Alwar Land Scam: राजस्थान के अलवर जिले का टहला क्षेत्र एक बार फिर बड़े भू-घोटाले और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण सुर्खियों में है. सरिस्का टाइगर रिजर्व से सटे इस बेहद कीमती इलाके में राजस्व अधिकारियों और भू-माफियाओं का एक बड़ा गठजोड़ सामने आया है. अदालत के आदेश के बाद टहला के तहसीलदार, कानूनगो और पटवारी के खिलाफ धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग की एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है. इन अधिकारियों पर स्थानीय गरीब किसानों को डराने, धमकाने और उनकी बेशकीमती जमीनों को जबरन सस्ते दामों पर खरीदकर दिल्ली-हरियाणा के बड़े बिल्डरों को बेचने के गंभीर आरोप लगे हैं. ताज्जुब की बात यह है कि अदालती जांच में दोषी पाए जाने और पुलिस केस दर्ज होने के बाद भी प्रशासन ने अब तक इन पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की है.
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सरिस्का और माइनिंग हब होने का मिल रहा नुकसान
पहाड़ियों के बीच बसा टहला क्षेत्र सरिस्का नेशनल पार्क के बिल्कुल नजदीक है. प्राकृतिक रूप से समृद्ध होने के कारण यह देश के बड़े उद्योगपतियों, फाइव स्टार होटलों और लग्जरी रिसॉर्ट्स के लिए पसंदीदा निवेश क्षेत्र बन चुका है.
इसके अलावा, इस इलाके में 150 से अधिक मार्बल की खदानें हैं, जहां बड़े पैमाने पर खनन कार्य होता है. जमीनों की बढ़ती व्यावसायिक कीमतों के कारण ही यहां भ्रष्ट अधिकारियों की नजरें किसानों की जमीनों पर टिक गई हैं.
साल 2021 में प्रशासन गांवों के संग अभियान के तहत गलत तरह से टहला क्षेत्र की 2500 बीघा जमीन 803 लोगों के नाम आवंटित की गई. इस जमीन का मूल्य करीब 1500 करोड रुपए रखा गया. जमीन नदी नाले पहाड़ से लेकर शिवायचक क्षेत्र कि थी. जिनका आवंटन नहीं हो सकता है. लेकिन गलत तरह से जमीन का आवंटन किया गया. तत्कालीन जिला कलेक्टर ने 470 बीघा जमीन का आवंटन तुरंत प्रभाव से निरस्त किया और 35 खातेदारी भी निरस्त की गई. इस मामले में 25 अधिकारी व कर्मचारियों को चार्जशीट दी गई.
रातों-रात जमीनों के इस खेल में यह मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि उससे पहले ही टहला क्षेत्र में एक बार फिर से जमीनों के खेल का मामला सामने आया है. इस बार टहला तहसीलदार पर जमीन की खरीद फरोक्त करने की गंभीर आरोप लगे है.
सिर्फ 8 दिनों में नामंजूरी, रजिस्ट्री और करोड़ों का सौदा
राजगढ़ के अधिवक्ता कैलाश चंद्र भारद्वाज ने इस सिंडिकेट के काम करने के तौर-तरीकों का खुलासा किया है. उन्होंने बताया कि तहसीलदार एक सरकारी अधिकारी के बजाय किसी कमर्शियल प्रॉपर्टी डीलर की तरह काम कर रहे हैं.
उदाहरण के तौर पर, खसरा नंबर 1739, 1745, 1771 और 1772 की जमीनों का पुराना आवंटन तहसीलदार ने 26 नवंबर 2025 को निरस्त (Cancel) कर दिया. इसके महज पांच दिन बाद, 1 दिसंबर 2025 को इस कीमती जमीन की रजिस्ट्री गुपचुप तरीके से एक सुरक्षा गार्ड के नाम कर दी गई. इसके ठीक तीन दिन बाद, 4 दिसंबर 2025 को उसी सुरक्षा गार्ड के नाम से यह जमीन हरियाणा के एक बड़े कारोबारी गौरव को करोड़ों रुपये में बेच दी गई. ऐसे सैकड़ों मामले इस क्षेत्र में लगातार सामने आ रहे हैं.
सरकारी नियम ताक पर, जबरन कब्जा दिलाने के लिए चलाई जेसीबी
प्रशासनिक तानाशाही का सबसे ताजा उदाहरण रूपबास गांव का है. यहां एक विवादित जमीन पर खुद तहसीलदार और लोसल पटवारी ने जनवरी 2025 में कोर्ट को रिपोर्ट दी थी कि मौके पर खातेदार का कब्जा नहीं है.
नियमों के मुताबिक ऐसे मामलों में बेदखली (Eviction) का केस चलाया जाना चाहिए था. लेकिन राजगढ़ की उपखंड अधिकारी (SDM) सीमा मीना और टहला तहसीलदार प्रवीण दहिया ने सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर फरवरी 2026 में आनन-फानन में पत्थरगढ़ी का नया केस दर्ज किया और सिर्फ 7 दिनों में आदेश भी पारित कर दिया.
हद तो तब हो गई जब 15 मई 2026 को तहसीलदार प्रवीण दहिया खुद जेसीबी, ट्रैक्टर और भारी पुलिस बल लेकर मौके पर पहुंच गए और वहां लगे गेट को तोड़कर जबरन कब्जा दिलवा दिया, जो कि पत्थरगढ़ी के किसी नियम में शामिल नहीं है.
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि तहसीलदार ने उन्हें धमकी देते हुए कहा कि 'शिकायतें वापस ले लो और सोमवार को आकर सेटलमेंट कर लो, क्योंकि इस जमीन का सौदा पहले ही 38 लाख रुपये प्रति बीघा के हिसाब से आगे हो चुका है.' स्थानीय ग्रामीणों ने इस पूरे खेल की रजिस्ट्री, खातेदारी और एफआईआर के दस्तावेजी प्रमाण मीडिया को सौंपे हैं, जिससे साफ है कि सरकार की नाक के नीचे करोड़ों का खेल चल रहा है.
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