एक ऐसा छात्र जो खुद परीक्षा हॉल में बैठकर पर्चा लिख रहा हो, क्या वो खुद तय कर सकता है कि उसकी कॉपी कौन जांचेगा? क्या वो खुद अपने एग्जामिनर की नियुक्ति कर सकता है? कोई नहीं कहेगा कि ये हो सकता है या होना चाहिए. यही सवाल पूछते हुए जगन मोहन रेड्डी ने वरडिक्ट भी दे दिया कि छात्र कभी अपने एग्जामिनर की नियुक्ति नहीं कर सकता.
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ज्ञानेश कुमार विवाद में एग्जामिनर थ्योरी पेश करके जगन रेड्डी ने दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक हड़कंप मचा दिया है. बीजेपी, सरकार को छात्र और चुनाव आयोग को एग्जामिनर बताते हुए जगन मोहन रेड्डी ने कह दिया कि 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले बिल का समर्थन करके उनसे भारी भूल हुई, जिसका उन्हें गहरा अफसोस है.
ये सिर्फ बयानबाजी नहीं, YSRCP चीफ वाईएस जगन मोहन रेड्डी की राजनीति का सबसे बड़ा यूटर्न है. ये सवाल तो बनता है कि आखिर आंध्र प्रदेश के इस एंग्री यंग मैन को 2026 में भूल का अहसास क्यों हुआ? क्या यह कोई आत्मग्लानि है, या फिर सीबीआई-ईडी के मुकदमों की आंच से बचने का नया पॉलिटिकल सरेंडर? अचानक ऐसा क्या हुआ कि कल तक का परम मित्र आज धुर विरोधी बन गया?
इसके पीछे छिपा है वो कानूनी प्रेशर जिसे जगन की सबसे बड़ी कमजोरी माना जाता है. 2004 से 2009 के बीच जगन मोहन रेड्डी पर पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी के मुख्यमंत्री रहते हुए पद का दुरुपयोग कर आय से अधिक संपत्ति बनाने का बेहद गंभीर आरोप है. यूपीए सरकार के वक्त उसी घोटाले में जगन 16 महीने जेल में रहे. माना जाता है कि जगन ने कांग्रेस में रहते हुए जेल जाने के कारण हमेशा के लिए कांग्रेस को अपना दुश्मन मान लिया.
राहुल गांधी और सीजेपी के प्रोटेस्ट के शोर में दब गई
असली धमाका जो हुआ है उसकी चर्चा राहुल गांधी और सीजेपी के प्रोटेस्ट के शोर में दब गई. तेलंगाना हाईकोर्ट से जगन रेड्डी के सबसे बड़े केस की फाइल 15 साल बाद फिर खुल गई है. 23 सितंबर को ED ने तेलंगाना हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर शिकायत की कि इतने हाई-प्रोफाइल आर्थिक अपराध का मामला पिछले एक दशक से प्रारंभिक स्तर पर ही अटका हुआ है. ईडी ने मांग की कि इस मामले में तेजी लाई जाए और सभी आरोपियों की कोर्ट में व्यक्तिगत पेशी अनिवार्य की जाए. 15 साल पुराने भ्रष्टाचार के मामले में नामपल्ली की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने 9 अक्टूबर को आदेश दिया कि 15 साल से लंबित सीबीआई के 11 और ईडी के 9 मामलों की अब 'डे-टू-डे' यानी रोजाना सुनवाई होगी.
2011 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की. बाद में पैसों की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के लिए ED की भी केस में एंट्री हुई. सीबीआई ने इस मामले में 11 चार्जशीट दाखिल कीं. ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) के तहत 9 चार्जशीट दाखिल कीं. जगन मोहन रेड्डी को मई 2012 में गिरफ्तार किया गया था और वो लगभग 16 महीने हैदराबाद की चंचलगुडा जेल में बंद रहे थे, जिसके बाद उन्हें सितंबर 2013 में जमानत मिली. जेल से निकलकर ही उन्होंने नई पार्टी YSRCP बनाई. पूरे आंध्र में पदयात्रा करके माहौल बनाया और 2019 में धमाकेदार शुरूआत की.
जगन मोहन रेड्डी के लिए यह आदेश एक बहुत बड़ा झटका है. जब तक जगन 2019 से 2024 के बीच मुख्यमंत्री थे, उन्हें उनके पद और व्यस्तता के चलते हाई कोर्ट से हर तारीख पर व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट मिली हुई थी. लेकिन 2024 में चुनाव हारने के बाद अब वे सिर्फ एक विधायक हैं. रोजाना सुनवाई होने का मतलब है कि उन्हें और उनके सह-आरोपियों को बार-बार कोर्ट के चक्कर काटने पड़ सकते हैं. रोजाना सुनवाई होने से सालों से लटका यह केस महीनों के भीतर अपने अंजाम यानी अंतिम फैसले तक पहुंच सकता है. अगर फैसला उनके खिलाफ जाता है, तो उनके राजनीतिक भविष्य पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
जेल से निकलने के बाद उनके खिलाफ जांच
जगन की उम्मीद आजतक गलत साबित नहीं हुई कि बीजेपी के साथ रहने से कवच मिला रहेगा. जेल से निकलने के बाद उनके खिलाफ जांच, कोर्ट प्रोसेस एकदम ठंडे पड़ गए. पूरा जोर लगाकर जगन रेड्डी राजनीति में कूदे और और चंद्रबाबू को हराकर 2019 से 2024 तक सीएम बने रहे. जगन रेड्डी ने छोटी सी राजनीति में ये दमखम तो दिखाया कि कभी कांग्रेसी होते हुए उन्होंने एक दिन एंग्री यंग मैन बनकर आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को जीरो समेट दिया. बीजेपी को पैर पसारने नहीं दिए और चंद्रबाबू नायडू जैसे दिग्गज को भी सीधे चुनावों में हराकर अपना राज चलाया.
सीएम रहते हुए बीजेपी का बिना मांगे समर्थन करते रहे तब भी चीजें ठीक रहीं लेकिन 2024 में चुनाव हारने के बाद चंद्रबाबू नायडू वापसी कर चुके हैं. ये वही चंद्रबाबू हैं जिनको जगन रेड्डी ने चुनाव से ठीक पहले घोटाले के आरोप में जेल भिजवाया था. बीजेपी के लिए कमजोर पड़ चुके जगन रेड्डी के सपोर्ट से कहीं ज्यादा अहम है चंद्रबाबू नायडू का ओपन एंड लाउड सपोर्ट. कोई दावा नहीं कर सकता लेकिन बस राजनीतिक दस्तूर के हिसाब से कड़ियां जोड़ी जा सकती हैं कि राजनीतिक रूप से चंद्रबाबू के मजबूत होने और जगन के कमजोर पड़ने से केस फिर से खुल रहा है.
अदालती आदेश ने जगन के पैरों तले जमीन खिसका दी है. उन्हें समझ आया होगा कि चंद्रबाबू नायडू के केंद्र में रहते हुए, बीजेपी को 'साइलेंट सपोर्ट' देने का उनका पुराना फॉर्मूला अब उनके किसी काम नहीं आने वाला. जब राहत मिलनी ही नहीं है, तो फिर बीजेपी का बोझ क्यों उठाना? इसी प्रेशर को भांपकर जगन ने अब 'विक्टिम कार्ड' खेलने और राजनीतिक लड़ाई को तेज करने का फैसला किया है.
राहुल गांधी का होना या नहीं होना बहुत काम का नहीं
जगन रेड्डी 2023 की जिस भूल को लेकर अब तक अफसोस जताया है उस कानून गूंज लेकर संसद, सड़क, सुप्रीम कोर्ट तक सुनी जा रही है. 2023 में मोदी सरकार ने कानून बनाकर चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली कमेटी से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को बाहर कर दिया गया. कमेटी में पीएम मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और नेता विपक्ष राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी का होना या नहीं होना बहुत काम का नहीं रह गया क्योंकि सेलेक्शन कमेटी में बहुमत सीधे सरकार के पास है और इसी का विवाद है. सुप्रीम कोर्ट एक बार कानून को हरी झंडी दे चुका है लेकिन जब बहुत सारी याचिकाएं आईं तो नए सिरे से कोर्ट ने कानून पर सुनवाई शुरू की है.
2023 में कानून बनते समय कांग्रेस और पूरे विपक्ष ने विरोध किया था लेकिन तब जगन की पार्टी ने संसद में आंख मूंदकर समर्थन किया था. आज जगन कह रहे हैं कि कानून बदलना चाहिए, चीफ जस्टिस को फिर से कमेटी में लाना चाहिए. आंध्र में जगन को यह ज्ञान तब आया जब आंध्र प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी (TDP) सरकार के दौरान वाईएसआरसीपी के उम्मीदवारों के नामांकन रद्द होने लगे और पुलिसिया कार्रवाई हुई. जब चोट खुद पर पड़ी, तब जगन को चुनाव आयोग की निष्पक्षता याद आने लगी.
जगन रेड्डी को जागने में बहुत देर हो चुकी है क्योंकि आंध्र की राजनीति में वो 2029 तक बेदखल हैं. हालांकि उनका वोट बैंक अपनी जगह कायम हैं. 2024 के आम चुनाव में करारी शिकस्त के बाद लोकसभा में YSRCP के पास केवल 4 सांसद बचे हैं. राज्यसभा में YSRCP की ताकत 6 सांसदों की रह गई है. यानी संसद के दोनों सदनों को मिलाकर जगन रेड्डी के पास कुल 10 सांसदों की ताकत है. आंध्र विधानसभा में पार्टी महज 11 विधायकों पर सिमट चुकी है.
इतिहास गवाह है कि जब उनके पास लोकसभा में 22 सांसद थे तब भी उन्होंने एनडीए ज्वाइन नहीं करने का फैसला किया लेकिन एनडीए का हिस्सा न होते हुए भी मोदी सरकार के लिए वो सारे काम किए जो उनके अपने सहयोगी भी नहीं कर पाते थे. धारा 370, सीएए और एनआरसी, कृषि कानून, नए संसद भवन के उद्घाटन-जब भी कांग्रेस और विपक्ष ने बीजेपी और सरकार का विरोध किया, जगन ने चिढ़ाने के लिए एंटी विपक्ष लाइन लेकर बीजेपी को मदद दी.
देश की राजनीति में बड़ा और भूचाल
राहुल गांधी की आक्रामक पॉलिटिक्स और छात्र राजनीति से देश की राजनीति में बड़ा और खामोश भूचाल आया तो है. बहुत पुरानी बात नहीं है. 2019 से 2024 का वो दौर, जब केंद्र की मोदी सरकार के पास पूर्ण बहुमत था, लेकिन कुछ बड़े और विवादित फैसलों पर उसे राज्यसभा में मदद की जरूरत पड़ती थी. तब विपक्ष लाख शोर मचाता रह जाए, लेकिन दो ऐसी 'न्यूट्रल ताकतें' थीं जो न तो बीजेपी के एनडीए गठबंधन में थीं और न ही विपक्ष के 'इंडिया ब्लॉक में. ओडिशा के नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी ही थे जो बीजेपी-कांग्रेस से समान दूरी की राजनीति करते हुए बीजेपी के लिए क्राइसिस मैनेजर का काम करते रहे.
2026 में राजनीतिक हालात बदलते ही इन दोनों न्यूट्रल ताकतों का मन भी बदलने लगा है. सत्ता हाथ से क्या फिसली, इन राज्यों के क्षत्रपों को अब दिल्ली की दोस्ती में खोट नजर आने लगी है. ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजू जनता दल ने पहले ही पाला बदलकर बीजेपी सरकार पर टूट पड़े हैं. अब आंध्र प्रदेश से YSRCP चीफ वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने भी राजनीति का सबसे बड़ा यू-टर्न ले लिया है! जब उनके धुर विरोधी चंद्रबाबू नायडू केंद्र में मोदी सरकार के सबसे बड़े सपोर्टर बनकर बैठे हैं, तो आखिर जगन रेड्डी इस यू-टर्न से क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या यह उनका आत्मघाती कदम है या फिर किसी सोची-समझी लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजी का हिस्सा?
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