पंजाब की सियासत में इन दिनों भारी घमासान मचा हुआ है. आगामी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस के भीतर 2022 वाली पुरानी कलह एक बार फिर लौट आई है, बस इस बार किरदार बदल गए हैं. पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से मौजूदा सांसद चरणजीत सिंह चन्नी इस समय अपनी ही पार्टी के आलाकमान के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं. चन्नी की इस 'पावर पॉलिटिक्स' ने जहां एक तरफ राहुल गांधी को धर्म संकट में डाल दिया है, वहीं दूसरी तरफ पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग की नींद उड़ा रखी है. कभी शांत और विवादों से दूर रहने वाले चन्नी अब नवजोत सिंह सिद्धू की राह पर चलते हुए कांग्रेस हाईकमान पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं.
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रंक से राजा बनने की अद्भुत दास्तान
चरणजीत सिंह चन्नी की जीवन यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. 1 मार्च 1963 को पंजाब के भजौली गांव में एक साधारण दलित सिख रामदसिया परिवार में जन्मे चन्नी ने जीवन के शुरुआती दिनों में कड़ा संघर्ष किया है. उन्होंने अपने पिता के टेंट हाउस के बिजनेस में खंभे गाड़ने और टेंट लगाने तक का काम किया. हालांकि, उन्होंने आर्थिक तंगहाली के बावजूद पढ़ाई से अपना ध्यान कभी नहीं भटकने दिया. उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री ली, फिर एमबीए किया, पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स किया और अंततः पीएचडी कर डॉक्टर की उपाधि भी हासिल की.
इसके साथ ही वे हैंडबॉल के नेशनल प्लेयर भी रहे. 1991 में उनकी शादी डॉ. कमलजीत कौर से हुई, जो उस समय एक सरकारी मेडिकल ऑफिसर थीं. शादी के बाद कमलजीत उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनीं और 2022 के चुनाव में पति की राजनीतिक मदद के लिए उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी. चन्नी ने खुद को पूरी तरह राजनीति में समर्पित रखा, लेकिन अपने दोनों बेटों को हमेशा कॉपोरेट और प्रोफेशनल फील्ड में ही आगे बढ़ाया.
छात्र राजनीति से सीएम की कुर्सी तक का सफर
कॉलेज के दिनों से छात्र राजनीति में कदम रखने वाले चन्नी ने धीरे-धीरे मुख्यधारा की सियासत में अपनी पहचान बनाई. साल 1992 में वे पहली बार खरार नगर परिषद के सदस्य बने और 2002 में इसके अध्यक्ष चुने गए. साल 2007 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव का रुख किया. हालांकि, उस दौरान कांग्रेस के बड़े नेताओं ने उन्हें नौसिखिया समझकर चमकौर साहिब सीट से टिकट देने से इनकार कर दिया था.
इस अपमान के बाद चन्नी ने कांग्रेस से बगावत कर दी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर एक धमाकेदार जीत दर्ज की. चन्नी की इस ताकत को देखते हुए 2010 में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उनकी पुरानी बगावत को भुलाकर कांग्रेस में उनकी घर वापसी कराई. इसके बाद चन्नी का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया. वे राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा बने और 2015 में पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता भी चुने गए.
हाथी की सवारी और ज्योतिष के टोटके
चरणजीत सिंह चन्नी केवल कड़ी मेहनत पर ही भरोसा नहीं करते, बल्कि वे अपनी गृह दशा, ज्योतिष और टोटकों के हिसाब से भी कदम आगे बढ़ाते हैं. साल 2017 में जब वे कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री थे, तब उन्हें लगा कि उनका राजनीतिक करियर ठहर गया है. इसके बाद एक ज्योतिषी की सलाह पर उन्होंने अपने सरकारी आवास के लॉन में हाथी की सवारी की, ताकि उनके गृह नक्षत्र बदल सकें. उस वक्त सोशल मीडिया पर उनका काफी मजाक उड़ा था, लेकिन संयोग ऐसा बैठा कि ठीक 4 साल बाद 2021 में वे अचानक पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री बन गए.
इसी तरह एक अन्य ज्योतिषी के कहने पर उन्होंने अपने घर की मुख्य एंट्री पूर्व दिशा (ईस्ट) में करने के लिए सरकारी नियमों को ताक पर रखकर एक सार्वजनिक पार्क और ग्रीन बेल्ट को खुदवाकर अवैध सड़क बनवा दी थी, जिसे बाद में प्रशासन ने बुलडोजर से ढहा दिया था. यही नहीं, मंत्री रहते हुए उन्होंने एक बार पॉलिटेक्निक कॉलेज में लेक्चरर पद पर नियुक्ति का फैसला भी टॉस उछालकर किया था.
जब राहुल गांधी के एक फोन ने बदल दी थी किस्मत
कांग्रेस में राहुल गांधी हमेशा से ही जमीन से जुड़े और गैर-राजशाही चेहरों को आगे बढ़ाने के पक्षधर रहे हैं. साल 2021 में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच कलह चरम पर पहुंची और कैप्टन को हटाया गया, तो मुख्यमंत्री की रेस में सुनील जाखड़ और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे कई बड़े नाम आगे थे. लेकिन राहुल गांधी पंजाब की करीब 32 फीसदी दलित आबादी को साधने के लिए एक बड़ा संदेश देना चाहते थे. उन्होंने सभी बड़े नामों को दरकिनार करते हुए अचानक चन्नी के नाम पर मुहर लगा दी.
खुद चन्नी ने एक बार बताया था कि सीएम की रेस में उनका नाम दूर-दूर तक नहीं था. अचानक उन्हें राहुल गांधी का फोन आया और उन्होंने कहा, 'चन्नी, हम तुम्हें पंजाब का मुख्यमंत्री बना रहे हैं'. यह सुनते ही चन्नी भावुक हो गए थे और फोन पर ही रो पड़े थे. उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री कुल 111 दिनों तक पंजाब की सरकार चलाई, जिसमें उन्होंने खुद को 'आम आदमी दा मुख्यमंत्री' प्रोजेक्ट करते हुए बिजली और पानी के बिलों में कटौती जैसे कई लोक-लुभावन फैसले लिए.
हार के बाद 'फरार' और 2024 में बंपर वापसी
साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने चन्नी को ही सीएम का चेहरा घोषित किया था, लेकिन आम आदमी पार्टी की लहर के सामने कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. इस चुनाव में चन्नी खुद अपनी दोनों सीटों (चमकौर साहिब और भदौड़) से चुनाव हार गए. हार के तुरंत बाद चन्नी अचानक करीब 7 महीने के लिए देश से बाहर चले गए, जिसके बाद विपक्ष ने उन पर जांच एजेंसियों के डर से भागने का आरोप लगाया. उनकी इसी अनुपस्थिति के दौरान राजा वडिंग जैसे नेताओं को प्रदेश कांग्रेस में अपनी जगह बनाने का मौका मिला. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले चन्नी ने देश वापसी की और राहुल गांधी के भरोसे के चलते उन्हें जालंधर से लोकसभा का टिकट मिला, जहां से उन्होंने बंपर वोटों से जीतकर शानदार वापसी की.
क्यों अब आलाकमान के सामने अड़े हैं चन्नी?
जालंधर से बड़ी जीत के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि कांग्रेस आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव को देखते हुए चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर फिर से सीएम का चेहरा प्रोजेक्ट कर सकती है. लेकिन लंबे मंथन के बाद कांग्रेस आलाकमान ने यथास्थिति बनाए रखते हुए राजा वडिंग को ही अध्यक्ष पद पर बरकरार रखा और चन्नी को सिर्फ कैंपेन कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया.
बस यहीं से चन्नी की बगावत की शुरुआत हो गई. अब चन्नी इस जिद पर अड़ गए हैं कि राजा वडिंग को हटाकर उन्हें पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए और आगामी चुनाव के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए. चन्नी की यह मांग कांग्रेस की उस स्थापित नीति के खिलाफ है, जिसके तहत पार्टी चुनाव से पहले किसी को भी सीएम फेस घोषित नहीं करती है. चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर आजकल पंजाब कांग्रेस के कई सीनियर नेता और गुट उनके समर्थन में लामबंद हो रहे हैं, जिसने राहुल गांधी के सामने एक नया राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है.
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