बाबा श्याम की अनोखी दीवानगी, 1000 कीलों पर लेटकर दंडवत यात्रा कर रहे अलवर के नितेश

अलवर के युवक नितेश ने खाटू श्याम के दर्शन के लिए 160 किलोमीटर की दंडवत यात्रा शुरू की है. वह 1000 नुकीली कीलों वाले फट्टे पर लेटकर यह सफर तय कर रहे हैं. करीब डेढ़ महीने की इस यात्रा में परिवार और दोस्त भी साथ हैं. यह आस्था की अनोखी मिसाल है.

Khatu Shyam devotee
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हिमांशु शर्मा

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राजस्थान के अलवर से आस्था की एक अनोखी कहानी सामने आई है. यहां के रहने वाले युवक नितेश ने खाटू श्याम जी के दर्शन के लिए 160 किलोमीटर लंबी दंडवत यात्रा शुरू की है. यह यात्रा इसलिए खास है क्योंकि वह 1000 नुकीली लोहे की कीलों से बने फट्टे पर लेटकर आगे बढ़ रहे हैं.

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नितेश ने अपनी यात्रा की शुरुआत गुरुवार को अलवर के शिवाजी पार्क स्थित खाटू श्याम मंदिर से की. अनुमान है कि वह यह सफर करीब डेढ़ महीने में पूरा करेंगे. इस कठिन यात्रा में उनके साथ परिवार और दोस्तों के करीब 15 लोग भी पैदल चल रहे हैं.

दूसरी बार कर रहे हैं ऐसी यात्रा

यह पहली बार नहीं है जब नितेश इस तरह की दंडवत यात्रा कर रहे हैं. पिछले साल उन्होंने 501 कीलों वाले फट्टे पर लेटकर यह यात्रा पूरी की थी. इस बार उन्होंने अपनी आस्था को और मजबूत करते हुए कीलों की संख्या बढ़ाकर 1000 कर दी है. इसके लिए करीब 3 फीट चौड़ा खास लकड़ी का फट्टा तैयार करवाया गया है.

आस्था की शुरुआत कैसे हुई

नितेश बताते हैं कि करीब 5 साल पहले तक वह बाबा श्याम के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे. लेकिन एक कठिन समय में उन्होंने दोस्तों के साथ रिंगस से पैदल यात्रा कर निशान लेकर खाटू श्याम मंदिर में दर्शन किए. उसी समय से उनकी आस्था गहरी हो गई और उन्होंने यह कठिन मार्ग अपनाया.

“दर्द महसूस नहीं होता”

नितेश का कहना है कि इस यात्रा के दौरान उन्हें किसी तरह की पीड़ा का एहसास नहीं होता. वह इसे बाबा श्याम की कृपा मानते हैं. उनका कहना है कि श्रद्धा ही उन्हें यह ताकत देती है.

शुरुआत में परिवार ने इस तरह की जोखिम भरी यात्रा का विरोध किया था. लेकिन बाद में नितेश की आस्था को देखते हुए सभी मान गए. अब परिवार के सदस्य भी उनके साथ इस यात्रा में शामिल हैं और हर कदम पर सहयोग कर रहे हैं.

खर्च खुद उठाते हैं

यात्रा के दौरान खाने-पीने और ठहरने की व्यवस्था करना आसान नहीं होता. इसके बावजूद नितेश किसी से आर्थिक मदद नहीं लेते. हालांकि, अगर कोई स्वेच्छा से सहायता करता है तो उसे स्वीकार कर लेते हैं. पूरी यात्रा का खर्च वह खुद ही उठाते हैं.

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