
सी. जोसेफ विजय (Thalapathy Vijay) की पार्टी TVK के साथ जो पार्टियां आ रही हैं, वे तमिलनाडु की जमीनी राजनीति में बहुत गहरा रसूख रखती हैं. विजय के पास अपना 'मास अपील' और यूथ वोटबैंक तो है, लेकिन सरकार चलाने और भविष्य के चुनाव जीतने के लिए उन्हें इन क्षेत्रीय वोटबैंक की जरूरत पड़ेगी.
मुख्यमंत्री विजय: पर्दे के हीरो से बड़े रणनीतिकार तक
'थलापति' विजय अब केवल सिनेमाई पर्दे के हीरो नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार बनकर उभरे हैं. विधानसभा चुनाव में 107-108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने वाले विजय ने साफ कर दिया है कि वे किसी बैसाखी के सहारे सरकार चलाने वाले कमजोर नेता नहीं हैं. 1 जुलाई की बैठक बुलाकर विजय का सीधा एजेंडा अपनी सत्ता को स्थायित्व देना और विपक्षी DMK प्रमुख एम.के. स्टालिन की फैलाई जा रही 'मध्यावधि चुनाव' की अफवाहों को पूरी तरह ध्वस्त करना है.
विजय खुद को सोशल जस्टिस और सेक्युलर पॉलिटिक्स के नए चेहरे के रूप में स्थापित कर रहे हैं. इस बैठक के जरिए वे अपने समर्थन में खड़ी बिखरी हुई ताकतों को एक औपचारिक गठबंधन का रूप देकर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए 'कैप्टन' की भूमिका में फ्रंट से लीड करने को तैयार हैं.
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