कौन थीं डॉ. पायल तडवी? जिनकी मौत ने हिलाया सिस्टम और बदलवा दिए यूनिवर्सिटी के नियम

यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए आए UGC के नए नियमों पर विवाद छिड़ गया है. सामान्य वर्ग इसे अपने खिलाफ मान रहा है, जबकि यह नियम रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी जैसे मामलों के बाद बने हैं.

dr payal tadvi
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रूपक प्रियदर्शी

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Dr Payal Tadvi case: यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों ने देश की राजनीति और शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है. छात्रों के हित में बनाए गए ये नियम अब जातिगत बहस का केंद्र बन चुके हैं. एक तरफ अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्र हैं, तो दूसरी ओर सामान्य वर्ग के छात्र विरोध में उतर आए हैं.

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UGC ने ये नियम केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के निर्देश पर तैयार किए हैं. सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत उत्पीड़न को रोकना है. दलित और पिछड़े वर्ग के संगठनों ने इसे सुरक्षा कवच बताया है, जबकि सवर्ण संगठनों का आरोप है कि यह नियम उनके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद

विरोध और प्रदर्शन के बीच मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अदालत में UGC के नियमों की धारा 3(c) को चुनौती देने वाली याचिका दाखिल हुई है.

याचिका में कहा गया है कि भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC छात्रों तक सीमित रखी गई है, जिससे जनरल कैटेगरी के छात्र इस सुरक्षा दायरे से बाहर हो जाते हैं.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत को मौजूदा हालात की पूरी जानकारी है और वह इस तरह के "दुर्भाग्यपूर्ण मामलों'' से निपटने के लिए एक मजबूत और स्थायी व्यवस्था बनाने पर विचार कर रहे हैं. अदालत ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है.

क्यों चर्चा में हैं पायल तडवी और रोहित वेमुला?

इस विवाद के साथ दो नाम फिर सामने आए हैं- रोहित वेमुला और डॉ. पायल तडवी. दोनों की मौत को देश में जातिगत भेदभाव के सबसे दर्दनाक उदाहरणों में गिना जाता है.

रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी के छात्र थे. साल 2016 में उन्होंने आत्महत्या कर ली थी. मामला राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा और संसद से लेकर सड़कों तक विरोध हुआ.

वहीं, पायल तडवी मुंबई के BYL नायर अस्पताल में पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टर थीं. मई 2019 में उन्होंने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर जान दे दी.

कौन थीं डॉ. पायल तडवी?

पायल तडवी महाराष्ट्र के जलगांव जिले की रहने वाली थीं. उनकी उम्र 26 साल थी. वह तडवी भील समुदाय से आती थीं, जो अनुसूचित जनजाति में शामिल है.

पायल अपने परिवार की पहली डॉक्टर थीं और अपने समुदाय की पहली महिला, जो MD कर रही थीं. वह स्त्री रोग विशेषज्ञ बनना चाहती थीं और इसी सपने के साथ मुंबई आई थीं.

परिवार और पुलिस चार्जशीट के मुताबिक, पायल को तीन सीनियर डॉक्टरों ने उसकी जाति को लेकर लगातार अपमानित किया. उस पर रिजर्वेशन से दाखिला लेने के ताने मारे गए. कथित तौर पर उसे ऑपरेशन थिएटर और डिलीवरी जैसे जरूरी कामों से भी दूर रखा गया.

शिकायत करने और यूनिट बदलने की मांग के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. आखिरकार पायल ने आत्महत्या कर ली.

आरोपियों पर क्या कार्रवाई हुई?

इस मामले में डॉ. हेमा आहूजा, डॉ. भक्ति मेहर और डॉ. अंकिता खंडेलवाल को गिरफ्तार किया गया. उन पर SC/ST एक्ट, एंटी-रैगिंग कानून और आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा 306 के तहत केस दर्ज हुआ.

बाद में उन्हें जमानत मिल गई और पढ़ाई जारी रखने की अनुमति भी दी गई, लेकिन नायर अस्पताल में प्रवेश पर रोक लगा दी गई. मामले की आपराधिक सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है.

मांओं की लड़ाई से बदले नियम

पायल तडवी की मां आबेदा सलीम तडवी और रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला ने मिलकर कानूनी लड़ाई शुरू की.

2019 में दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की. मांग की गई कि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए 2012 के पुराने और कमजोर नियमों की जगह सख्त कानून बनाया जाए.

इसी याचिका के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए नए नियम तैयार किए गए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर UGC ने 13 जनवरी 2026 को ''प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026'' को अधिसूचित किया.

नए नियमों में क्या है?

- नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य होगा.

- इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर स्थापित किए जाएंगे.

- भेदभाव की शिकायत मिलने पर संस्थान के प्रमुख, यानी कुलपति या प्रिंसिपल, को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

विरोध क्यों हो रहा है?

- सवर्ण संगठनों का कहना है कि धारा 3(c) में केवल SC, ST और OBC को पीड़ित माना गया है. जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए कोई समान सुरक्षा नहीं है.

- झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ सजा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है.

- कमेटियों में केवल आरक्षित वर्गों को शामिल करना ''रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन'' को बढ़ावा देगा.

- इसी वजह से देश के कई विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन हो रहे हैं.

अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि नियमों में बदलाव होगा या मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी.

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