राजस्थान के बाड़मेर जिले से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है, जहां अन्न उगाने वाले खेतों से अब मिट्टी की नहीं बल्कि कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की गंध आ रही है. मानसून की पहली बारिश के साथ जिन खेतों में कुछ दिनों बाद बाजरा, ग्वार और मूंग की फसलें लहलहानी थीं, वहां आज दूर-दूर तक काला क्रूड ऑयल फैला हुआ है. स्थानीय किसानों का आरोप है कि तेल कंपनी की पाइपलाइन बार-बार लीक हो रही है, जिससे उनकी उपजाऊ जमीन हमेशा के लिए बंजर होने की कगार पर पहुंच गई है.
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किसी रिफाइनरी जैसी दिखने लगीं खेत की तस्वीरें
यह पूरा मामला बाड़मेर जिले के पोथिया जागीर गांव का है. गांव के खेतों की तस्वीरें देखकर ऐसा लगता है जैसे यह कोई खेत नहीं बल्कि ऑयल रिफाइनरी का हिस्सा हो. ग्रामीणों के मुताबिक, भाग्यम वेलपैड 12 के पास से गुजर रही पाइपलाइन में अचानक भीषण लीकेज हो गया. रात ही रात में हजारों लीटर कच्चा तेल बहकर कई बीघा खेतों में फैल गया. मानसून की तैयारियों में जुटे किसानों की मेहनत और उम्मीदें कुछ ही घंटों में मलबे और काले तेल में तब्दील हो गईं.
मुआवजे के नाम पर महज 3000 रुपये
पाइपलाइन फटने की सूचना मिलने पर तेल कंपनी के अधिकारी मौके पर पहुंचे और जमीन का नाप-जोख (मेजरमेंट) किया. हालांकि, किसानों का आरोप है कि कंपनी नुकसान के बदले महज 3,000 का मुआवजा देने की बात कह रही है. किसानों का कहना है कि इतने कम पैसों में उनके बर्बाद हुए खेत कैसे ठीक होंगे? क्या यह बंजर हो चुकी जमीन फिर से कभी उपजाऊ बन पाएगी?
मांगने पर दी जाती है पुलिस की धमकी
ग्रामीणों और प्रभावित किसानों का दर्द है कि यह समस्या कोई नई नहीं है. साल 2009 में जब से जमीन का अधिग्रहण हुआ है तब से लेकर अब तक कई बार पाइपलाइन फटने और तेल रिसने की घटनाएं हो चुकी हैं. हर बार नुकसान सिर्फ गरीब किसान का होता है. किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे अपनी आवाज उठाते हैं या उचित मुआवजे की मांग करते हैं तो कंपनी के कुछ अधिकारी उन्हें पुलिस बुलाने और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर चुप कराने की कोशिश करते हैं.
किसानों की मुख्य मांगें
अब पीड़ित किसानों की सरकार और प्रशासन से केवल तेल के रिसाव को रोकने की मांग नहीं है, बल्कि उनकी साफ और स्पष्ट मांगें हैं. खेतों को हुए वास्तविक नुकसान का सही आकलन कर पूरा मुआवजा दिया जाए. तेल कंपनी अपनी तकनीक और खर्च पर इस दूषित मिट्टी को साफ करे और इसे दोबारा खेती के लायक बनाए. बार-बार होने वाले इस लीकेज को रोकने के लिए पुरानी पाइपलाइनों को बदला जाए ताकि भविष्य में किसानों की आजीविका पर संकट न आए.
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