कौन हैं केवल सिंह ढिल्लों? जो भारत में लाए थे PepsiCo, अब बीजेपी ने सौंपी पंजाब की कमान

पंजाब के मशहूर उद्योगपति केवल सिंह ढिल्लों को सुनील जाखड़ की जगह पंजाब बीजेपी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. भारत में 'पेप्सिको' लाने वाले ढिल्लों लगातार चार चुनावी हार के बावजूद अपने मजबूत आर्थिक रसूख और जट सिख चेहरे के कारण सूबे में बीजेपी के सबसे बड़े सिपहसालार बनकर उभरे हैं.

केवल सिंह ढ़िल्लो
केवल सिंह ढ़िल्लो

रूपक प्रियदर्शी

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राजनीति की बिसात पर मोहरे कब अपनी चाल बदल दें और कब राजा, वजीर बन जाए... ये कहना बेहद मुश्किल होता है. देश में चर्चा हो रही पंजाब की राजनीति के उस नए सिख चेहरे की, जिसने कभी बरनाला की सड़कों से अपनी लाइफ जर्नी की शुरुआत की थी, जो पेप्सिको कंपनी को भारत लाकर अरबपति कारोबारी बने. 

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पंजाब में विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है. ये ऐसा एक राज्य है जो उत्तर भारत में होने, बीजेपी की जबर्दस्त लहर के बाद भी कभी बीजेपी के काबू में नहीं आया. 2027 के पंजाब चुनाव के लिए बीजेपी ने पंजाब का नया कप्तान चुना है केवल सिंह ढिल्लों को! एक ऐसा चेहरा जो बेसिकली पॉलिटिकल नहीं है लेकिन अब कमान मिली है पंजाब में बीजेपी के उद्धार की. 2027 के महामुकाबले में बीजेपी के सबसे बड़े सिपहसालार केवल सिंह ढिल्लों की देश में बड़ी चर्चा हो रही है इसीलिए बने हैं चर्चित चेहरा. 

बरनाला में हुई पढ़ाई-लिखाई 

बरनाला के तल्लेवाल गांव में जट्ट सिख परिवार में जन्म हुआ. परवरिश और पढ़ाई-लिखाई भी बरनाला में ही हुई. परिवार समृद्ध ज़मींदार परिवार माना जाता था. केवल सिंह ढिल्लों ने बरनाला के एसडी कॉलेज से 1969-70 में ग्रेजुएशन की पढ़ाई तो शुरू की लेकिन डिग्री पूरी नहीं की. कॉलेज छोड़ने के बाद पारिवारिक खेती भी नहीं की. उन्हें तो कुछ और करना था जो अपना बिजनेस शुरू करके हो सकता था. 

ढिल्लों परिवार डेयरिंग टाइप लीक से हटकर सोचने वाला रहा. खूब इंटरनेशनल एक्सपोजर था परिवार का. विदेश जाकर संभावनाएं तलाशने का जज्बा पीढ़ियों से था.केवल सिंह ढिल्लों के दादा पंजाब के उन चुनिंदा लोगों में से थे, जो 1903 में हवाई जहाज से अमेरिका गए थे. 

व्यापार के लिए एक बड़ा हब बन रहा था. 

1960 और 1970 के दशक में अफ्रीका के कई देश जैसे लाइबेरिया, घाना, नाइजीरिया तेजी से विकसित हो रहे थे. वहां इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रेडिंग और सप्लाई चेन में बाहरी निवेशकों के लिए बड़े मौके थे. लाइबेरिया व्यापार के लिए एक बड़ा हब बन रहा था. ढिल्लों परिवार ने समझ लिया कि कहां जाकर इन्वेस्ट करना है. बरनाला के तल्लेवाल गांव से निकल कर परिवार लाइबेरिया चला गया था. 

केवल सिंह ढिल्लों के पिता सज्जन सिंह ढिल्लों ने बड़ा व्यापारिक साम्राज्य ढिल्लों ट्रेडिंग हाउस खड़ा किया. लाइबेरिया में रहते हुए केवल सिंह ढिल्लों ने अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के काम करने के तरीके, कोल्ड ड्रिंक्स मार्केट की ताकत और मल्टीनेशनल कंपनियों (MNCs) के बड़े सप्लाई चेन नेटवर्क को बहुत करीब से देखा. यहीं से उनके भीतर एक 'ग्लोबल बिजनेस विजन' पैदा हुआ. लेकिन भारत वापसी कुछ और कारणों से हुई. 1980 के दशक के अंत में लाइबेरिया में भीषण गृहयुद्ध छिड़ गया था, जिससे वहां रहकर बिजनेस करना मुश्किल हो गया तो केवल सिंह चंडीगढ़ लौट आए. ढिल्लों परिवार कमाया हुआ पैसा और ग्लोबल बिजनेस अनुभव लेकर वापस पंजाब आया उसी पैसे और अनुभव के दम पर न सिरे से साम्राज्य खड़ा करना था जिसकी लीड ली केवल सिंह ढिल्लों ने. 

1977 में जनता पार्टी की सरकार के दौरान विदेशी कंपनियों पर सख्त पाबंदियां लगाई गईं, जिसके चलते कोका-कोला को भारत छोड़ना पड़ा था. भारत का कोल्ड ड्रिंक बाजार एकदम ठंडा पड़ा था. पार्ले के 'थम्स अप' या 'कैंपा कोला' जैसे इंडियन ब्रैंड मार्केट संभालने की कोशिश कर रहे थे.  केवल सिंह ढिल्लों ने भांप लिया था कि भारत में इंटरनेशनल प्रीमियम ब्रैंड की कमी है. उसी गैप को भरने के लिए उनके दिमाग में पेप्सिको को भारत लाने का आइडिया आया. उसी आइडिया ने केवल सिंह ढिल्लों की जिंदगी बदल दी. 

आतंकवाद के काले दौर से गुजर रहा था पंजाब

1980 के दशक में जब पंजाब आतंकवाद के काले दौर से गुजर रहा था. पूरा राज्य अशांति की चपेट में था. कोई बड़ी कंपनी पंजाब में निवेश करने को तैयार नहीं थी. केंद्र और पंजाब सरकार हालात सुधारने के लिए बड़ी फैक्ट्रियां और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाना चाहती थीं ताकि युवाओं को रोजगार मिल सके. केवल सिंह ढिल्लों ने पंजाब की इस जरूरत को एक बड़े बिजनेस मौके में बदल दिया. उन्होंने पेप्सिको को कन्वींस कर लिया कि भारत बड़ा मार्केट है. ढिल्लों पेप्सिको को भारत लाए. खुद पेप्सिको के पहले और सबसे बड़े फ्रेंचाइजी पार्टनर बने. तब उन्होंने 'ढिल्लों कूल ड्रिंक्स' के नाम से देश की पहली और सबसे बड़ी पेप्सिको (PepsiCo) फ्रेंचाइजी बॉटलिंग यूनिट लगाई थी.

उन्होंने पेप्सिको के बॉटलिंग की जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने पेप्सिको के सामने कंडीशन रखी कि वो सिर्फ कोल्ड ड्रिंक नहीं बेचेंगे, बल्कि पंजाब के किसानों से टमाटर और आलू खरीदकर फूड प्रोसेसिंग और एग्रो-डेवलपमेंट पर काम करेंगे. इससे पेप्सिको को बैठे-बिठाए लेज चिप्स और किसान सॉस बिजनेस को भी पंख लग गए. केवल सिंह ढिल्लों ने पेप्सिको के साथ अपना बड़ा बिजनेस एम्पायर खड़ा किया, जिसने उन्हें पंजाब के कॉरपोरेट जगत का एक बड़ा चेहरा बना दिया. 

बिजनेस जम चुका था. पैसा आ रहे थे. फिर भी कुछ करना था. केवल सिंह ढिल्लों की राजनीति में एंट्री उनके व्यापारिक रसूख, मालवा रीजन में मजबूत पकड़ और कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ करीबी दोस्ती के कारण हुई थी. पेप्सिको के साथ खुद को मजबूती से स्टैबलिश करने के बाद उन्होंने 2000 के आसपास राजनीति का रुख किया. राजनीति का रास्ता बिजनेस के कॉरपोरेट माहौल से उलट कटीले रास्तों से भरा था. 

केवल सिंह ढिल्लों की शादी ने उनके जीवन में पारिवारिक रसूख, सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक ऊंचाइयों को छूने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई. राजनीति में अक्सर 'पारिवारिक बैकग्राउंड' मायने रखता है, और उनकी शादी ने उन्हें पंजाब के सबसे रसूखदार परिवारों की कतार में ला खड़ा किया. केवल सिंह ढिल्लों की शादी मंजीत कौर ढिल्लों से हुई. केवल सिंह ढिल्लों और मंजीत कौर की शादी की कहानी पंजाब के एक पारंपरिक लेकिन बेहद रसूखदार 'अरेंज्ड कम रॉयल अलायंस' (Arranged cum Royal Marriage) का बेहतरीन उदाहरण है. यह शादी उस दौर में हुई थी जब केवल सिंह ढिल्लों सिर्फ एक उभरते हुए बिजनेसमैन थे और राजनीति से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. 

राजनीतिक रहा है मंजीत कौर का इतिहास

मंजीत कौर का पारिवारिक इतिहास बेहद दमदार और राजनीतिक रहा. उनके दादा महाराजा भूपिंदर सिंह के शासनकाल के दौरान तत्कालीन पटियाला रियासत के प्रधानमंत्री हुआ करते थे. शादी ने केवल सिंह ढिल्लों को सीधे पंजाब कुलीन क्लास में सीधे एंट्री दिला दी.

केवल सिंह ढिल्लों अक्सर कहते रहे मंजीत कौर उनकी लाइफ में 'लेडी लक यानी  भाग्यशाली बनकर आईं. शादी से पटियाला राजघराने में सीधी एंट्री हुई. पंजाब की राजनीति के 'महाराजा' कहे जाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह भी पटियाला राजघराने से ताल्लुक रखते हैं. शादी के बाद केवल सिंह ढिल्लों की पहुंच सीधे कैप्टन अमरिंदर सिंह के परिवार तक हुई. राजनीति में आने से पहले ही ढिल्लों, कैप्टन के सबसे भरोसेमंद और 'राइट हैंड' बन गए थे, जिसने आगे चलकर उनके राजनीतिक करियर की नींव रखी. तब कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब कांग्रेस के बहुत बड़े नेता थे. उन्होंने अपने रसूख से केवल सिंह को राजनीति में ले लिया.

2007 में कांग्रेस का हाथ थामते ही केवल सिंह ढिल्लों पंजाब की राजनीति के स्टार बन गए. कांग्रेस ने  बरनाला विधानसभा सीट से मैदान में उतारा, जहां शिरोमणि अकाली दल को हराकर शानदार जीत दर्ज की. विधायक बनते ही उन्होंने सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह से संबंधों का फायदा उठाकर बरनाला को जिला बनवा दिया. उस एक मास्टरस्ट्रोक ने मालवा रीजन में लोकप्रियता को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया. जमीनी पकड़ के दम पर उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव में दोबारा बरनाला सीट  कांग्रेस के लिए जीती. 

लगातार दो जीत और विशाल बिजनेस एम्पायर के कारण ढिल्लों पार्टी के बड़े नेता के साथ फंड रेजर्स में शामिल हो गए. पंजाब कांग्रेस में उपाध्यक्ष का पद भी मिला. कैप्टन जब फ्रंट से सरकार चला रहे थे तब केवल सिंह ढिल्लो उनके राइट हैंड और क्राइसिस मैनेजर के रोल में हुआ करते थे. जब पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह का सिक्का चलता था, तब केवल सिंह ढिल्लों को कैप्टन का 'फाइनेंशियल और स्ट्रैटेजिक पिलर माना जाता था.

सबसे अमीर राजनेताओं और उद्योगपतियों में शुमार

केवल सिंह ढिल्लों पंजाब के सबसे अमीर राजनेताओं और उद्योगपतियों में से एक हैं. नवंबर 2024 में हुए बरनाला उपचुनाव के समय उन्होंने Affidavit में अपनी संपत्ति 212 करोड़ रूपये प्लस बताई थी. पंजाब में खेतों से लेकर दुबई और स्पेन में विला के मालिक हैं. उनका ढिल्लों ग्रुप अब सिर्फ बेवरेज तक सीमित नहीं है, बल्कि रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर, हॉस्पिटैलिटी, वाइन, लिकर डिस्टिलरी (Liquor Distillery), प्रीमियम शॉपिंग मॉल्स, मल्टीप्लेक्स जैसे हाई-प्रॉफिट सेक्टर्स में दिग्गज खिलाड़ी है. मजबूत कॉरपोरेट वेल्थ केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब की पावर पॉलिटिक्स में एक बेहद मजबूत और आत्म-निर्भर नेता बनाए हुए है.

2017 में कैप्टन ने बड़ा धमाका किया कांग्रेस के बुरे दौर में भी पंजाब में सरकार बनवाकर लेकिन वो चुनाव केवल सिंह के लिए घातक हुआ. चुनाव भी हारे और कांग्रेस की गुटबाजी से तंग भी रहने लगे. 2019 में कांग्रेस ने संगरूर में भगवंत मान के खिलाफ उतारा लेकिन हार गए. 2022 का चुनाव आते-आते कैप्टन और नवजोत सिंह सिद्दू के बीच इतना झगड़ा बढ़ा कि कैप्टन के हाथ से सीएम की कुर्सी और पार्टी निकल चुकी थी. केवल सिंह भी कांग्रेस में टिके नहीं रहे और बीजेपी में चले गए. 

उस दौर में आम आदमी पार्टी का उभार हो रहा था. फिर भी केवल सिंह ने बीजेपी ज्वाइन की. ये जानते हुए कि पंजाब में बीजेपी के लिए हालात अच्छे नहीं. अकाली दल से अलायंस टूटने के बाद पार्टी और बुरी हालत में चली गई. 2022 के संगरूर लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी के टिकट पर लड़े लेकिन जीत नहीं पाए. 2024 में बरनाला सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने फिर मौका दिया लेकिन वो तब भी नहीं जीत पाए. फिर बीजेपी ने उन्हें इग्नोर नहीं किया. पार्टी का उपाध्यक्ष बनाकर इशारा किया कि उनके लिए कुछ बड़ा सोचा गया है. उनके गुरु अमरिंदर भी बीजेपी में हैं लेकिन कहां हैं कहीं दिखते नहीं.

बीजेपी को फिर एक कांग्रेसी की जरूरत पड़ गई

कांग्रेस मजाक उड़ा रही है कि बीजेपी को फिर एक कांग्रेसी की जरूरत पड़ गई. सीएम भगवंत मान केवल सिंह को हारा हुआ नेता बोलकर मजाक उड़ाते हैं. ऐसा इसलिए कि उन्होंने अब तक 6 बड़े चुनाव लड़े हैं, जिनमें से उन्होंने 2 चुनावों में जीत दर्ज की है और 4 चुनावों में हारे. चुनावी राजनीति में केवल सिंह ढिल्लों का स्कोर कार्ड भले ही मिलाजुला रहा हो, लेकिन पंजाब की राजनीति में उनका कद हार-जीत के आंकड़ों से कहीं बड़ा है. कांग्रेस में रहते हुए उनकी राजनीति चमकती रही. 2017 के बाद आप की आंधी ने उनके करियर का लगातार डैमेज किया. राजनीति में हार के मायने हमेशा खत्म होना नहीं होता. 

लगातार 4 चुनावी हार झेलने के बाद भी उनके राजनीतिक रसूख और जमीनी पकड़ में कोई कमी नहीं आई. बीजेपी से लगातार दो चुनाव हारने के बावजूद, बीजेपी ने उनके रसूख और जट्ट सिख चेहरे पर भरोसा बनाए रखा. सुनील जाखड़ की जगह पंजाब बीजेपी का अध्यक्ष बनाया है. बीजेपी हाईकमान की नजर में केवल सिंह ढिल्लों शहरी हिंदू पार्टी का ठप्पा तोड़ने और किसान-सिख वोट बैंक को साधने का मास्टरस्ट्रोक हैं. 

 

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