Shesh Bharat: राजनीति की बिसात पर न कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई स्थायी दुश्मन. होते हैं तो सिर्फ स्थायी समीकरण. देश राजनीति के सबसे चतुर खिलाड़ियों में शुमार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर देश की राजनीति के सेंटर में आ गए हैं. चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार के विवाद पर जब एनडीए के ज्यादातर सहयोगी चुप्पी साधे बैठे हैं तब चंद्रबाबू नायडू ने आगे बढ़कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का खुला समर्थन कर दिया.
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राजनीति की हवा कब बदल जाए और कल तक जो नेता लोकतंत्र के खतरे की दुहाई दे रहा था, वो कब संस्थाओं का सबसे बड़ा रक्षक बन जाए, इसका सबसे ताजा और जीवंत उदाहरण हैं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू. एक तरफ जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग विपक्ष के तीखे हमलों के घेरे में हैं, वहीं एनडीए के बड़े समर्थक चंद्रबाबू नायडू ने खुलकर उनके हक में बल्लेबाजी की है. लेकिन राजनीति की याददाश्त बहुत तेज होती है. इंटरनेट पर नायडू का 2019 का वो बयान घूम रहा है, जहां वो पीएम मोदी पर संस्थाओं को बर्बाद करने का आरोप लगा रहे थे. आखिर 2019 में राहुल गांधी का हाथ थामने वाले नायडू, आज नरेंद्र मोदी के संकटमोचक कैसे बन गए? क्यों बीजेपी के हर विवादित मुद्दे पर आंख मूंदकर साथ खड़े हैं?
राजनीति में हर कदम के साथ पुराना इतिहास भी पीछे-पीछे आता है. जैसे ही नायडू ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को पुख्ता बताया, सोशल मीडिया पर विरोधी चंद्रबाबू नायडू के पीछे लग गए. सोशल मीडिया पर 2019 का पुराना ट्वीट वायरल किया जा रहा है इस दावे के साथ कि चंद्रबाबू नायडू ने ट्वीट डिलीट कर दिया था.
2019 के उस कथित ट्वीट में चंद्रबाबू नायडू ने पीएम मोदी और उनकी सरकार के लिए बड़ा कड़ा-कड़ा लिखा था-मोदी ने भारत की प्रतिष्ठित संस्थाओं को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया है और बीजेपी शासन में संस्थागत स्वायत्तता व लोकतंत्र पर हमला हुआ है.
बीजेपी शुरुआत से मुख्य चुनाव आयुक्त का पुरजोर बचाव कर रही है
ज्ञानेश कुमार और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) विवाद पर एनडीए के भीतर भी खलबली दिखी है. बीजेपी शुरुआत से मुख्य चुनाव आयुक्त का पुरजोर बचाव कर रही है लेकिन तीन प्रमुख सहयोगियों- चिराग पासवान (LJP), एचडी कुमारास्वामी (JDS) और उपेंद्र कुशवाहा (RLM) ने विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर चिंता जताते हुए आयोग से सार्वजनिक तौर पर स्थिति स्पष्ट करने और पारदर्शिता बरतने की मांग की थी. खुद चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी (TDP) के लोकसभा फ्लोर लीडर ने भी पहले बयान जारी कर कहा था कि चुनाव आयोग को उठ रहे सवालों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए ताकि जनता का भरोसा मजबूत हो सके.
जैसे ही शनिवार को चुनाव आयोग ने तीनों आयुक्तों की मौजूदगी में ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी कर मतभेदों को आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया, चंद्रबाबू नायडू ने तुरंत यू-टर्न लेते हुए इस बयान का स्वागत किया और कहा कि इससे संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता प्रमाणित होती है और सारे भ्रम दूर हो गए हैं, जिसके बाद एनडीए के बाकी सहयोगी दलों ने भी सुर बदलते हुए चुनाव आयोग के इस नोट का समर्थन कर दिया है.
2024 का लोकसभा चुनाव क्रांतिकारी साबित हुआ जिसमें बीजेपी को बहुमत नहीं मिला. फिर भी सरकार उसी की बनी. नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से एनडीए को बहुमत मिला. तब से चंद्रबाबू नायडू बीजेपी को हर काम, हर एजेंडे में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. अरसे से विरोधियों को कुछ ऐसा चाहिए जिससे चंद्रबाबू को घेरा जा सके. अब जाकर हाथ आया कथित तौर पर डिलीट किया हुआ 2019 का ट्वीट जिसकी पुष्टि नहीं की जा सकती है.
चंद्रबाबू नायडू का स्टैंड
चंद्रबाबू की राजनीति की असली हकीकत ये है कि जहां न सिद्धांत स्थायी होते हैं, न वादे. 2019 में जो संस्थाएं 'खतरे' में थीं, 2026 में सत्ता के समीकरण बदलते ही वे फिर से 'विश्वसनीय' हो गई हैं. चंद्रबाबू नायडू का यह स्टैंड दिखाता है कि वे भविष्य की राजनीति को सुरक्षित रखने के लिए अपने अतीत की फाइलों को बंद करने की कला बखूबी जानते हैं.
जनसेना पार्टी (JSP) के प्रमुख और आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण का स्टैंड पूरी तरह से एनडीए (NDA) गठबंधन और बीजेपी के रुख के अनुकूल है.एनडीए के एक बेहद वफादार और मजबूत सहयोगी के रूप में पवन कल्याण ने इस विवाद में विपक्षी दलों के स्टैंड को खारिज किया है और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का बचाव किया है. लेकिन दिक्कत बने हैं जगन रेड्डी जो बीजेपी के लिए कम सॉफ्ट नहीं रहते. आंध्र की राजनीति में चंद्रबाबू नाय़डू से उल्टा स्टैंड ले लिया है जगन रेड्डी ने.
वाई. एस. जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की खबरों के बाद सबसे पहले सोशल मीडिया पर मोर्चा खोला और इस पूरे सिस्टम में जनता का भरोसा बहाल करने के लिए आयोग से तुरंत लिखित स्पष्टीकरण और पारदर्शिता की मांग की. इसके बाद, YSRCP ने कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के साथ सुर मिलाते हुए सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने और मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने के आरोपों के कारण SIR प्रक्रिया को तुरंत निलंबित करने की मांग कर दी है. इतना ही नहीं, वाईएसआरसीपी ने इस पूरे विवाद को संस्था की स्वायत्तता पर हमला बताते हुए साल 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून में संशोधन की मांग की है, ताकि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को दोबारा शामिल कर इस संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके.
बात साल 2018-2019 की है, जब आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न मिलने से नाराज चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था. उस वक्त नायडू दिल्ली की राजनीति में विपक्ष को एकजुट करने वाले सबसे बड़े 'सूत्रधार' बनकर उभरे थे. कोलकाता में ममता बनर्जी की रैली में पहुंचे, लखनऊ में मायावती-अखिलेश से मिले और दिल्ली में कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ मंच साझा किया. वही एकमात्र थे जिन्होंने साहस किया मोदी सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने का. उस दौर में नायडू का केवल एक ही संकल्प था—केंद्र से बीजेपी और नरेंद्र मोदी की विदाई. हर मंच से कहते थे कि बीजेपी देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की स्वायत्तता को कुचल रही है.
गठबंधन को सिरे से नकार दिया
राष्ट्रीय स्तर पर मोदी विरोध का चेहरा बनने की नायडू को भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी. 2019 के आंध्र प्रदेश विधानसभा और लोकसभा चुनावों में नायडू की पार्टी टीडीपी (TDP) को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. जनता ने कांग्रेस के साथ उनके इस गठबंधन को सिरे से नकार दिया और वाईएस जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी (YSRCP) ने राज्य में प्रचंड बहुमत हासिल कर टीडीपी को हाशिए पर धकेल दिया. इस हार ने नायडू को यह अहसास करा दिया कि क्षेत्रीय राजनीति के धरातल पर कांग्रेस का हाथ थामना उनके लिए आत्मघाती साबित हुआ.
चंद्रबाबू ने अपनी राजनीति जमाई कांग्रेस में रहते हुए. फिर ससुर एनटीआर की पार्टी टीडीपी हासिल की जो कांग्रेस के विरोध की बुनियाद पर बनकर तीसरे मोर्चे की राजनीति में शामिल हुई. बीजेपी तब इतनी बड़ी नहीं हुई थी लेकिन चंद्रबाबू नायडू के टेकओवर करने के बाद बीजेपी लगातार विशाल होती गई. फिर चंद्रबाबू ने सुविधा के हिसाब से कांग्रेस-बीजेपी को जज करना शुरू किया. आज बीजेपी के साथ हैं तो बीते कल में बीजेपी के भी खिलाफ रहे. आज कांग्रेस के खिलाफ हैं तो गारंटी नहीं कि आगे कांग्रेस के साथ नहीं होंगे.
चंद्रबाबू नायडू और बीजेपी का रिश्ता बेहद पुराना और शह-मात के खेल जैसा रहा है. साल 1998 में नायडू ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को बाहर से समर्थन दिया था. इसके बाद 1999 में बकायदा एनडीए का हिस्सा बने. 2004 की हार के बाद उन्होंने बीजेपी से दूरी बनाई, लेकिन 2014 में मोदी लहर को भांपते हुए फिर एनडीए में शामिल हो गए. 2018 में अलग हुए और फिर 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले उन्होंने एक बार फिर अपनी राजनीतिक दिशा बदली. 2024 के चुनावों में टीडीपी ने बीजेपी और पवन कल्याण की जनसेना के साथ गठबंधन किया. नतीजे सामने आए तो केंद्र में बीजेपी बहुमत से चूक गई और नरेंद्र मोदी को सरकार बनाने के लिए बैसाखी के रूप में चंद्रबाबू नायडू की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ी.
जब भी केंद्र सरकार या उसकी संस्थाओं पर सवाल उठते हैं, तो नायडू सबसे पहले ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं. ज्ञानेश कुमार के समर्थन में उनका आगे आना इसी रणनीतिक मजबूरी का हिस्सा है. नायडू भली-भांति जानते हैं कि आंध्र प्रदेश की बदहाल आर्थिक स्थिति को सुधारने और अमरावती को विश्वस्तरीय राजधानी बनाने के लिए उन्हें केंद्र के भारी वित्तीय सहयोग और विशेष पैकेज की जरूरत है. जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ राज्य में अपने राजनीतिक प्रभाव को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें दिल्ली का वरदहस्त चाहिए. जानते हैं कि केंद्र की मोदी सरकार टीडीपी के 16 सांसदों के भरोसे टिकी है, और इस किंगमेकर की भूमिका को वे खोना नहीं चाहते. इसलिए, अतीत के कड़वे बयानों को भुलाकर, वे बीजेपी के हर संकट में उसके सबसे भरोसेमंद साथी के रूप में खुद को पेश कर रहे हैं.
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