राजस्थान की राजनीति और भूगोल में जल्द ही एक ऐतिहासिक फेरबदल देखने को मिल सकता है. देश में होने वाले अगले परिसीमन (Delimitation) को लेकर जो शुरुआती आंकड़े आ रहे हैं, उनके मुताबिक राजस्थान में लोकसभा सीटों की संख्या 25 से बढ़कर सीधे 38 हो सकती है. इसका मतलब यह है कि मरुधरा से अब संसद में 13 नए सांसद चुनकर पहुंचेंगे.
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जनसंख्या और क्षेत्रफल के आधार पर तैयार हो रहे इस नए खाके से राज्यों की राजनीति पूरी तरह बदल जाएगी. आइए सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि सीटों का यह नया गणित क्या है...
1. बड़े शहरों में अब होंगी दो-दो लोकसभा सीटें
इस नए परिसीमन का सबसे बड़ा असर राजस्थान के उन इलाकों पर पड़ेगा जहां शहरीकरण और आबादी तेजी से बढ़ी है. आइए देखते हैं सबसे ज्यादा असर कहां दिख सकता है.
1. जयपुर, जोधपुर और उदयपुर: इन तीनों बड़े शहरों में अभी केवल एक-एक लोकसभा सीट है. नए फॉर्मूले के बाद यहां सीटों की संख्या दोगुनी हो जाएगी, यानी इन शहरों में 1 की जगह 2-2 लोकसभा सीटें होंगी.
2. जयपुर ग्रामीण: इस बड़े इलाके को भी तोड़कर दो अलग-अलग लोकसभा सीटों में बांटने की तैयारी है.
2. संभागों का नया गणित: कहां कितनी सीटें बढ़ेंगी?
शहरी इलाकों के अलावा बाकी राजस्थान के नक्शे को भी नए सिरे से री-डिजाइन किया जाएगा. संभागों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बड़े बदलाव की तैयारी है.
शेखावाटी (सीकर-झुंझुनू): इस बेल्ट में अभी 2 लोकसभा सीटें आती हैं, जिन्हें पुनर्गठन के बाद 2 की जगह 3 सीटें कर दिया जाएगा.
बीकानेर संभाग: श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर को मिलाकर अभी 3 सीटें हैं, जो नए नक्शे में 3 से बढ़कर 4 हो सकती हैं.
वागड़ क्षेत्र (आदिवासी बेल्ट): अभी बांसवाड़ा और डूंगरपुर को मिलाकर एक ही सीट बनती है. नए परिसीमन में बांसवाड़ा और डूंगरपुर दो अलग-अलग स्वतंत्र सीटें बन सकती हैं.
अजमेर-राजसमंद: अजमेर, ब्यावर और राजसमंद के इलाके को मिलाकर अब 2 की जगह 3 लोकसभा सीटें बनाई जा सकती हैं.
3. पूर्वी राजस्थान बनेगा 'सियासी पावर हाउस'
नए समीकरणों में सबसे दिलचस्प मुकाबला पूर्वी राजस्थान में देखने को मिलेगा. भरतपुर, करौली, धौलपुर, सवाई माधोपुर और टोंक के जिलों को मिलाकर इस पूरे क्लस्टर में कुल 6 लोकसभा सीटें बनाने की चर्चा है.
क्यों अहम है यह इलाका? पूर्वी राजस्थान को पारंपरिक रूप से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यहां सीटों की संख्या बढ़ने और सीमाओं में बदलाव होने से बीजेपी नए सिरे से गोटियां बिछाएगी, जिससे मुकाबला बेहद कड़ा हो जाएगा.
क्या 2029 का चुनाव नए नक्शे पर होगा?
भले ही इन बदलावों को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल टाइमिंग का है. क्या साल 2029 का लोकसभा चुनाव इस नए नक्शे पर लड़ा जाएगा?
बीजेपी रणनीतिक तौर पर परिसीमन को लेकर काफी गंभीर है. माना जाता है कि पार्टी उन क्षेत्रों में अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने और विपक्ष के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए परिसीमन के नियमों और सीमाओं का अधिकतम लाभ उठाने की कला बखूबी जानती है.
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