राजस्थान में 'घोस्ट यूनिवर्सिटी' का खेल, आलीशान दफ्तर और करोड़ों का बजट, लेकिन पढ़ने वाला एक भी छात्र नहीं!

राजस्थान में चुनाव से पहले यूनिवर्सिटी खोलने का राजनीतिक ट्रेंड चल रहा है. यहां ऐसी कई 'घोस्ट यूनिवर्सिटी' हैं जहां करोड़ों रुपये का बजट, आलीशान ऑफिस और कुलगुरु (VC) तो हैं, लेकिन कैंपस, स्टाफ और छात्रों का नामोनिशान नहीं है. जनता के टैक्स के पैसे की इस बर्बादी पर राज्यपाल भी सवाल उठा चुके हैं.

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शरत कुमार

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देश में फर्जी कॉलेज और शिक्षा माफिया की खबरें तो आम हैं लेकिन अगर खुद सरकार ही ऐसी यूनिवर्सिटी चलाने लगे जहां न छात्र हों, न क्लास और न ही कोई कैंपस, तो आप क्या कहेंगे? राजस्थान से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां कई विश्वविद्यालय सिर्फ कागजों और किराए के कमरों में चल रहे हैं. करोड़ों रुपये का बजट ठिकाने लगाया जा रहा है, अफसरों को मोटी सैलरी मिल रही है, लेकिन पढ़ाई का नामोनिशान नहीं है.

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Rajasthan Tak के संवाददाता शरद कुमार ने ग्राउंड रिपोर्ट पर जाकर देखा तो  राजस्थान की इन 'घोस्ट यूनिवर्सिटीज' (Ghost Universities) की हकीकत सामने आई है, जो सरकारी दावों की पोल खोल कर रख रही है.

जयपुर के शिक्षा संकुल में खुला खेल

जयपुर के शिक्षा संकुल में कदम रखते ही माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के दफ्तर के बाहर एक साथ तीन-तीन विश्वविद्यालयों के बोर्ड टंगे दिखते हैं. बाबा आमटे दिव्यांग विश्वविद्यालय, विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय और हरदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय. कागजों में तो इनका इतिहास लिखा जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि इन कमरों में सिर्फ एसी चल रहे हैं, कुर्सियां लगी हैं, मगर छात्र गायब हैं.

4 कमरों में देश की सबसे बड़ी दिव्यांग यूनिवर्सिटी!

अशोक गहलोत सरकार ने साल 2023 के चुनाव से ठीक पहले बड़े-बड़े वादे करके बाबा आमटे दिव्यांग विश्वविद्यालय की घोषणा की थी. दावा था कि यह देश का सबसे बड़ा दिव्यांग विश्वविद्यालय बनेगा. जामदोली में 10 एकड़ जमीन भी दी गई. लेकिन 3 साल बाद भी जमीन पर न तो कोई कैंपस बना और न ही कोई छात्र आया.

हैरानी की बात यह है कि इस यूनिवर्सिटी के पास खुद के कुलगुरु (VC) तक नहीं हैं. डॉ. देव स्वरूप उधार के कुलगुरु के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं (वह एक अन्य यूनिवर्सिटी के भी वीसी हैं). जब कैमरे पर उनसे सवाल पूछा गया कि यूनिवर्सिटी में क्या काम हो रहा है और कितने छात्र हैं, तो वह जवाब देने से बचते नजर आए.

बिना छात्र के 3 करोड़ से ज्यादा फूंक दिए

भले ही इस दिव्यांग यूनिवर्सिटी में एक भी छात्र ने एडमिशन न लिया हो, लेकिन खर्चों में कोई कमी नहीं आई. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस कागजी यूनिवर्सिटी पर 3 करोड़ 27 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. इसमें से ढाई करोड़ रुपये सिर्फ वेतन और भत्तों में गए हैं. इसके अलावा 20 लाख रुपये गाड़ियों पर, 7.5 लाख रुपये आवास पर और लाखों रुपये एसी व आलीशान फर्नीचर पर उड़ा दिए गए. वहां मौजूद कर्मचारियों को खुद नहीं पता कि उनका असल काम क्या है.

सिंगापुर मॉडल का दावा, 18 साल बाद भी हाल बेहाल

ऐसा ही हाल विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय का भी है. साल 2008 में वसुंधरा राजे सरकार ने सिंगापुर मॉडल पर देश की सबसे बड़ी स्किल यूनिवर्सिटी बनाने का सपना दिखाया था. दावा था कि यहां 138 स्किल कोर्स शुरू होंगे. लेकिन 18 साल बीत जाने के बाद भी यहां न तो कोई परमानेंट स्टाफ है और न ही छात्र. यह यूनिवर्सिटी सिर्फ 8 लोगों के भरोसे चल रही है, जिनमें से ज्यादातर रिटायर्ड लोग या संविदा कर्मचारी हैं. यहां काम के नाम पर सिर्फ कागजी अनुमति पत्र जारी होते हैं.

14 साल से कागजों में दौड़ रही स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी

यही कहानी शेखावाटी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी की भी है. साल 2012 में अशोक गहलोत ने इसकी घोषणा की थी. इसके वाइस चांसलर जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम के एक दफ्तर में बैठते थे और वहीं से रिटायर भी हो गए, लेकिन यूनिवर्सिटी की एक ईंट तक नहीं रखी गई. अब राजस्थान की मौजूदा भजनलाल शर्मा सरकार ने एक और नई स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी 'महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी' का एलान कर दिया है, जिसका काम अभी शुरू होना बाकी है. यानी पुरानी यूनिवर्सिटी कागजों से बाहर नहीं आई और नई की घोषणा हो गई.

खुद राज्यपाल भी उठा चुके हैं सवाल

इस पूरी अव्यवस्था पर राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ वागड़े भी सार्वजनिक मंच से चिंता जाहिर कर चुके हैं. उन्होंने साफ कहा था कि राज्य में ऐसे विश्वविद्यालय चल रहे हैं जहां दो-दो, तीन-तीन साल से एक भी नामांकन (Admission) नहीं हुआ है. वहां सिर्फ एक वीसी और एक रजिस्ट्रार बैठकर सैलरी उठा रहे हैं. राज्यपाल ने इन्हें बंद करने या दूसरी यूनिवर्सिटी में मर्ज करने की सलाह दी थी, लेकिन वोट बैंक और राजनीतिक डर के कारण नेता इस पर कदम उठाने से कतराते हैं.

सियासी फायदे के लिए जनता के पैसे की बर्बादी

राजस्थान में चुनाव से ठीक पहले यूनिवर्सिटीज की घोषणा करना अब एक राजनीतिक ट्रेंड बन चुका है. सरकारें आती हैं, घोषणाएं करती हैं, अपने चहेते लोगों को कुलगुरु की कुर्सी पर बैठाती हैं और बजट जारी कर देती हैं. लेकिन जमीन पर छात्रों के भविष्य और जनता के टैक्स के पैसे के साथ सिर्फ खिलवाड़ हो रहा है.

 

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