शादी में न हल्दी, न मेहंदी...सिर्फ 5 तोला सोना मंजूर! नागौर में जाट समाज के पंच-पटलों ने बनाए ये 8 नियम!

राजस्थान के नागौर में जाट समाज ने फिजूलखर्ची रोकने के लिए ऐतिहासिक फैसला लिया है. अब शादियों में अधिकतम 5 तोला सोना ही दिया जाएगा. इसके साथ ही मृत्युभोज, खर्चीले मायरे और हल्दी-मेहंदी जैसी रस्मों पर रोक के लिए नियम तय किए हैं.

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Kesh Ram

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Nagaur Jat Samaj Decision: राजस्थान में इन दिनों शादियों में बढ़ते खर्च और करोड़ों के मायरे चर्चा में हैं. इसी बीच नागौर जिले के रियां बड़ी क्षेत्र के पादूकलां गांव में जाट समाज ने बड़ा सामाजिक निर्णय लिया है. समाज की बैठक में तय किया गया कि अब शादियों और अन्य मांगलिक कार्यक्रमों में फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जाएगी.

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शिवरात्रि के अवसर पर आयोजित बैठक में सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया. इस दौरान समाज के पंच पटेलों ने कहा कि दिखावे की होड़ के कारण लोग कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं. ऐसे में सादगी को बढ़ावा देना जरूरी है.

5 तोला सोने की सीमा तय

बैठक में निर्णय लिया कि शादी में दूल्हे को अधिकतम 5 तोला सोना ही दिया जाएगा. वहीं ससुराल पक्ष भी दुल्हन को अधिकतम 5 तोला सोने के आभूषण ही देगा. इससे ज्यादा सोना देने या लेने पर रोक रहेगी.

हल्दी-मेहंदी की रस्म पर रोक

समाज ने शादी की रस्मों को सीमित करने का भी फैसला किया है. हल्दी और मेहंदी की रस्म को या तो पूरी तरह बंद किया जाएगा या बहुत सादगी से किया जाएगा. उद्देश्य खर्च को कम करना है.

मायरे में भी सादगी

मायरे की परंपरा में भी बदलाव किया गया है. अब परिवार के नजदीकी सदस्यों के अलावा अन्य लोगों को कपड़े देने की जगह 250 रुपए या अपनी इच्छा अनुसार सीमित राशि देने पर विचार किया गया है.

इसके साथ ही बहन-बेटी द्वारा मायरे में वापस कपड़े, लवाणा (हरीटी) और नकद राशि लेने की प्रथा भी समाप्त की जाएगी.

बर्तन बांटने की परंपरा खत्म

विवाह के दौरान बहन, बेटी और अन्य परिजनों द्वारा बर्तन बांटने की परंपरा को भी बंद करने का निर्णय लिया गया है.

मकान के मुहूर्त पर कपड़े लेने-देने की परंपरा बंद की जाएगी. बत्तीसी, सावा लिवाड़ और जिलाई जैसे अवसरों पर भारी नाश्ते की जगह केवल चाय और गुड़ परोसने का निर्णय हुआ है.

रात्रि भोज में कपड़े और महंगे उपहार देने की जगह महिलाओं को प्रतीक स्वरूप पतासा देने की परंपरा शुरू की जाएगी.

मृत्युभोज में भी बड़ा बदलाव

समाज ने मृत्युभोज में भी सादगी अपनाने का फैसला किया है. परिवार में सास, ससुर, बुआ, फूफा, बहन या बहनोई की मृत्यु पर केवल गांव स्तर की बैठक होगी. इसमें कपड़े और भोजन की व्यवस्था नहीं की जाएगी.

मृत्युभोज में कपड़ों की जगह लिफाफे में 200 रुपए देने की नई परंपरा शुरू होगी. नारियल के साथ नकद राशि देने की पुरानी परंपरा बंद की जाएगी.

क्यों लिया गया यह फैसला?

सरपंच प्रतिनिधि मदन गोरा ने बताया कि आज के समय में सोना-चांदी की कीमतें आसमान छू रही हैं. सामाजिक दबाव में लोग अपनी हैसियत से बाहर जाकर खर्च करते हैं और बाद में परेशान होते हैं. जाट समाज का यह सामूहिक निर्णय लेकर इस सामाजिक दबाव को कम करने की पहल की है. इससे समाज में सादगी का संदेश जाएगा. 

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