1 लाख के इंजेक्शन में दवा की जगह निकला पानी! कैंसर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ का बड़ा खुलासा, 17 गिरफ्तार

शरद मलिक

• 11:30 AM • 27 Aug 2026

कैंसर के जिस इंजेक्शन को मरीज 1 लाख रुपये में जीवनरक्षक समझकर खरीद रहे थे, जांच में उसमें दवा की जगह पानी और खतरनाक 'ई. कोलाई' बैक्टीरिया भरा मिला. इस जानलेवा फर्जीवाड़े के तार राजस्थान के सरकारी अस्पतालों से जुड़ रहे हैं, जिसमें दिल्ली पुलिस 9 करोड़ के रैकेट का भंडाफोड़ कर 17 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है.

प्रतीकात्मक तस्वीर
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राजस्थान के बीकानेर से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बेहद महंगी जीवनरक्षक दवाओं को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है. अस्पतालों में दिए जाने वाले महंगे एंटी-कैंसर 'इवालोमैब' (Nivolumab / Avelumab) इंजेक्शन [00:48] की जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि जिन शीशियों (vials) को लाखों रुपये में मरीजों को बेचा जा रहा था, उनमें दवा की जगह सिर्फ पानी भरा था. इतना ही नहीं, लैब जांच में इनमें इंसानी शरीर के लिए घातक 'ई. कोलाई' (E. Coli) जैसे बैक्टीरिया भी पाए गए हैं. 

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जर्मनी की लैब जांच से हुआ खौफनाक खुलासा

बीकानेर कैंसर अस्पताल से जुड़े इस संदिग्ध इंजेक्शन मामले की जब राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (RMACL) और ड्रग विभाग द्वारा जांच कराई गई, तो इसके सैंपल जर्मनी की लैब में भेजे गए थे. रिपोर्ट में पाया गया कि ब्लैक मार्केट में बेचे जा रहे इन इंजेक्शनों में कैंसर रोधी दवा का मुख्य एक्टिव इंग्रेडिएंट (Active Ingredient) पूरी तरह गायब था. मरीज और उनके परिजन जिन दवाओं को जिंदगी बचाने की उम्मीद में भारी-भरकम खर्च उठाकर खरीद रहे थे, वे असल में केवल पानी की शीशियां थीं.

कैसे काम कर रहा था यह काला कारोबार?

जांच में सामने आया है कि सरकारी सप्लाई के तहत अस्पतालों में आने वाले इस महंगे इंजेक्शन की खाली शीशियों को चुरा लिया जाता था या गैर-कानूनी तरीके से बाहर निकाला जाता था. इसके बाद केमिकल्स की मदद से शीशियों पर लिखे बैच नंबर और अन्य डिटेल्स मिटा दी जाती थीं. फिर उनमें पानी भरकर और नकली पैकेजिंग कर उन्हें ब्लैक मार्केट में लगभग 1-1 लाख रुपये तक में बेचा जा रहा था. 

सरकारी अस्पतालों से सस्ती सप्लाई का झांसा देकर इसे दिल्ली तक के मरीजों को सप्लाई किया जा रहा था. 

दिल्ली क्राइम ब्रांच का एक्शन

इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने भी बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है. करीब 9 करोड़ रुपये के इस फर्जीवाड़े में पुलिस ने अब तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया है. आरोपियों के पास से भारी मात्रा में एंटी-कैंसर दवाओं की खाली शीशियां, फर्जी बॉक्स और लाखों रुपये कैश बरामद हुए हैं. 

अस्पताल प्रशासन और अधिकारियों का क्या कहना है?

मामले में बीकानेर, जयपुर, जोधपुर और उदयपुर मेडिकल कॉलेजों से जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई है. बीकानेर अस्पताल प्रशासन के अनुसार:

"2025 में हमारे पास सरकारी सप्लाई के तहत 600 इंजेक्शन आए थे. हमने अपने स्तर पर वेयरहाउस और सब-स्टोर के रिकॉर्ड्स की जांच की है, जिसमें रजिस्टर के हिसाब से कोई गड़बड़ी नहीं मिली है. RMACL की तीन सदस्यीय टीम भी जांच करके गई है. फिलहाल उच्च स्तरीय जांच जारी है और पूरा यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट तैयार कर सरकार को भेजा जा रहा है."

उठते गंभीर सवाल

यह सिर्फ दवाओं की कालाबाजारी का मामला नहीं है, बल्कि इलाज करा रहे लाचार मरीजों की जिंदगी के साथ सीधा खिलवाड़ है. राजस्थान का ड्रग कंट्रोल सिस्टम और अस्पताल की निगरानी व्यवस्था कहां सो रही थी कि सरकारी सप्लाई की दवाइयां बाहर निकल गईं और नकली वर्जन मरीजों तक पहुंच गए?

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