Shesh Bharat: राहुल गांधी की ओबीसी राजनीति को रेवंत रेड्डी ने कैसे दी नई धार? यादवों के लिए चला बड़ा दांव

रूपक प्रियदर्शी

• 09:32 AM • 06 Nov 2026

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हैदराबाद के सदर सम्मेलन में तेजस्वी यादव, धर्मेंद्र यादव समेत कई बड़े यादव नेताओं को एक मंच पर बुलाया. सरकार ने इस आयोजन के लिए 5 करोड़ रुपये दिए. इसके जरिए रेवंत रेड्डी यादव वोट बैंक को साधने और कांग्रेस की ओबीसी राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.

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तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने दक्षिण भारत की राजनीति में उत्तर भारत के नेताओं को बुलाकर ऐसा महीन मास्टर स्ट्रोक चला है, जिसने जबरदस्त राजनीतिक सनसनी मचा दी है. राहुल गांधी की ओबीसी फोकस वाली राजनीति को मजबूत करने के लिए रेवंत रेड्डी ने यादव समाज के लिए सरकारी खजाने के दरवाजे खोल दिए. रेवंत रेड्डी का हैदराबाद में सजा मंच, जहां दूल्हे जैसी पोशाक में सजे रेवंत रेड्डी के साथ तेजस्वी यादव, धर्मेंद्र यादव जैसे टॉप यादव नेता पहुंचे. हैदराबाद में पटना और लखनऊ तक के दिग्गजों को बुलाकर रेवंत रेड्डी ने क्या चाल चली है?

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सदर सम्मेलन में जुटे देशभर के बड़े यादव नेता

हैदराबाद का पारंपरिक 'सदर सम्मेलन' यानी भैंसों का उत्सव इस बार सिर्फ संस्कृति का अखाड़ा नहीं, बल्कि देश की राजनीति का बड़ा केंद्र बन गया. मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इस मंच का इस्तेमाल उत्तर भारत के टॉप यादव नेताओं को एक साथ लाने के लिए किया. इस महाजुटान में बिहार से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के दिग्गज नेता तेजस्वी यादव और सांसद संजय यादव पहुंचे, तो उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी (SP) से सांसद धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव ने हुंकार भरी. पूर्व सांसद लाल सिंह जम्मू-कश्मीर से आए. पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व राज्यपाल और बीजेपी नेता बंडारू दत्तात्रेय भी इस भव्य कार्यक्रम के साक्षी बने.

इन नेताओं का हैदराबाद आना महज एक इत्तेफाक नहीं था, बल्कि यह देश के यादव समाज को एकजुट कर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों (INDIA ब्लॉक) के पक्ष में एक बड़ा राष्ट्रीय नैरेटिव सेट करने की सोची-समझी रणनीति थी.

तेलंगाना में यादव समाज क्यों है अहम?

तेलंगाना की राजनीति में वैसे तो रेड्डी और वेलामा समुदायों का दबदबा माना जाता रहा है, लेकिन यादव समाज यहां का वह छिपा हुआ किंगमेकर यानी वोट बैंक है, जिसके बिना हैदराबाद और आसपास के जिलों में सत्ता हासिल करना मुश्किल है. रेवंत रेड्डी अच्छी तरह जानते हैं कि तेलंगाना की राजनीति पर पकड़ बनाए रखने और 2028 का चुनाव जीतने के लिए यादव समाज का साथ और सहयोग नुकसान नहीं, बल्कि बहुत काम आने वाला है.

पिछले चुनावों में यह समाज बीआरएस (BRS) की ओर झुका रहा था, लेकिन अब रेवंत रेड्डी इस मजबूत पारंपरिक ताकत को सीधे कांग्रेस के पाले में लाकर अपनी सरकार को अभेद्य किला बनाना चाहते हैं.

यादव वोट बैंक को साधने के लिए खोला सरकारी खजाना

यादव वोट बैंक को साधने के लिए सीएम रेवंत रेड्डी ने किसी तरह की कसर नहीं छोड़ी और खजाना खोल दिया. उन्होंने इस ऐतिहासिक 'सदर सम्मेलन' को सरकारी उत्सव (State Festival) घोषित किया और इसके भव्य आयोजन के लिए सीधे सरकारी बजट से 5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि आवंटित कर दी. मंच से उन्होंने याद दिलाया कि हैदराबाद का मशहूर 'गोलकुंडा किला' असल में इतिहास में 'गोल्ला कोंडा' यानी यादवों का किला के नाम से जाना जाता था.

तेलंगाना में यादवों की आबादी और राजनीतिक ताकत

तेलंगाना में यादव मुख्य रूप से पारंपरिक पशुपालक और चरवाहा (Pastoral) समुदाय हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ऐतिहासिक रूप से 'गोल्ला' (Golla) या 'कुरुमा-गोल्ला' (Kuruma-Golla) कहा जाता है. तेलंगाना सरकार के सामाजिक-आर्थिक और जाति सर्वेक्षण (Caste Survey) के आंकड़ों के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में यादव यानी गोल्ला समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 6 फीसदी है, जो संख्या के लिहाज से करीब 20 लाख बैठती है. राज्य की पिछड़ी जातियों (Backward Classes - BC) की कुल आबादी में इस समाज की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी है. इससे यह तेलंगाना के सबसे प्रभावी और निर्णायक वोट बैंकों में से एक बन जाता है.

भौगोलिक रूप से यादव समाज की सबसे घनी आबादी नलगोंडा, हैदराबाद, सूर्यपेट, खम्मम और महबूबनगर जैसे जिलों में है. आर्थिक ताकत के मामले में भी तेलंगाना का यादव समाज रेड्डी समुदाय के बाद दूसरी सबसे बड़ी भूमि-मालिक (Land-owning) जाति मानी जाती है, जिसके पास करीब 9 फीसदी कृषि जमीन का मालिकाना हक है.

तेलंगाना की राजनीति में सवर्ण समुदायों का दबदबा

तेलंगाना राज्य का इतिहास अभी 15 साल भी पुराना नहीं है. पहले 10 साल तक चंद्रशेखर राव सीएम रहे, जो ऊंची जाति से आते हैं. उनकी जाति वेलमा जमींदारों की और राजनीतिक रूप से असरदार सवर्ण जाति है. 2023 में रेवंत रेड्डी ने केसीआर को हराया तो तेलंगाना में फिर सवर्ण राज ही स्थापित हुआ.

रेवंत रेड्डी रेड्डी समुदाय से आते हैं, जो तेलंगाना की राजनीतिक और आर्थिक रूप से शक्तिशाली और समृद्ध जाति मानी जाती है. राजनीति का दस्तूर यह है कि शासन भले ही ऊंची या सवर्ण जाति का रहा हो, लेकिन वोट बैंक के विस्तार और मजबूती के लिए ओबीसी और दलितों पर ध्यान रखना जरूरी होता है. तेलंगाना में रेवंत रेड्डी ने ओबीसी में भी माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग करते हुए यादवों पर फोकस किया है.

पहले से ही यादव नेताओं को दे रहे हैं राजनीतिक हिस्सेदारी

ऐसा नहीं है कि यादवों को लेकर रेवंत रेड्डी अचानक जागे हैं. तेलंगाना में यादव असरदार हैं. उनकी हैसियत समझते हुए ही रेवंत रेड्डी ने अनिल कुमार यादव को राज्यसभा सांसद बनाया, नवीन यादव को विधायक का टिकट देकर जिताया और ईश्वरम्मा यादव को यादगिरीगुट्टा मंदिर बोर्ड का सदस्य नियुक्त किया. साथ ही, यादवों की धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए यादगिरीगुट्टा की सरकारी गौशाला में गायों के संरक्षण की पुख्ता व्यवस्था भी सरकार करा रही है.

राष्ट्रीय राजनीति में यादवों की ताकत पर नजर

देश की राजनीति में यादवों की ताकत किसी से छिपी नहीं है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सरकार बनाने और बिगाड़ने की क्षमता रखने वाला यह सबसे बड़ा ओबीसी समूह है, जो देश की राजनीति की दिशा भी तय करता रहा है.

जब हैदराबाद के मंच से तेजस्वी यादव ने रेवंत रेड्डी की तारीफों के पुल बांधे और कहा कि 'रेवंत को सत्ता से कोई नहीं हटा सकता', तो इसका संदेश साफ था. यह सिर्फ राज्यों की राजनीति नहीं, बल्कि दिल्ली के सिंहासन के लिए बुना जा रहा एक बड़ा सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना है.

तेलंगाना में कराई गई जातिगत जनगणना (Caste Census) को रोल मॉडल बताते हुए रेवंत रेड्डी ने देशभर के पिछड़े और वंचित समाज को संदेश दिया है कि कांग्रेस ही उनकी सच्ची हितैषी है. साफ है कि हैदराबाद से शुरू हुई यह 'यादव पॉलिटिक्स' आने वाले समय में देश के चुनावी समीकरणों में एक नया अध्याय लिखने के लिए पूरी तरह तैयार है!