बगावत, बंगाल और अदालत! सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दंगल में एक ऐसी 'डेडलाइन' खींच दी है, जिसने कोलकाता से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि बंगाल विधानसभा के स्पीकर रथिन बोस के पास ममता बनर्जी गुट से बगावत करने वाले 10 विधायकों की किस्मत का फैसला करने के लिए सिर्फ 10 अक्टूबर तक का वक्त है. लेकिन असली रोमांच इस तारीख में नहीं, बल्कि संविधान के उस पर्दे के पीछे है जहां देश की न्यायपालिका यानी कोर्ट और विधायिका यानी स्पीकर के बीच शक्तियों की एक अदृश्य जंग चल रही है. आखिर क्यों देश की सर्वोच्च अदालत इस पूरे विवाद की कमान खुद अपने हाथ में लेने से बच रही है? क्या है स्पीकर की कुर्सी की वो 'सुपरपावर' जिसके आगे सुप्रीम कोर्ट भी सीधे दखल देने से हिचकिचाता है? और क्यों विधायकों की बगावत की ये कहानी, टीएमसी के ही बागी सांसदों के मामले से बिल्कुल जुदा है?
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पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद शुरू हुआ था विवाद!
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के चुनाव हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ी बगावत हुई. पार्टी के 10 विधायकों ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से बगावत कर दी और विपक्षी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी के पाले में चले गए. इसके विरोध में ममता बनर्जी गुट के विधायक सोहनदेव चट्टोपाध्याय ने 8 जुलाई को विधानसभा स्पीकर रथिन बोस के सामने इन 10 बागियों को अयोग्य घोषित करने की याचिका दायर की. जब स्पीकर के स्तर पर इस पर तुरंत फैसला नहीं हुआ, तो सोहनदेव चट्टोपाध्याय सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ कर दिया है कि 2020 के फैसले के मुताबिक 3 महीने की समय सीमा 10 अक्टूबर को खत्म हो रही है और उम्मीद है कि स्पीकर तब तक अपना फैसला दे देंगे.
कैसे अलग है विधायकों और सांसदों का मामला?
अब ऐसे में सवाल बनता है कि टीएमसी के बागी सांसदों (MPs) पर भी तो सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है, तो फिर ये विधायकों वाला मामला उससे अलग कैसे है? इसके दो बड़े कानूनी और प्रशासनिक कारण हैं. बागी विधायकों के मामले में फैसला लेने का अधिकार राज्य विधानसभा के स्पीकर रथिन बोस के पास है. जबकि बागी सांसदों जैसे अभिषेक बनर्जी की याचिका पर 20 सांसदों का मामला का अधिकार क्षेत्र लोकसभा स्पीकर के पास आता है. दोनों के नियम और सदन की प्रक्रियाएं अलग-अलग संचालित होती हैं.
विधायकों के मामले में याचिका 8 जुलाई को ही दाखिल हो चुकी थी और इसकी 3 महीने की तय डेडलाइन 10 अक्टूबर बिल्कुल सिर पर आ चुकी है. बागी सांसदों के मामले में लोकसभा अध्यक्ष के सामने प्रक्रिया अभी अलग चरण में है, जहां कोर्ट ने केवल त्वरित फैसले की 'अपेक्षा' जताई है, लेकिन विधायकों की तरह कोई सटीक अंतिम तारीख नहीं दी है.
सांसदों के मामले में 8 अक्टूबर तक जवाब देने की मोहलत
तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से 20 बागी टीएमसी सांसदों की अयोग्यता याचिका पर फैसला लेने में हो रही देरी को 'रेड फ्लैग' यानी खतरे की घंटी बता चुके हैं. कोर्ट ने साफ किया है कि वो किसी स्पीकर को सीधा आदेश या समयसीमा तो नहीं दे सकते, लेकिन वे ओम बिरला से इस गंभीर मामले में 'त्वरित'(Expeditious) और जल्द से जल्द निर्णय लेने की उम्मीद करते हैं. सुप्रीम कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी और नसीहत के बाद ही लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय एक्शन में आया और नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हुए उन सभी 20 बागी सांसदों को कड़ा रुख अपनाते हुए अपना जवाब दाखिल करने के लिए 8 अक्टूबर तक की आखिरी मोहलत जारी की है.
बागियों के पास बहुमत और ममता गुट की रणनीति
बंगाल विधानसभा के भीतर टीएमसी के बागी धड़े ने बेहद आक्रामक रणनीतिक खेल खेला है. साल 2026 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के बाद भड़की इस बगावत में बागी गुट के 58 विधायकों ने एकजुट होकर विधानसभा स्पीकर रथिन बोस को एक संयुक्त पत्र सौंपा और ममता बनर्जी गुट की पसंद को दरकिनार करते हुए हाल ही में निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुन लिया.
दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) विधायक एक साथ अलग होते हैं, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता और उनकी सदस्यता बच जाती है. चूंकि टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 बागी खेमे के साथ आ चुके हैं, इसलिए वे तकनीकी तौर पर दो-तिहाई के जादुई आंकड़े को आसानी से पार कर चुके हैं. खुद को 'असली टीएमसी' बताते हुए उन्होंने पार्टी संविधान का हवाला देकर एक समानांतर राष्ट्रीय कार्यसमिति भी बना ली है, जो उन्हें कानूनी रूप से एक मजबूत आधार देती है.
बागियों के इस अभेद्य किले में सेंध लगाने के लिए ममता बनर्जी गुट के सोहनदेव चट्टोपाध्याय ने पूरी पार्टी के बजाय सिर्फ 10 बागी विधायकों को निशाना बनाते हुए अयोग्यता की याचिका दायर की है. ममता गुट का आरोप है कि इन विधायकों ने 27 जून को एक कथित 'विशेष सत्र' बुलाकर और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होकर खुद स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ी है. ममता गुट की रणनीति यह है कि यदि स्पीकर इन 10 प्रमुख विधायकों को अयोग्य घोषित कर देते हैं, तो बागी गुट का दो-तिहाई का गणित पूरी तरह बिगड़ जाएगा जिसके दम पर वे कूद रहे हैं.
रथिन बोस पर नहीं है ममता को भरोसा!
रथिन बोस पश्चिम बंगाल की कूचबिहार दक्षिण सीट से बीजेपी के विधायक हैं, जिन्हें चुनाव के बाद स्पीकर चुना गया. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट को रथिन बोस से इंसाफ की उम्मीद न होने का सबसे बड़ा कारण उनका धुर-विरोधी राजनीतिक बैकग्राउंड और बागी गुट के प्रति उनका झुकाव है. बगावत भड़कते ही स्पीकर रथिन बोस ने ममता बनर्जी की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी थी. ममता गुट का आरोप है कि विधानसभा अध्यक्ष पद की निष्पक्षता को ताक पर रखकर बागी खेमे को शह दी जा रही है. चूंकि दलबदल कानून के तहत पहला फैसला लेने की चाबी एक स्पीकर रथिन बोस के हाथों में ही है, इसलिए ममता बनर्जी को डर है कि निष्पक्ष निर्णय के बजाय इस पूरे मामले को लटकाने या बागियों को बचाने की राजनीतिक बिसात खेली जा सकती है.
मामले में कोर्ट क्यों नहीं दे रहा दखल?
लोकतंत्र में तीन स्तंभ होते हैं, विधायिका यानी संसद-विधानसभाएं, कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका यानी कोर्ट. संविधान में शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा है, सबके अपने-अपने दायरे हैं. जब बात विधानसभा या संसद के भीतर की होती है, तो वहां का राजा 'स्पीकर' होता है. संविधान की 10वीं अनुसूची दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी भी विधायक या सांसद को अयोग्य (Disqualify) घोषित करने का पहला और अंतिम अधिकार सिर्फ और सिर्फ स्पीकर के पास है. सुप्रीम कोर्ट इस आंतरिक व्यवस्था में सीधे हस्तक्षेप करने से बचता है क्योंकि कोर्ट Separation of Powers के सिद्धांत का सम्मान करती है. वो किसी स्पीकर को ये आदेश नहीं दे सकती कि वो अपना फैसला कैसे और कब सुनाए, हालांकि वह एक उचित समयसीमा (Timeframe) जरूर तय कर सकती है. यही काम सुप्रीम कोर्ट कर रहा है.
स्पीकर के पाले में गेंद और सरकार के पक्ष में फैसला?
अगर पिछले 5 सालों के इतिहास को देखें, तो सुप्रीम कोर्ट ने कई हाई-प्रोफाइल राजनीतिक संकटों में सीधे फैसला न सुनाकर, गेंद स्पीकर के पाले में डाली है. 2020 के मणिपुर विधानसभा केस के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि दल-बदल के मामलों में स्पीकर को 3 महीने के भीतर फैसला ले लेना चाहिए. उद्धव ठाकरे वर्सेज एकनाथ शिंदे और शरद पवार वर्सेज अजित पवार विवाद में भी सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों की अयोग्यता का फैसला तत्कालीन महाराष्ट्र स्पीकर पर छोड़ दिया था. तेलंगाना के बीआरएस के बागियों का मामला भी स्पीकर गद्दाम प्रसाद कुमार को ही करना है.
चूंकि स्पीकर आम तौर पर सरकार की साइड के होते हैं इसलिए पिछले कुछ सालों में किसी बागी गुट की हार नहीं हुई. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के बागियों के मामले में स्पीकर ने फैसला उद्धव की पार्टी के खिलाफ दिया. अजित पवार के साथ बगावत करने वालों के पक्ष में ही स्पीकर का फैसला आया. तेलंगाना का मामला फिलहाल फंसा हुआ है. देखना होगा कि बंगाल में तृणमूल के बागियों पर स्पीकर क्या फैसला सुनाते हैं.
जब कोर्ट ने मामला स्पीकर पर छोड़ा, तो अक्सर देखा गया कि फैसले आने में महीनों की देरी हुई, क्योंकि कानून में स्पीकर के लिए कोई सख्त संवैधानिक समयसीमा नहीं थी. महाराष्ट्र के मामले में लंबी सुनवाई के बाद स्पीकर ने विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया, जिसके खिलाफ पार्टियां फिर से कोर्ट पहुंचीं. यानी कोर्ट के फैसले छोड़ने के बाद भी मामला घूम-फिरकर कानूनी लड़ाई में ही उलझा रहता है.
बंगाल की इस सियासी शतरंज में 10 अक्टूबर की तारीख बेहद ऐतिहासिक होने वाली है. अब देखना होगा कि विधानसभा के 'किंग' यानी स्पीकर अदालत की इस 'उम्मीद' पर क्या फैसला लेते हैं. क्या बागी विधायकों की कुर्सी बचेगी या वो दलबदल के जाल में फंस जाएंगे?
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