Shesh Bharat: केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की सत्ता में वापसी के बाद मुख्यमंत्री की रेस पर लगा सस्पेंस अब खत्म हो चुका है. कांग्रेस नेतृत्व ने तमाम अटकलों को दरकिनार करते हुए वी.डी. सतीशन को राज्य का नया मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है. वह सोमवार को पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे. इस फैसले की सबसे खास बात यह है कि आलाकमान ने सतीशन पर पूरा भरोसा जताते हुए ढाई-ढाई साल के रोटेशन जैसी कोई शर्त नहीं जोड़ी है. वहीं, केरल के इस बड़े सियासी फैसले की सबसे तेज गूंज पड़ोसी राज्य कर्नाटक में सुनाई देने लगी है, जहां मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चल रही जंग अब और तेज हो गई है.
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केसी वेणुगोपाल की जगह जमीनी संघर्ष को तरजीह
दिल्ली में एआईसीसी (AICC) मुख्यालय से जब जयराम रमेश, अजय माकन और दीपा दासमुंशी ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में सतीशन के नाम का एलान किया, तो कई सियासी पंडित हैरान रह गए. दरअसल, केरल में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में राहुल गांधी के बेहद करीबी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल का नाम सबसे आगे माना जा रहा था. चर्चा थी कि टिकट बंटवारे में दबदबा होने के कारण अधिकांश विधायकों का समर्थन भी वेणुगोपाल के साथ था.
इसके बावजूद, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने जमीनी कार्यकर्ताओं के रुख, सोशल मीडिया कैंपेन और जनता के परसेप्शन को ध्यान में रखते हुए बड़ा रिस्क लेने से परहेज किया. आलाकमान ने पांच साल तक सदन से लेकर सड़क तक विपक्ष के नेता के रूप में संघर्ष करने वाले वीडी सतीशन के नाम पर मुहर लगा दी. इसके साथ ही सहयोगी दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने भी साफ संकेत दे दिया था कि कमान सतीशन को ही मिलनी चाहिए.
कर्नाटक में डीके शिवकुमार खेमे को मिली 'संजीवनी'
केरल के इस फैसले ने कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच जारी शीतयुद्ध को एक नया और बेहद दिलचस्प मोड़ दे दिया है. सतीशन के नाम की घोषणा होते ही बेंगलुरु में डीके शिवकुमार के खेमे में उत्साह का माहौल है. 15 मई को डीके शिवकुमार के जन्मदिन पर उनके समर्थकों ने शहर में उन्हें 'भावी मुख्यमंत्री' बताते हुए बड़े-बड़े कटआउट लगा दिए.
बेंगलुरु के राजनीतिक गलियारों में अब इस थ्योरी को हवा दी जा रही है कि कांग्रेस में अब "वही राजा बनेगा जो जमीन पर लड़ाई लड़ेगा." शिवकुमार के समर्थकों का तर्क है कि जिस तरह सतीशन ने केरल में पांच साल मेहनत की, ठीक उसी तरह डीके शिवकुमार ने भी संकट के समय कर्नाटक कांग्रेस को शून्य से शिखर तक पहुंचाया है. ऐसे में रोटेशन फॉर्मूले के तहत अब मुख्यमंत्री की कमान शिवकुमार को तुरंत सौंप देनी चाहिए.
क्या सिर्फ विधायकों का संख्या बल काफी नहीं?
कर्नाटक की सियासत में अब तक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का पलड़ा इसलिए भारी माना जाता रहा है क्योंकि उनके पास डीके शिवकुमार की तुलना में विधायकों का संख्या बल अधिक है. लेकिन केरल मॉडल ने यह साबित कर दिया है कि यदि जनता का परसेप्शन और कार्यकर्ताओं का दबाव मजबूत हो, तो सिर्फ विधायकों की संख्या कुर्सी बचाने के लिए काफी नहीं होती.
हालांकि, दक्षिण भारत के राजनीतिक विश्लेषकों और अखबारों के संपादकीय में यह चेतावनी भी दी जा रही है कि केरल के 'सतीशन फॉर्मूला' को कर्नाटक में हूबहू लागू करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है. सिद्धारमैया कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे बड़े जननेता हैं और 'अहिंदा' (OBC, दलित, अल्पसंख्यक) वोटबैंक पर उनकी मजबूत पकड़ है. ऐसे में सिद्धारमैया को हटाकर शिवकुमार को कमान सौंपने से पहले आलाकमान को नफा-नुकसान का आकलन बेहद सावधानी से करना होगा.
चुनावी अखाड़े के अघोषित कप्तान थे सतीशन
वी.डी. सतीशन ने केरल चुनाव में यूडीएफ गठबंधन को 100 से अधिक सीटें दिलाकर सत्ता में वापस लाने में मुख्य रणनीतिकार की भूमिका निभाई. साल 2021 में मिली हार के बाद जब उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था, तब उन्होंने पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं पर आक्रामक अभियान चलाया था.
भले ही चुनाव में कांग्रेस ने सीएम चेहरा घोषित नहीं किया था, लेकिन पूरा चुनाव सतीशन के चेहरे के इर्द-गिर्द लड़ा गया. उन्होंने चुनाव के दौरान सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि अगर पार्टी नहीं जीती, तो वह राजनीतिक संन्यास ले लेंगे. जनता ने उनकी इस निष्ठा और पारंपरिक सीट परावुर से लगातार छठी बार मिली बड़ी जीत को उनके कड़े संघर्ष का इनाम माना है. अब देखना यह है कि क्या दिल्ली आलाकमान कर्नाटक में भी कोई बड़ा सियासी बदलाव करने का साहस दिखाता है या सिद्धारमैया इस नए चक्रव्यूह को भेदने में सफल रहते हैं.
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