राजस्थान के कई इलाकों में सदियों से चली आ रही 'आटा-साटा' प्रथा (लड़की के बदले लड़की की शादी) को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने इस कुप्रथा को सामाजिक अभिशाप बताते हुए कहा कि यह शादियों के नाम पर शुद्ध रूप से सौदेबाजी और पारिवारिक दबाव है, जिसमें लड़कियों की सहमति को पूरी तरह दबा दिया जाता है.
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क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला बीकानेर से जुड़ा है. साल 2016 में दो परिवारों ने 'आटा-साटा' प्रथा के तहत अपने बेटे-बेटियों की शादी एक ही दिन तय की थी. इसमें से एक लड़की नाबालिग थी, इसलिए उसे ससुराल नहीं भेजा गया. जब वह बालिग हुई, तो उसने इस जबरन शादी को मानने से साफ इनकार कर दिया.
लड़की के इस फैसले का असर दूसरे परिवार पर पड़ा. सौदे के तहत ब्याही गई दूसरी महिला को प्रताड़ित किया जाने लगा, दहेज के ताने दिए गए और आखिरकार उसे घर से निकाल दिया गया. जब पीड़ित महिला ने तलाक की मांग की तो फैमिली कोर्ट ने इसे परिवार के खिलाफ कड़ा कदम माना. लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए पीड़िता के हक में फैसला सुनाया.
हाईकोर्ट ने की तीखी टिप्पणी!
हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग लड़कियों के मामले में 'आटा-साटा' एक बंधक जैसी व्यवस्था बन जाती है. कोर्ट ने दुख जताते हुए कहा कि इस प्रथा में बेटियों को इंसान नहीं बल्कि किसी सौदे या लेनदेन की वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है. कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई महिला अपने खिलाफ हो रहे अत्याचार के खिलाफ कानून की मदद लेती है तो इसे उसके खिलाफ सबूत नहीं माना जा सकता.
क्यों खतरनाक है आटा-साटा प्रथा?
इस कुप्रथा का सबसे काला सच यह है कि इसमें अगर एक शादी टूटती है तो दूसरी शादी अपने आप खतरे में पड़ जाती है. कई बार छोटी उम्र की लड़कियों की शादी बड़ी उम्र के पुरुषों से सिर्फ इसलिए कर दी जाती है ताकि भाई का घर बस सके. इससे लड़कियों की पढ़ाई छूट जाती है, उनके सपने टूट जाते हैं और वे घरेलू हिंसा व मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं.
कानून क्या कहता है?
भारत में बाल विवाह रोकने के लिए साल 2006 में कानून बना था, जिसके तहत नाबालिग की शादी कराने पर 2 साल की जेल और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना है. हालांकि, 'आटा-साटा' प्रथा को रोकने के लिए अभी तक कोई अलग से सख्त कानून नहीं बन पाया है, जिससे यह प्रथा आज भी समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
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