देश की राजनीति 15-20 सालों में कुछ ऐसे बदली कि आज संसद में लेफ्ट के सांसदों की संख्या अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ खड़ी हुई है. लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में सीपीआई(एम) के मुट्ठी भर सिर्फ 7 सांसद बचे हैं, लेकिन संख्या की इस बड़ी कमी को जॉन ब्रिटास अपनी अकेले की बुलंदी से पाट रहे हैं. जब जॉन ब्रिटास माइक संभालते हैं, तो उनकी कड़क आवाज़, तीखे सवाल और बेबाक तेवर सरकार पर भारी पड़ते हैं.
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राज्यसभा में 'लुंगीवाला' टिप्पणी पर बढ़ा विवाद
राज्यसभा में इनकम टैक्स (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के दौरान बड़ा विवाद होते-होते बचा. जॉन ब्रिटास जब संसद में भाषण दे रहे थे, तब बीजेपी सांसद सुष्मिता देव ने अपनी सीट से उठकर उनके ठीक पीछे आकर उन्हें बार-बार 'लुंगीवाला' कहकर टोका. 'लुंगीवाला' कहना सिर्फ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीयों की संस्कृति और पहनावे का अपमान माना गया.
सदन में घिरी बीजेपी, किरेन रिजिजू को संभालना पड़ा मोर्चा
जब 'लुंगी विवाद' को लेकर सदन में उत्तर बनाम दक्षिण की राजनीति गरमाने लगी और विपक्ष ने बीजेपी को 'गैर-हिंदी भाषी विरोधी' बताना शुरू किया, तब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू को स्थिति संभालने के लिए बीच-बचाव में आना पड़ा. किरेन रिजिजू ने सदन में संतुलन बनाते हुए कहा, "इस सदन में हर सदस्य बराबर है. हम सब बराबर भारतीय हैं." रिजिजू का यह कदम बीजेपी को क्षेत्रीय भेदभाव के आरोपों से बचाने और सदन की मर्यादा बहाल करने की एक रणनीतिक कोशिश थी. इस हरकत से आग बबूला होकर 12 अगस्त को जॉन ब्रिटास ने सुष्मिता देव के खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन (Privilege Notice) का प्रस्ताव पेश किया. ब्रिटास ने कहा, "मैं एक गौरवान्वित भारतीय हूं, एक साउथ इंडियन हूं और एक गौरवान्वित मलयाली हूं."
पत्रकारिता से राजनीति तक का शानदार सफर
जॉन ब्रिटास पेशे से पत्रकार रहे हैं. वह बगदाद जाकर खाड़ी युद्ध की विभीषिका को कवर कर चुके हैं. पत्रकारिता के ऊंचे मुकाम को छोड़कर वामपंथ के लाल झंडे तले राजनीति में आए जॉन ब्रिटास आज देश की राजनीति के केंद्र में हैं. ब्रिटास ने दिल्ली में पत्रकार के रूप में काम किया. उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस, गुजरात दंगे और इराक में तख्तापलट के दौरान सद्दाम हुसैन के पतन को ग्राउंड जीरो से कवर किया. बाद में वह केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के मीडिया सलाहकार बने और लेफ्ट के चैनल 'कैरली टीवी' (Kairali TV) के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एडिटर रहे. 2021 में सीपीआई (एम) ने उन्हें राज्यसभा भेजा और आज वह पार्टी के उप-नेता हैं.
दिल्ली पुलिस को सिखाया था कानून का पाठ
जुलाई में दिल्ली पुलिस बिना वर्दी और बिना किसी लिखित वारंट के सीपीआई(एम) के मुख्यालय AKG भवन में घुस गई, ताकि छात्र संगठन SFI की नेता और पूर्व जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष आयशी घोष को गिरफ्तार किया जा सके. जैसे ही जॉन ब्रिटास को इसकी भनक लगी, वे सीधे संसद से दौड़ते हुए पार्टी दफ्तर पहुंचे. ब्रिटास ने अकेले ही दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों को कैमरे के सामने आड़े हाथों लिया. उन्होंने पुलिस से तीखे लहजे में पूछा, "एक राष्ट्रीय पार्टी के दफ्तर में इस तरह घुसने की हिम्मत आपको किसने दी? आपकी वर्दी कहां है, आपका बैज कहां है?" ब्रिटास ने वहीं खड़े-खड़े 1997 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (डी.के. बासु गाइडलाइंस) का हवाला दे दिया, जिसमें बिना वर्दी और बिना अरेस्ट मेमो के गिरफ्तारी अवैध मानी जाती है. ब्रिटास के इस आक्रामक कानूनी रुख के आगे दिल्ली पुलिस को बैकफुट पर आना पड़ा और वे बिना आयशी घोष को गिरफ्तार किए वहां से लौट गए.
क्या है ब्रिटास की कहानी!
जॉन ब्रिटास का जन्म 15 मई 1966 को केरल के कन्नूर जिले के नादुविल में एक सीरियन क्रिश्चियन परिवार में हुआ. उनके पिता ए. पी. पायली और मां अन्नम्मा थीं. कन्नूर में लेफ्ट की बुनियाद मजबूत रही, उसी आबोहवा में ब्रिटास पले-बढ़े. उन्होंने शुरुआती पढ़ाई त्रिशूर के डॉन बॉस्को स्कूल से की और आगे पढ़ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) पहुंचे, जहां से उन्होंने पहले M.Phil. और बाद में प्रिंट मीडिया पर अपनी Ph.D. पूरी की. जॉन ब्रिटास का झुकाव कॉलेज के दिनों से ही लेफ्ट की ओर था, जब वे SFI (Students' Federation of India) के सक्रिय सदस्य और यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के पदाधिकारी बने. हालांकि, कॉलेज के बाद उन्होंने पत्रकारिता को अपना करियर चुना.
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