पंजाब चुनाव में किसका पलड़ा भारी, चौतरफा मुकाबले में 'AAP' को फायदा या कांग्रेस का खेल खराब? आदेश रावल का बड़ा विश्लेषण

न्यूज तक डेस्क

06 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 6 2026 8:12 PM)

साप्ताहिक सभा में मिलिंद खांडेकर और आदेश रावल का पंजाब चुनाव पर विश्लेषण. जानिए राहुल गांधी और मनीष तिवारी के बीच क्यों है 'ट्रस्ट डेफिसिट' और पंजाब कांग्रेस में क्यों है तूफान से पहले की शांति. जानिए इस एनॉलिसिस में.

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Punjab Election: पंजाब की सियासत में आगामी चुनाव को लेकर बिसात बिछनी शुरू हो गई है. लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब राज्य में चौतरफा और कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है. आम आदमी पार्टी (AAP) अपनी लोक-लुभावन योजनाओं के दम पर सत्ता बचाने की कोशिश में है, तो वहीं कांग्रेस और बीजेपी अपनी नई रणनीतियों के साथ मैदान में उतर चुके हैं. इंडिया टुडे ग्रुप के 'तक' चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर ने 'न्यूज़ तक' के साप्ताहिक कार्यक्रम 'साप्ताहिक सभा' (Saptahik Sabha) में वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार आदेश रावल के साथ पंजाब के इसी चुनावी मिजाज, वोट शेयर के आंकड़ों और कांग्रेस के अंदरूनी घमासान का एक बेहद बारीक और इनसाइडर विश्लेषण किया है. 

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वोट शेयर का गणित: चौतरफा मुकाबले में किसे 'एडवांटेज'? 

चर्चा की शुरुआत करते हुए मिलिंद खांडेकर ने आंकड़ों का एक दिलचस्प गुणा-भाग सामने रखा. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) को करीब 42% वोट मिले थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में यह ग्राफ गिरकर 26% पर आ गया. हालांकि, कांग्रेस को भी लोकसभा चुनाव में 26% वोट मिले थे, लेकिन उसकी सीटें ज्यादा थीं. इसके अलावा बीजेपी को 18% और शिरोमणि अकाली दल को 13% वोट मिले थे. 

चूंकि यह विधानसभा चुनाव है, इसलिए क्षेत्रीय दलों (जैसे आम आदमी पार्टी) की हिस्सेदारी वैसे भी बढ़ जाती है.  'आप' सरकार ने महिलाओं को हर महीने 1000 रुपए देने की अपनी बहुप्रतीक्षित योजना को 1 जुलाई से लागू कर दिया है.  ऐसे में अगर चुनाव में चौतरफा मुकाबला होता है, तो जो भी दल 7 से 8% एक्स्ट्रा वोट पाकर 30% का आंकड़ा पार कर लेगा, पंजाब में उसकी सरकार बन जाएगी. इस स्थिति में आंकड़ों के लिहाज से आम आदमी पार्टी एडवांटेज पर और कांग्रेस कहीं न कहीं डिसएडवांटेज पर दिख रही है. 

अकाली-बीजेपी गठबंधन और 'जट सिख' वोटों का बिखराव 

वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल ने इस पर अपनी राय रखते हुए कहा कि आंकड़ों की बात सच हो सकती है, लेकिन पंजाब चुनाव में सबसे बड़ा गेम चेंजर अकाली दल और बीजेपी का संभावित गठबंधन हो सकता है. अगर इनका अलायंस हो जाता है, तो यह 'आप' और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनेगा. 

पंजाब की सबसे डोमिनेटिंग कम्युनिटी 'जट सिख' (Jat Sikh) के वोटों को लेकर आदेश रावल ने बड़ा विश्लेषण किया. उन्होंने बताया कि इस बार जट सिख वोट बैंक चार हिस्सों में बंटता दिख रहा है. 

  • अमृतपाल सिंह की पार्टी (वारिस पंजाब दे)
  • शिरोमणि अकाली दल
  • आम आदमी पार्टी (भगवंत मान बनाम अकाल तख्त विवाद के बीच)
  • कांग्रेस पार्टी

जब यह मुख्य वोट बैंक चार जगह बंट जाएगा, तो इसका सीधा फायदा अकाली-बीजेपी गठबंधन को मिल सकता है, बशर्ते उनका समझौता हो जाए. 

कांग्रेस: एक 'डिवाइडेड हाउस' लेकिन बदली परिस्थितियां 

पंजाब कांग्रेस के अंदरूनी कलह पर बात करते हुए आदेश रावल ने कहा कि कांग्रेस हमेशा से एक 'डिवाइडेड हाउस' (गुटबाजी का शिकार) रही है, लेकिन उसका प्लस पॉइंट यह है कि उसे हिंदू, जट सिख, दलित और ओबीसी, सभी वर्गों का थोड़ा-थोड़ा वोट मिलता रहा है. 

2022 के चुनाव में कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को दलित मुख्यमंत्री बनाने का एक्सपेरिमेंट किया था. हालिया बैठकों में चन्नी ने दर्द बयां किया कि उनके 111 दिनों के कार्यकाल में दो बड़े नेताओं (नवजोत सिंह सिद्धू और सुनील जाखड़) ने हर रोज उनकी अथॉरिटी को चैलेंज किया था. लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं- कैप्टन अमरिंदर सिंह रिटायर्ड मोड में हैं, जाखड़ बीजेपी में जा चुके हैं और नवजोत सिंह सिद्धू घर बैठे हैं. 

मनीष तिवारी की उपेक्षा और राहुल गांधी का 'ट्रस्ट डेफिसिट' 

शो में मिलिंद खांडेकर ने पूछा कि क्या मनीष तिवारी को किनारे करने के पीछे कांग्रेस हाईकमान का पुराना 'G23' वाला गिला-शिकवा है? इस पर आदेश रावल ने सीधा जवाब दिया कि राहुल गांधी और मनीष तिवारी के बीच एक बड़ा 'ट्रस्ट डेफिसिट' (विश्वास की कमी) है. मनीष तिवारी का G23 के पत्र पर हस्ताक्षर करना और उस गुट की बैठकों का हिस्सा होना इसका सबसे बड़ा कारण है. हालांकि वे वर्तमान में चंडीगढ़ से सांसद हैं और लुधियाना से भी सांसद रह चुके हैं, लेकिन हाईकमान द्वारा उन्हें पंजाब की राजनीति से दूर रखा जा रहा है. 

मिशन 2029 और पंजाब कांग्रेस का 'खामोश सन्नाटा' 

आदेश रावल ने बताया कि राहुल गांधी इस समय 'मिशन 2029' की तैयारी कर रहे हैं और हाल ही में तमिलनाडु, गोवा और कर्नाटक (बीके हरिप्रसाद और माणिक टैगोर की नियुक्तियां) में हुए सांगठनिक बदलाव इसी का हिस्सा हैं. आने वाले 10 दिनों में कई अन्य राज्यों के अध्यक्ष भी बदले जाएंगे. 

हालांकि, पंजाब के मामले में हाईकमान ने बहुत देरी कर दी. पंजाब कांग्रेस में नई कमेटी बने तीन-चार दिन हो चुके हैं, लेकिन किसी भी बड़े नेता ने हाईकमान (सोनिया, राहुल या खड़गे) को धन्यवाद तक नहीं दिया है. पूरा पंजाब नेतृत्व इस समय खामोश है. अंदरखाने खबरें हैं कि चरणजीत सिंह चन्नी अपने समर्थकों के साथ अलग बैठकें कर रहे हैं और सुखजिंदर सिंह रंधावा अलग रणनीति बना रहे हैं. 

"पंजाब कांग्रेस में दिख रहा यह सन्नाटा सामान्य नहीं है, बल्कि यह किसी बड़े सियासी तूफान से पहले की शांति है."