'दर्द और अनिश्चितता की जिंदगी कैसे जिएं' कोटा के मेडिकल कॉलेज में इच्छामृत्यु पर अड़ीं 5 प्रसूताएं, डायलिसिस कराने से किया इनकार

चेतन गुर्जर

• 05:28 PM • 15 Jul 2026

Kota Medical College: कोटा न्यू मेडिकल कॉलेज में भर्ती पांच प्रसूताओं ने कथित नकली दवाओं से किडनी खराब होने के आरोपों के बीच इच्छामृत्यु की मांग कर दी है. 70 दिनों से डायलिसिस करा रहीं इन महिलाओं ने प्रशासन को अल्टीमेटम देने के बाद इलाज कराने से भी इनकार कर दिया है। जानिए पूरा मामला, पीड़िताओं का दर्द, अस्पताल प्रशासन का पक्ष, किडनी ट्रांसप्लांट पर डॉक्टरों की राय और इस पूरे विवाद की ताजा अपडेट.

Kota Hospital News
Kota Hospital News
Google CTA

पेट में पल रहे बच्चे के साथ न जाने कितने सपने संजोएं बैठी कोटा के मेडिकल कॉलेज की 5 प्रसूताएं अब इच्छामृत्यु पर अड़ी हुई हैं. अब उनका धैर्य टूटने लगा है. उन्होंने सोमवार को जिला प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था. तय समय तक जिला प्रशासन कोई ठोस जवाब नहीं दे पाया. अब इन महिलाओं ने डायलिसिस कराने से इनकार कर दिया है. इनका कहना है कि ये लगातार दर्द और अनिश्चितता के साथ जिंदगी नहीं जी सकतीं हैं. यदि सरकार उनकी किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करवा सकती तो उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए. ध्यान देने वाली बात है कि कथित नकली दवाओं से प्रसूताओं के किडनी खराब होने के आरोपों के बीच इनका इलाज पिछले 70 दिनों से कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज में चल रहा है. 

Read more!

सोमवार को पांचों प्रसूताओं और उनके परिजनों ने जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपा था. ज्ञापन में प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए उन्होंने मांग की गई थी कि किडनी ट्रांसप्लांट पर तुरंत निर्णय लिया जाए. पीड़िताओं के परिवारों ने चेतावनी दी थी कि यदि तय समय में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो महिलाएं डायलिसिस करवाना बंद कर देंगी. वहीं 48 घंटे की अवधि खत्म होने के बाद उन्होंने डायलिसिस कराना बंद कर दिया है. उनकी मांग है कि हर रोज दर्द सहने और अनिश्चितता की जिंदगी जीने से बेहतर है कि उन्हें मौत दे दी जाए. परिजनों का कहना है कि अब दर्द, मानसिक तनाव और अनिश्चित भविष्य के साथ जीना संभव नहीं रहा. 

आरोप- नकली दवाओं और लापरवाही से खराब हुई किडनी

पीड़ित परिवारों का आरोप है कि 4 से 8 मई 2026 के बीच प्रसव के लिए न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती होने के दौरान अस्पताल की कथित लापरवाही और कथित नकली दवाओं के इस्तेमाल के कारण महिलाओं की दोनों किडनियां खराब हो गईं. इसी कारण पिछले करीब 70 दिनों से उन्हें हर दो-तीन दिन में डायलिसिस कराना पड़ रहा है. अब तो अस्पताल ही घर बन गया है. रागिनी मीणा, आरती चौबदार, पिंकी ऐरवाल, सुशीला महावर और धन्नी सुमन पिछले दो महीने से अधिक समय से अस्पताल में भर्ती हैं. परिवारों का कहना है कि घर लौटने की उम्मीद हर दिन कमजोर होती जा रही है. इलाज तो जारी है, लेकिन भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा. 

पीड़िताओं का छलका दर्द, रोते हुए बोलीं- घर कब जाएंगे? 

घर में नया मेहमान आएगा. धीरे-धीरे अपने बच्चे को बड़ा होते देखूंगी. कहीं पिता तो कहीं दादा-दादी तो कहीं चाचा और बुआ हर रोज सपने बुन रहे थे. गर्भवती का खास ख्याल रखा जा रहा था, लेकिन 4 मई से 8 मई के बीच कोटा के जेके लोन शिशु अस्पताल और न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इन परिवारों का सपना टूट कर बिखर गया. डिलीवरी तो हुई पर प्रसूताओं की जिंदगी दांव पर लग गई. 12 महिलाओं की हालत गंभीर हो गई. 5 की मौत ने परिवार वालों को झकझोर कर रख दिया. 2 को इलाज के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. वहीं 5 महिलाओं की किडनी फेल हो गई. अब भी अस्पताल में ही हैं और पिछले 70 दिनों से डायलिसिस करा रही हैं. परिवार टूटने लगा है. उम्मीदें नाउम्मीद होने लगी हैं. परिवार का आरोप है कि गलत दवाओं और इलाज में लापरवाही की नतीजा अब वे भुगत रहे हैं. किडनी ट्रांसप्लांट होगा कि नहीं और कब होगा इसपर सरकार कुछ बोल नहीं रही है. 

राजस्थान तक जब अस्पताल पहुंचा तो इन प्रसूताओं का दर्द छलक गया. वो रो-रोकर अपनी अपबीती बताने लगीं. 

कब तक डायलिसिस कराएंगे, हमारी जान ही ले लीजिए- धन्नी सुमन

गभर्वती धन्नी सुमन तब डिलवरी के लिए अस्पताल आईं थीं तब उन्हें क्या पता था कि उनके जीवन में काले बादल घिरने वाले हैं. डिलीवरी के बाद उनकी हालत बिगड़ गई. उनकी दोनों किडनी फेल हो गई. धन्नी 4 मई से अस्पताल में भर्ती हैं. 70 दिन बीत चुके हैं. घर कब जाएंगी. कब वो जिंदगी वापस पाएंगी उसकी उम्मीद अब टूटने लगी है. धन्नी कहती हैं- अब तो डॉक्टर भी घर जाकर डायलिसिस करवाने की सलाह दे रहे हैं. प्रशासन को ज्ञापन दे चुकी हैं पर कोई सुनवाई नहीं है. कोई सुधबुध तक लेने नहीं आया. अब धैर्य ने जवाब दे दिया है इसलिए डॉयलिसिस कराने से इन्होंने मना कर दिया है. अब धन्नी इच्छामृत्यु की मांग की रही हैं. 

डायलिसिस के बाद तेज बुखार, उल्टी होती है- पिंकी ऐरवाल

राजस्थान तक से बातचीत के दौरान पिंकी की आंखें छलक गईं. उन्होंने बताया कि हर सप्ताह तीन बार डायलिसिस करानी पड़ती है. इसके बाद तेज बुखार, उल्टी, चक्कर और कमजोरी हो जाती है. दो महीने से अधिक समय से अस्पताल में भर्ती हैं और अब यूरिन भी नहीं आ रहा. पिंकी ने रोते हुए कहा-  "मुझे अब डायलिसिस नहीं करवानी। हर बार इतनी तकलीफ होती है कि सहन नहीं होता.'

डायलिसिस का दर्द अब सहन नहीं होता- सुशीला महावर

अस्पताल में भर्ती एक प्रसूता सुशीला महावर ने बताया कि वह 3 मई से वहां हैं.लगातार डायलिसिस का दर्द अब सहन नहीं हो रहा. उनका कहना है कि सरकार उनकी किडनी ट्रांसप्लांट कराए, क्योंकि रोज-रोज इस पीड़ा से गुजरना मौत से भी ज्यादा दर्दनाक है. उन्होंने कहा, "तड़प-तड़प कर जीने से अच्छा है मौत आ जाए, लेकिन अब डायलिसिस नहीं करवाऊंगी."

पीड़िताओं की भावुक अपील

पीड़िताओं का कहना है कि वे दवाइयों और डायलिसिस के सहारे जिंदगी काट रही हैं. घर से दूर अस्पताल में हैं. उनकी इच्छा सिर्फ इतनी है कि वे स्वस्थ्य होकर अपने घर बच्चों और परिवार के पास लौट सकें. 

बच्चा जन्म के बाद से अस्पताल में है

एक महिला ने कहा कि उसका बच्चा जन्म के बाद से अस्पताल में है. वह अब तक उसे ठीक से देख भी नहीं पाई हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उनके साथ कुछ हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. महिलाओं ने कहा कि यदि सरकार उनकी किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करवाएगी तो वे राष्ट्रपति के नाम पत्र भेजेंगी. 

न्यू मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन का कहना है कि पांचों महिलाओं की स्थिति फिलहाल स्थिर है और आवश्यकता के अनुसार डायलिसिस की जा रही है. उन्होंने कहा कि अभी यह बताना संभव नहीं है कि डायलिसिस कितने समय तक चलेगी. जब तक किडनी पूरी तरह रिकवर नहीं होती, तब तक डायलिसिस आवश्यक है. डॉ. जैन ने बताया कि इन महिलाओं को अस्पताल में भर्ती रहने की चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं है. अधिकांश मरीज घर से आकर डायलिसिस करवाते हैं. यदि ये महिलाएं भी चाहें तो घर से आकर डायलिसिस करवा सकती हैं, लेकिन उनकी इच्छा अस्पताल में भर्ती रहने की है और अस्पताल को इससे कोई आपत्ति नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया के माध्यम से उन्हें जानकारी मिली है कि महिलाएं डायलिसिस बंद करना चाहती हैं. यदि ऐसा होता है तो उनकी जान बचाने के लिए प्रशासन को अवगत कराया जाएगा. 

किडनी ट्रांसप्लांट पर क्या बोले डॉक्टर?

डॉ. जैन ने कहा कि चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार किडनी ट्रांसप्लांट पर निर्णय लेने से पहले तीन से छह महीने तक इंतजार करना पड़ता है. अभी यह कहना संभव नहीं है कि ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होगी या नहीं. उन्होंने बताया कि पांचों महिलाओं को पिछले लगभग 20 दिनों से डिस्चार्ज किया जा सकता है और वे घर से आकर डायलिसिस करवा सकती हैं. इलाज पूरी तरह मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत नि:शुल्क चल रहा है और आगे भी मरीजों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. डॉ. जैन ने महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि उनकी हालत पहले की तुलना में काफी बेहतर है और अस्पताल आगे भी उनका पूरा इलाज करता रहेगा.