साप्ताहिक सभा: सिर्फ NEET का गुस्सा नहीं! युवाओं की नाराजगी की असली वजह क्या है?

न्यूज तक डेस्क

• 02:44 PM • 08 Aug 2026

जंतर-मंतर के युवा आंदोलन के बीच सी वोटर के स्नैप पोल में नरेंद्र मोदी 40 फीसदी युवाओं की पसंद बने हुए हैं. राहुल गांधी को 28 फीसदी और सीजेपी को 12 फीसदी समर्थन मिला. सर्वे में युवाओं की नाराजगी की बड़ी वजह एंटी इनकंबेंसी बताई गई. 2029 में युवा और महिला वोटर अहम हो सकते हैं.

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देश के युवा इस वक्त राजनीति को लेकर क्या सोचते हैं? क्या परीक्षाओं में गड़बड़ी और रोजगार जैसे मुद्दों से सरकार के प्रति युवाओं का नजरिया बदला है? इन सभी सवालों के बीच सी-वोटर (C-Voter) के नए सर्वे ने देश की भावी राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर पेश की है.

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सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि तमाम तरह के विरोध-प्रदर्शनों और मुद्दों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब भी युवाओं की पहली पसंद बने हुए हैं. हालांकि, उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है. वहीं, विपक्ष के लिए भी यह सर्वे एक बड़ी चेतावनी की तरह देखा जा रहा है. 

सी वोटर के फाउंडर यशवंत देशमुख ने News Tak के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर से बातचीत में इन आंकड़ों का मतलब समझाया. उन्होंने कहा कि युवाओं का गुस्सा अचानक पैदा नहीं हुआ. कई मुद्दों ने मिलकर इसे धीरे-धीरे बड़ा किया है.

मोदी अब भी युवाओं की पहली पसंद

सर्वे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 40 फीसदी पसंद के साथ युवाओं के बीच सबसे आगे हैं. हालांकि यह आंकड़ा उनके लिए चिंता की बात भी है. वजह यह है कि पहले उनकी लोकप्रियता करीब 50 फीसदी या उससे ऊपर रही है.

यशवंत देशमुख के मुताबिक, युवाओं के बीच 40 फीसदी तक आना प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में गिरावट का संकेत है. इससे पहले कोविड की दूसरी लहर के दौरान भी उनकी रेटिंग नीचे गई थी, लेकिन बाद में इसमें सुधार हुआ था.

इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है. मोदी की रेटिंग कम हुई है, लेकिन इसका सीधा फायदा राहुल गांधी को नहीं मिला.

राहुल गांधी को नहीं मिला पूरी नाराजगी का फायदा

सर्वे में राहुल गांधी को 28 फीसदी युवाओं ने पसंद किया. यानी वह दूसरे नंबर पर हैं. लेकिन मोदी की लोकप्रियता में जितनी गिरावट आई है, उसके बराबर राहुल गांधी की लोकप्रियता नहीं बढ़ी.

यहीं से इस सर्वे का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत सामने आता है. युवाओं में सरकार को लेकर नाराजगी हो सकती है, लेकिन वे इस नाराजगी को तुरंत पारंपरिक विपक्ष के साथ जोड़ते हुए नहीं दिख रहे हैं.इस जगह एक तीसरा विकल्प दिखाई दे रहा है.

12 फीसदी युवाओं ने सीजेपी को पसंद किया

सर्वे का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा सीजेपी को लेकर है. करीब 12 फीसदी युवाओं ने सीजेपी को अपनी पसंद बताया.

खास बात यह है कि सीजेपी का कोई घोषित राजनीतिक चेहरा नहीं है. इसके बावजूद युवाओं के बीच उसे समर्थन मिलना बताता है कि आंदोलन से जुड़ा गुस्सा पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग रास्ता भी तलाश रहा है.

हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सीजेपी भविष्य में चुनावी राजनीति में बड़ी ताकत बन जाएगी. खुद सीजेपी की ओर से भी राजनीतिक पार्टी बनाने के बजाय दबाव समूह के तौर पर काम करने की बात कही गई है.

सीजेपी ने गुस्सा पैदा नहीं किया, उसे रास्ता दिया

यशवंत देशमुख के मुताबिक युवाओं की नाराजगी सीजेपी आंदोलन शुरू होने से पहले ही दिखाई दे रही थी.

उन्होंने मई में हुए एक सर्वे का जिक्र किया. इसमें करीब 70 फीसदी लोगों ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी. उस समय सीजेपी चर्चा में भी नहीं थी.

इसलिए मौजूदा आंदोलन को सिर्फ सीजेपी की वजह से पैदा हुआ गुस्सा मानना सही नहीं होगा. लोगों के बीच पहले से असंतोष था. सीजेपी ने उस नाराजगी को आवाज और मंच देने का काम किया.

युवाओं का गुस्सा सिर्फ नीट तक सीमित नहीं

इस आंदोलन को केवल नीट और पेपर लीक के मुद्दे से जोड़ना भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता.

सर्वे में युवाओं की नाराजगी के पीछे एंटी इनकंबेंसी को बड़ी वजह बताया गया है. यानी सरकार के प्रति पहले से मौजूद असंतोष. पेपर लीक इस गुस्से का एक अहम हिस्सा है, लेकिन अकेली वजह नहीं.

यशवंत देशमुख ने बताया कि पिछले कुछ समय में कई मुद्दे एक के बाद एक सामने आए. यूजीसी से जुड़े फैसले, 10वीं और 12वीं के रिजल्ट, कॉपियों की स्कैनिंग से जुड़े सवाल और नीट विवाद ने युवाओं के बीच नाराजगी बढ़ाई.

एक छात्र किसी परीक्षा या भर्ती से प्रभावित होता है तो उसका असर सिर्फ उसी तक नहीं रहता. उसके माता-पिता और परिवार भी इससे जुड़े होते हैं. इसलिए ऐसे मुद्दों का असर काफी बड़े वर्ग तक पहुंचता है.

पहले से जमा हो रहा था असंतोष

देशमुख के मुताबिक यूजीसी से जुड़े मुद्दे से ही असंतोष की शुरुआत दिखने लगी थी. इसके बाद स्कूल और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े कई विवाद सामने आए.

फिर नीट का मुद्दा आया. इस दौरान एथेनॉल से जुड़ा विवाद भी चर्चा में आया. यानी अलग-अलग घटनाएं एक-दूसरे के ऊपर जुड़ती गईं.

इसी वजह से मौजूदा गुस्से को सिर्फ एक घटना का नतीजा मानना सही नहीं होगा. यह कई मुद्दों से बना हुआ असंतोष है.

सवाल पूछने पर राष्ट्रविरोधी बताने का आरोप

बातचीत में सोशल मीडिया की राजनीति पर भी चर्चा हुई. देशमुख का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार से सवाल पूछने वालों को सोशल मीडिया पर राष्ट्रविरोधी, एंटी-हिंदू या एंटी-नेशनल बताने की प्रवृत्ति बढ़ी है.

उनके मुताबिक जब यही तरीका आम छात्रों और उनके माता-पिता तक पहुंचता है, तो नाराजगी और बढ़ सकती है. लोगों को लगता है कि सवाल पूछना गलत माना जा रहा है.

उनका कहना था कि लोगों की शिकायत यह नहीं है कि सरकार से गलतियां नहीं हो सकतीं. शिकायत यह है कि गलती होने के बाद उसे स्वीकार कर सुधारने के बजाय अगर सवाल उठाने वालों पर ही हमला किया जाए तो गुस्सा बढ़ता है.

फेसबुक और ट्विटर की राजनीति इंस्टाग्राम पर क्यों नहीं चली?

देशमुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के बदलते मिजाज को भी इस आंदोलन से जोड़ा. उनके मुताबिक भाजपा ने फेसबुक और ट्विटर के दौर में सोशल मीडिया की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाई. लेकिन इंस्टाग्राम पर युवाओं की सोच और संवाद का तरीका अलग है.

उनका तर्क है कि फेसबुक और ट्विटर पर काम करने वाली पुरानी राजनीतिक रणनीति को उसी तरह इंस्टाग्राम पर लागू करना आसान नहीं है. आज के युवा उसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी नाराजगी का जवाब अलग तरीके से दे रहे हैं.

करीब आधे युवा सीजेपी के अगले आंदोलन के समर्थन में

सर्वे में युवाओं से यह भी पूछा गया कि अगर सीजेपी भविष्य में कोई नया मुद्दा उठाती है या दूसरा आंदोलन शुरू करती है तो क्या वे उसका समर्थन करेंगे. करीब आधे युवाओं ने समर्थन की बात कही.

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सीजेपी ने खुद को राजनीतिक पार्टी के बजाय दबाव समूह के तौर पर आगे बढ़ाने की बात कही है. ऐसे में उसके अगले आंदोलनों को लेकर युवाओं की प्रतिक्रिया पर राजनीतिक दलों की नजर रहेगी. फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि यह समर्थन भविष्य में वोट में बदलेगा या नहीं.

बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत का क्या मतलब?

बातचीत में बिहार के बांकीपुर चुनाव में प्रशांत किशोर की जीत को भी मौजूदा राजनीतिक माहौल से जोड़कर देखा गया.

कुछ लोगों का मानना है कि देश में चल रहे युवा आंदोलन का असर बांकीपुर के नतीजे पर भी पड़ा. लेकिन यशवंत देशमुख ने प्रशांत किशोर की जीत का पूरा श्रेय सिर्फ आंदोलन को देने से इनकार किया.

उनके मुताबिक प्रशांत किशोर ने करीब तीन साल तक बिहार में जमीन पर काम किया. उन्होंने बिहार के भविष्य और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया.

पहले बड़े चुनाव में उनकी लोकप्रियता वोट में नहीं बदल पाई थी. लेकिन बांकीपुर में मुकाबला एक सीट पर केंद्रित था. यहां उनके पुराने काम, जनता की नाराजगी और भाजपा समर्थकों के एक हिस्से का समर्थन उनके पक्ष में गया.

भाजपा के वोटरों ने भी प्रशांत किशोर का साथ दिया

देशमुख के मुताबिक बांकीपुर के नतीजे को समझने के लिए भाजपा के वोट शेयर में आई गिरावट पर ध्यान देना जरूरी है.

उनका कहना है कि भाजपा समर्थक मतदाताओं के एक हिस्से ने प्रशांत किशोर को वोट दिया. यानी उनकी जीत सिर्फ पारंपरिक विपक्ष के वोटों की वजह से नहीं हुई. प्रशांत किशोर ने उन मतदाताओं तक भी पहुंच बनाई जो पहले भाजपा के साथ खड़े थे.

क्या बिहार विधानसभा में प्रशांत किशोर बनेंगे बड़ा विपक्षी चेहरा?

प्रशांत किशोर की जीत बिहार की राजनीति में एक अलग स्थिति पैदा कर सकती है. देशमुख के मुताबिक अगर वह अकेले विधायक के तौर पर विधानसभा में पहुंचते हैं तो संख्या कम होने के बावजूद मुद्दों पर विपक्ष की मजबूत आवाज बन सकते हैं.

उनका मानना है कि प्रशांत किशोर अपनी राजनीतिक शैली और आक्रामक तेवरों के कारण विधानसभा में प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभा सकते हैं.

इसका एक बड़ा संदेश यह भी होगा कि लगातार जमीन पर काम करके और मुद्दों को उठाकर चुनाव जीता जा सकता है.

हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि जन सुराज आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर की बड़ी राजनीतिक ताकत बन जाएगा.

भाजपा के लिए भी है बड़ा सबक

यशवंत देशमुख के मुताबिक भाजपा तेजी से सीखने और अपनी रणनीति बदलने वाली पार्टी है. जब उसे लगता है कि किसी मुद्दे पर नुकसान हो रहा है तो वह जल्द प्रतिक्रिया देती है.अब सवाल यह है कि क्या विपक्ष भी इस आंदोलन से उतनी ही तेजी से सीख पाएगा.

उनके मुताबिक आने वाले समय में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए अपनी गलतियों से सीखना जरूरी होगा. जो पार्टी बदलते राजनीतिक माहौल के हिसाब से खुद को जल्दी बदलेगी, उसके लिए आगे बढ़ने के मौके ज्यादा होंगे.

2029 में युवा वोटर कितना बड़ा फैक्टर होगा?

अब सवाल 2029 के लोकसभा चुनाव का है. क्या युवा आंदोलन का असर तब तक बना रहेगा? क्या युवा वोटर चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगा?

देशमुख का मानना है कि आने वाले समय में युवा और महिलाएं राजनीति के सबसे बड़े प्रभावशाली समूह बन सकते हैं.

उन्होंने यहां तक कहा कि अगर राजनीति को जाति के नजरिए से समझना हो तो आज महिला और युवा दो ऐसी बड़ी 'जातियां' हैं, जिनका असर पुराने जातीय और धार्मिक समीकरणों से ऊपर जाता दिख रहा है.

महिलाओं ने पहले ही कई चुनावों के नतीजे बदले

पिछले कुछ चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका काफी अहम रही है. कई जगह महिलाओं ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया और कुछ मामलों में परिणाम तक बदल दिए. अब युवाओं के बीच भी इसी तरह का राजनीतिक मूवमेंट दिखाई दे रहा है.

युवा वर्ग के भीतर भी बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं. इसलिए आने वाले समय में महिला और युवा वोटर के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं.

पुराने राजनीतिक समीकरणों को बदलना पड़ेगा

देशमुख के मुताबिक पारंपरिक पार्टियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे बदलते मतदाता को किस तरह समझती हैं.

सिर्फ जाति और धर्म के पुराने समीकरणों के आधार पर राजनीति करना पहले की तरह आसान नहीं रहेगा. पार्टियों को अपनी रणनीति, भाषा और काम करने के तरीके में बदलाव करना पड़ेगा.

जो दल और नेता खुद को बदलने में देर करेंगे, उन्हें इसका नुकसान चुनाव में उठाना पड़ सकता है.

33 फीसदी महिला आरक्षण भी बदलेगा तस्वीर

बातचीत में 33 फीसदी महिला आरक्षण का भी जिक्र हुआ. देशमुख के मुताबिक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ना अब एक बड़ी संभावना है.

उनके अनुसार सवाल यह ज्यादा है कि लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ेगी या नहीं. महिला आरक्षण को लेकर भागीदारी बढ़ने की संभावना अलग मुद्दा है. ऐसे में 2029 तक महिला और युवा मतदाताओं की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है.

सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए चेतावनी

इस पूरी चर्चा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सिर्फ सरकार से नाराजगी का मतलब यह नहीं है कि वोट अपने आप विपक्ष को मिल जाएगा.

मोदी की लोकप्रियता में गिरावट के बावजूद राहुल गांधी को उसका पूरा फायदा नहीं मिला. वहीं सीजेपी जैसे नए और बिना चेहरे वाले विकल्प को युवाओं का समर्थन मिलना बताता है कि राजनीति में कुछ नया तलाशने की कोशिश भी चल रही है.

आने वाले वर्षों में युवा और महिलाएं चुनावी राजनीति के सबसे अहम खिलाड़ी बन सकते हैं. 2029 तक यह तस्वीर कितनी बदलती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक दल इस बदलते मूड को कितनी जल्दी समझते हैं और खुद को कितना बदल पाते हैं.